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दोहा दौर का दोहरा संकट

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तीन सितंबर से नई दिल्ली में शुरू हुए दो दिन के मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस और उसका विरोध दोनों शुरू हुए. दिल्ली में हो रही इस दो दिवसीय मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस का हजारों किसानों और प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया और भारत सरकार से किसी भी कीमत पर दोहा दौर से समझौता न करने की मांग की.

डब्ल्यूटीओ के तहत दौहा दौर की वार्ताओं को पूरा करके नयी मंत्रिस्तरीय वार्ता शुरू करने के उद्येश्य से दिल्ली में दो दिवसीय मिनी मंत्री स्तरीय वार्ता का आयोजन किया गया है. ऐसा समझा जा रहा है कि भारत सरकार जो कि मुरासोली मारन के जमाने से दोहा दौर की वार्ता पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी अब अपनी आपत्तियों को वापस लेने के लिए तैयार हो गयी है. अगर ऐसा होता है तो देश के सर्विस सेक्टर और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

3 सितंबर को नई दिल्ली में मिनी मिनीस्टीरियल कांफ्रेस शुरू होने के साथ ही विरोधी भी मंडी हाउस पर इकट्ठा हो गये. उन्होंने मंडी हाउस से जंतर मंतर तक अपना विरोध मार्च किया और भारत सरकार से किसी भी कीमत पर समझौता न करने के नारे लगाये. इस विरोध मार्च में भारतीय किसान यूनियन, सीपीआई (एम), सीपीआई और सीपीआईएमएल, न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव, सोशलिस्ट यूनिटी सेन्टर आफ इंडिया, कर्नाटका स्टेट फार्मर्स एसोशिएशन, तमिलनाडु स्टेट फार्मर्स एसोशिएशन के अलावा इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिलीपीन्स से आये प्रदर्शनकारियों ने भी हिस्सा लिया.

प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि तुरंत न केवल यह छोटी मंत्रीस्तरीय वार्ता रोक दी जाए बल्कि प्रधानमंत्री उनसे मुलाकात करें. अपनी मांग के साथ प्रदर्शनकारी जंतर मंतर पर धरने पर बैठे हुए हैं जो कि 4 सितंबर को भी जारी रहेगा. इस मौके पर प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए सीपीआई के महासचिव ए बी वर्धन ने कहा कि केन्द्र सरकार आम चुनाव में मिले जनादेश की सीधे तौर पर अवहेलना करते हुए इस देश की बहुसंख्यक आबादी के भाग्य के साथ खिलवाड़ कर रही है. इस मौके पर बोलते हुए सीताराम येचुरी ने कहा कि वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा जिस तरह से दोहा दौर को विफल करना चाहते हैं उससे साफ होता है कि केन्द्र सरकार अमेरिका के दबाव में काम कर रही है. सीताराम येचुरी ने कहा कि अगर आम आदमी के हितों की अनदेखी की जाती है तो केन्द्र की सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि यही आम आदमी कांग्रेस को उखाड़ फेंकेगा.

इस मौके पर बोलते हुए सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि डब्ल्यूटीओ के तहत किस तरह से भारतीय हितों को विदेशियों के हाथ गिरवी रखा जा रहा है इसके बारे में पूरे देश को आगाह करने की जरूरत है. लोगों में जन जागरण फैलाने की जरूरत है ताकि वे समझ सकें कि उनके भविष्य के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है.

जेनेवा में नवंबर-दिसंबर 2009 में मंत्रीस्तरीय वार्ता शुरू होगी. नये दौर की वार्ता तब तक शुरू नहीं हो सकती जब तक कि पिछले दौर की वार्ता पर सभी देश अपनी सहमति नहीं दे देते. दोहा दौर की वार्ता में कृषि और सेवा के बारे में जो प्रावधान हैं उसमें कहा जा रहा है कि भारत सरकार अपने किसानों को मिलनेवाली सब्सिडी पर कटौती करे और सेवा क्षेत्र में विदेशियों को आने की अनुमति दे. पहले ही भारत के किसान अपने संकटों से जूझ रहे हैं अगर भारत सरकार इस पर सहमति दे देती है विदेशी कृषि उत्पाद और सेवाओं की भारत में बाढ़ आ जाएगी और भारत के किसानों और छोटे व्यापारियों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. इस मौके पर बोलते हुए डब्ल्यूटीओ िवरोधी अभियान के संयोजक एसपी शुक्ला ने कहा कि भारत सरकार को अपने देश के किसानों और कर्मचारियों के हितों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे हमारे ही देश के नागरिक हैं. विदेशियों को मदद पहुंचाने के लिए हमारी सरकार अपने ही नागरिकों के हितों को दांव पर लगाने से बाज आये.

हालांकि भारत सरकार दोहा दौर पर अपनी सहमति देने की मंशा पहले ही जता चुकी है. इस सिलसिले में पिछले दिनों अमेरिका के दौरे पर गये देश के नये वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा था कि भारत दुनिया के व्यापार के रास्ते में आड़े नहीं आना चाहता. दुनिया के कुछ धनी देश चाहते हैं कि भारत दोहा दौर की वार्ताओं पर सहमति दे ताकि उन्हें दुनिया के कृषि और सेवा क्षेत्र के बाजार में पैठ बनाने का मौका मिले ताकि वे मंदी से उबर सकें. पिछले महीने एक अध्ययन के द्वारा यह कहा गया था कि अगर दोहा दौर की वार्ता समाप्त कर दी जाती है तो दुनिया के कुछ विकसित देशों को 300-700 बिलियन डॉलर का नया सालाना बाजार मिलेगा. निश्चित रूप से इससे नुकसान भारत और तीसरी दुनिया के देशों को होगा लेकिन भारत सरकार इस समय अमेरिका के दबाव में अपनी आपत्तियों को किनारे कर दोहा दौर की वार्ताओं को समाप्त करने की मंशा पहले ही जता चुका है.

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