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कंपनी का पानी है फूंक कर पीना

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मध्य प्रदेश में पिछला दशक "पानी के निजीकरण" के नाम रहा है. इसी कड़ी में ठेका आधारित `देवास औद्योगिक जलापूर्ति योजना´ का कार्य अब अपनी समाप्ति पर है. 2002 को `मध्यप्रदेश राज्य ओद्यौगिक निगम´ ने इस योजना के लिये एक टेण्डर जारी किया था. इसमें नेमावर से देवास तक कुल 128 किलोमीटर पाइपलाइन डालकर नर्मदा का 23 एम.एल.डी. पानी शहर के उद्योगों को पहुँचाना था. योजनाकारों ने 26.50 रुपए प्रति हजार लीटर की दर से पानी बांटने का दावा भी किया. लेकिन पहले टेण्डर में जहां इसकी लागत 65 करोड़ रुपए बतलायी गई थी वहीं अब यह लागत बढ़कर 80 करोड़ को पार कर चुकी है. साथ ही योजनाओं से जुड़े चंद सवाल भविष्य में आशंकाओं को जन्म दे रहे हैं. इसलिए यह पूरी योजना अब विवादों के घेरे में खड़ी है.

`बी. ओ. टी.´ सिद्धान्त पर कार्य करने वाली यह प्रदेश की पहली जलापूर्ति योजना भी रही. `बी. ओ. टी.´ का आशय हुआ-`कंपनी द्वारा बनाओ, चलाओ और मुनाफा कमाने के बाद जब मियाद खत्म हो जाए तो सरकार को वापिस करो.´ इस योजना के निर्माण कार्य तथा संचालन के लिए `एम. एस. के. प्रोजेक्टस् (इण्डिया) लिमिटेड बड़ोदा´ को चुना गया. यह सड़क निर्माण तथा मरम्मत कार्यों से जुड़ी गुजरात की बड़ी कंपनी है. करारनामों के मुताबिक कंपनी को यह योजना अगले 30 सालों के लिए ठेके पर दी गई है.

योजना में नर्मदा तल (272 मीटर) से देवास औद्योगिक क्षेत्र (575 मीटर) तक (कुल 303 मीटर) पानी को चढ़ाकर लाना होगा. 25 फरवरी, 2006 को भूमि-पूजन के दौरान अगले 18 महीनों में योजना को पूरी करने की घोषणा हुई थी. कंपनी वाले कहते हैं कि काम में देरी की वजह सड़क पर धनतालाब घाट का घना जंगल आना रहा. इसके चलते वन-विभाग की अनुमति टलती रही. लेकिन ताजा स्थिति यह है कि वन-विभाग की अनुमति मिल चुकी है. इससे कंपनी को नर्मदा से पानी लाने का रास्ता तो मिल गया है. लेकिन शहर में जलसंंकट की स्थिति और योजना के कागजातों की पड़ताल से कई गंभीर तथ्य उजागर हुए हैं.

देवास में ओद्यौगिकरण की तीव्र गति की खास वजह आगरा-बम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-03 पर आना और मूलभूत संसाधनों जैसे भूमि, बिजली और पानी की पर्याप्त मात्रा का होना माना जाता है. लेकिन इनमें से अहम मूलभूत संसाधन पानी का संकट अब गहरा चुका है. यहां औद्योगिक इकाईयों के लगातार (विशेषकर साल 1970 से) स्थापित होने के कारण औद्योगिक क्षेत्र और शहर के आस-पास के हिस्सों का विस्तार हुआ, साथ ही आबादी का भी. धीरे-धीरे उद्योगों और उनके लगने से पनपी घनी आबादी, दोनों को ही पानी पहुंचना मुिश्कल होेने लगा. एक तरफ समय के साथ पानी की खपत व माँग बढ़ी, दूसरी तरफ स्थानीय जल स्त्रोतों की कमी पड़ी. जितना रिचार्ज उससे कहीं अधिक दोहन से जब कुछेक स्थानों पर नलकूप असफल होने लगे. इसलिए निजी क्षेत्र ने नलकूप-काम्पलेक्स बनाकर टेंकरों से पानी बेचने का धंधा अपनाया. फिलहाल इन निजी टेंकर आपूर्तिकर्ताओं द्वारा 5 से 6 हजार लीटर का एक टेंकर 250 से 300 रूपए पर बेचा जाता है. पानी का यह भाव गर्मी के मौसम में माँग अधिक होने से बढ़ता है. पानी की रोजाना आपूर्ति के लिए कुछ उद्योगपति निजी टेंकर आपूर्तिकर्ताओं से व्यवसायिक समझौता करते हैं. फिर भी `देवास औद्यौगिक क्षेत्र´ को अधिकतम 2.40 एम.एल.डी. पानी ही मिल पाता है. जबकि वास्तविक जरूरत लगभग 12 एम.एल.डी. है.

