नहीं आये बिहारी मजदूर
इस बार पंजाब में बिहारी मजदूर मौसमी खेती करने नहीं आये. पंजाब में हाहाकार मचा हुआ है. मजदूरों की कमी के कारण धान की रोपाई बुरी तरह से प्रभावित हो रही है.
राज्य सरकार असहाय व चिंतित है. पंजाब के किसान और नेता लालू के दरवाजे पर आ पहुंचे हैं. पंजाब के किसानों को उम्मीद है कि केवल लालू प्रसाद ही उन्हें इस संकट से उबार सकते हैं. एनडीए सरकार में मंत्री रहे सुखदेव सिंह ढींढसा ने रेल मंत्री लालू को पत्र लिखा है. उन्होंने लालू यादव से गुजारिश की है कि वे इस मौके पर पंजाब के किसानों के संकटमोचक बने. उन्होंने लालू को लिखी चिट्ठी में अपील किया है कि वे पहल करके बिहार के मजदूरों को प्रेरित करें कि वे पंजाब आयें. लालू से इस अपील का मकसद दोहरा है. एक तो वे बिहार में गरीबों के लोकप्रिय नेता है और दूसरे रेलमंत्री. अगर लालू की मेहरबानी हो जाए तो पंजाब इस संकट से उबर सकता है.
असल में पंजाब इस साल भयानक संकट में है. दो कारण ऐसे हैं जिसके चलते इस बार बिहार और यूपी से जानेवाले मजदूरों की संख्या बहुत गिर गयी है. पहला और सबसे बड़ा कारण है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से यहां चलकर आनेवाले मजदूर जब मेहनत मजूरी करके वापस लौटते हैं तो उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पंजाब और हरियाणा में इन मजदूरों को कई तरह से लूटा जाता है. ठग और गुण्डातत्व भोले-भाले मजदूरों को धोखे का शिकार बनाते हैं. कई बार ट्रेन में वैध टिकट होने के बावजूद उनके साथ बदसलूकी और वसूली की जाती है. मजदूरों के साथ यह लूटपाट उनके स्टेशन पहुंचने के साथ ही शुरू हो जाती है जो उनकी पूरी यात्रा में होती रहती है. कई ठग नकली टिकट कलेक्टर बनकर लूटते हैं तो कुछ धौंस दिखाकर जबरन वसूली करते हैं. स्टेशन पर कई बार इन्हें सही गंतव्य का टिकट देने की बजाय पूरा पैसा लेकर आधे रास्ते का टिकट दे दिया जाता है.
बिहारी मजदूरों के कारण पुलिसवालों की भी चांदी रहती है. मजदूरों को अनाप-शनाप तरीके से धौंस देकर उनसे पैसा वसूलते हैं. जैसे ही मजदूर स्टेशनों पर पहुंचते हैं सबको घेरकर एकसाथ बैठा दिया जाता है. सामान की तलाशी के बहाने इनकी नकदी और दूसरे सामान बिना कारण बताए उनसे छीन लिया जाता है. ऐसा नहीं है कि इन मामलों में आवाज नहीं उठी लेकिन पंजाब के लोगों ने कभी इन छोटी बातों पर खास ध्यान नहीं दिया. अब जबकि इस साल बिहार के मजदूरों ने पंजाब को टाटा-बाय-बाय कर दिया है तब पंजाब के किसानों के हाथ-पांव फूल गये हैं.
लेकिन मजदूरों के दूसरे राज्यों में न जाने का एक दूसरा कारण भी है. जानकार बताते हैं कि देशभर में नरेगा का लागू किया जाना एक बड़ा कारण है कि गरीब इलाकों से इस साल पलायन बहुत तेजी से गिरा है. देश में झाबुआ एक ऐसा जिला है जिसकी 75 प्रतिशत आबादी काम के तलाश में बाहर जाती है. लेकिन इस साल मात्र 20 प्रतिशत लोग ही काम की तलाश में बाहर गये हैं. इन परिणामों से बिहार भी अछूता नहीं है. लगातार जलालत झेलते बिहार के प्रवासी मजदूरों को अगर अपने ही घर में थोड़ा काम मिल गया तो वे भला बाहर क्यों जाएं? और तब तो और मुश्किल होती है जब अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई लेकर वापस लौट रहे हों और रास्ते में ही लूट के शिकार हो जाएं. ऐसे में बिहारी मजदूर विकल्प होने पर पंजाब भला क्यों जाएं?
लेकिन बिहारी मजदूरों के इस रूख से पंजाब के किसान सकते में आ गये हैं. खुद पंजाब के किसान खेतों में शायद ही मेहनत करते हों और पंजाब का मजदूर यूपी-बिहार के मुकाबिले बहुत मंहगा होता है. ऐसे में यूपी-बिहार से आये मजदूरों को यहां ज्यादा तवज्जो दी जाती है. पंजाब में कोई 26.5 लाख हेक्टेयर जमीन में पंजाब हर साल करीब 160 लाख धान पैदा करता है. धान की इस पैदावार के पीछे यूपी-बिहार से आये 6-7 लाख अस्थाई मजदूरों का श्रम होता है जिसकी बदौलत पंजाब अन्न का बादशाह बन जाता है. लेकिन इस बार बिहारी मजदूरों के मुंह मोड़ लेने के कारण पंजाब में धान की रोपाई ही ठीक से हो पायेगी इसमें संदेह है. दस जून के आसपास पंजाब में धान की रोपाई शुरू हो जाती है. लेकिन दस दिन बीत जाने के बाद भी पंजाब के अधिकांश स्टेशन खाली पड़े हैं. जो थोड़े-बहुत मजदूर आ भी रहे हैं उनके लिए स्टेशनों पर छीना-झपटी मची हुई है. इस साल बिहार और यूपी से आनेवाले मजदूरों की मजूरी भी बढ़ाकर दोगुनी कर दी गयी है. साथ ही रोजाना शराब और अफीम का मुफ्त पैकेज भी दिया जा रहा है लेकिन इस बार जब मजदूर ही नहीं आ रहे तो मजदूरी बढ़ाने और अफीम का लालच देने से भी कोई खास फायदा नहीं होनेवाला.
बिहार से जो मजदूर होकर आये और यहीं रह गये अब वे भी खेती के बजाए दूसरे कामों में लग गये हैं. ऐसे ज्यादातर लोग अब फेरी लगाने, छोटे-मोटे धंधा करने और तकनकि के कामों में ज्यादा रूचि लेते हैं. इससे कम मेहनत में उन्हें ज्यादा आमदनी हो जाती है. यहां के लोग तो वैसे भी खेती-बाड़ी से ज्यादा व्यापार और विदेश भागने की जुगत में लगे रहते हैं.ऐसे में फिलहाल तो पंजाब में धान की खेती पर संकट के गहरे बादल तो छाये ही हैं. मुख्यमंत्री बादल ने कुछ मशीनी हल निकालने की कोशिश की है लेकिन वे नाकाफी हैं.
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