पानी की कमी ओद्यौगिक विकास में बाधा न बन सके इसलिए सरकार ने उद्योगों को राहत देने के लिए ठेका आधारित यह योजना बनाई. लेकिन इसमें हैरतअंगेज तरीके से पानी का संकट झेल रहे देवासवासियों को बेदखल कर दिया गया. देवास में पानी का संकट सर्वव्यापक है. इसलिए सभी को राहत देने की भावना पर निहित एक सर्वव्यापक जलापूर्ति योजना बनानी चाहिए थी. वैसे तो काफी समय से यहां की जलापूर्ति व्यवस्था व्यवसायिक हाथों में रही है लेकिन अनौपचारिक तौर पर. इसके विपरीत `देवास औद्योगिक जलापूर्ति योजना´ पूर्णत: कंपनी द्वारा संचालित एक वृहद, औपचारिक और दीर्घकालिक योजना है.

नर्मदा के आसपास के क्षेत्रों के अतिरिक्त इससे लगे दूर-दराज जैसे भोपाल, होशंगाबाद, इटारसी, बुदनी, बैतूल और खण्डवा जैसे कुल 35 बड़े और मध्यम शहरों की माँग भी नर्मदा के पानी पर टिकी है. जबकि इन्दौर और जबलपुर सहित प्रदेश के 18 शहरों को नर्मदा का पानी दिया जा रहा है. नर्मदा के पानी का अधिकतम दोहन करने के लिये न केवल मध्यप्रदेश बल्कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों की भी नजर है. इसी प्रकार बिजली उत्पादन के लिए `नर्मदा सागर´ व `ओंकारेश्वर´ जैसी बड़ी परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है. ऐसी बड़ी परियोजनाओं से नर्मदा का अधिकतम दोहन होगा. `केन्द्रीय जल आयोग´ की रिपोर्ट के मुताबिक- ``बीते डेढ़ दशक में 1312 किलोमीटर लंबी नर्मदा के पानी की आवक 50 प्रतिशत घट गई है.´´ औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के साथ-साथ आबादी का बढ़ता भार नर्मदा के पानी की खपत में भी वृद्धि करेगा. लगातार और दीर्घकालिक दोहन से नर्मदा भी सूखने लगी है. इस आधार पर नर्मदा से देवास के उद्योगों को पानी आपूर्ति कराने की यह योजना हमेशा राहत देगी ही, ऐसा जरूरी नहीं।

समझौते के अनुसार देवास के उद्योगों/लाभधारियों को न्यूनतम 9 एम.एल.डी. पानी खरीदना ही पड़ेगा. इसी प्रकार औद्योगिक क्षेत्र के सभी व्यवसायिक और सार्वजनिक नलकूपों पर प्रतिबंध लगाने पर जोर दिया जा रहा है. तब निर्धारित मूल्य चुकाने पर ही पानी मिलेगा. तब छोटे और मध्यम उद्योगों को इस योजना से राहत मिले ही, ऐसा भी जरूरी नहीं. मंहगाई का कारण लागतों की वापसी, योजना पर किया गया अतिरिक्त खर्च, लागतों पर ब्याज और उपभोक्ताओं से सुनििश्चत लाभ वसूलना बताया जा रहा है. यह योजना जिस तकनीक पर कार्य करेगी उसमें बिजली का उपभोग होगा. इस तरह की सभी छोटी-बड़ी योजनाओं से कुल बिजली की खपत बढ़ जाती है. फिलहाल प्रदेश बिजली संकट से भी गुजर रहा है. योजना के कागजातों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार- ``संचालन व मरम्मत कार्यों के तहत सालाना राशि 6 करोड़, 71 लाख रूपए में से पंपिंग और ट्रीटमेन्ट पर आवश्यक ऊर्जा के लिए 3 करोड़, 55 लाख रूपए खर्च करना किया जाएगा.´´ इसी प्रकार- ``ऊर्जा आपूर्ति पर निर्धारित 55 लाख रूपए और विद्युत क्षेत्र में मरम्मत कार्य के लिए 4 लाख रूपए खर्च सुनििश्चत है.´´

शहर के कुछ नागरिक पानी की बढ़ती मांग को काबू करने के लिये पानी की बचत, संरक्षण, वर्षा के पानी का संग्रहण या ऐसी ही अन्य पद्धतियों को साकार करने के पक्षधर हैं। मगर इस योजना के मूल दस्तावेजों में पानी संरक्षण के उपायों का पूर्णत: अभाव दिखता है. कागजातों से यह भी साफ नहीं होता है कि योजना की पूरी प्रक्रिया पर आखिरी नियंत्रण और दिशा-निर्देशन किसका होगा ? असल में नियंत्रण से बाहर होना निजीकरण की बुरी लत रही है. हमारे सामने बिजली के सुधार औंधे मुंह गिरे हैं ऐसे में अब पानी में भी सुधार के नाम पर बाजार खड़ा किया जा रहा है. इसलिए दूध के जले को छाछ तो क्या अब पानी भी फूंक-फूककर पीना होगा.

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image शिरीष खरे मासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल "नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी" से जुड़े रहे. सामाजिक मुद्दों को सीखने और जीने का सिलसिला जारी है. फिलहाल ''चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई'' के ''संचार विभाग'' में से जुड़कर सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
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