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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्रों का आंदोलन

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image छात्रों के समर्थन में बोलते हुए आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक बनवारी लाल शर्मा

इधर दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिस वक्त केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी देश में चार और आईआईएमसी खोले जाने की घोषणा कर रही थी उसी वक्त दिल्ली से दूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्र अपने ही कुलपति के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े पत्रकारिता के छात्रों का यह आंदोलन थोड़ा बेतुका जरूर है लेकिन अप्रासंगिक नहीं है. मसलन आंदोलन करनेवाले छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय परिसर में निजी पत्रकारिता संस्थान न खोला जाए भले ही विश्वविद्यालय के जर्जर पत्रकारिता संकाय में एक ही शिक्षक उन्हें पत्रकारिता पढ़ाता रहे.

यह बात तो बेतुकी है लेकिन इस आंदोलन को समझते हुए यह भी समझ में आता है कि छात्र असल में शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण का विरोध कर रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन चाहता है कि पत्रकारिता संकाय को धीमी मौत मारकर उसकी जगह निजी सहयोग से पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की जाए. इस काम के लिए उसने निजी क्षेत्र की एक संस्था का सहयोग लिया है और विश्वविद्यालय परिसर में पत्रकारिता स्कूल की शुरूआत का प्रस्ताव किया है. इस निजी क्षेत्र के पत्रकारिता स्कूल की परिकल्पना का विरोध करते हुए वर्तमान छात्र जो सबसे मजबूत तर्क देते हैं वह यह कि पत्रकारिता की पढ़ाई मंहगी हो जाएगी. आज जो पढ़ाई वे पंद्रह बीस हजार में पूरी कर लेते हैं उसी के लिए उनको लाख सवा लाख रूपये चुकाने होंगे. ये छात्र यह पैसा कभी अदा नहीं कर सकते इसलिए वे पढ़ाई से ही वंचित हो जाएंगे.

शिक्षा के क्षेत्र में जैसे जैसे निजी क्षेत्र का दखल बढ़ रहा है वैल्यू एडिशन के नाम पर जगह जगह यह खेल किया जा रहा है कि पढ़ाई में निजी संस्थान आ रहे हैं. एमिटी में भ्रष्टाचार और व्यापार की कहानी यह साबित करती है कि शिक्षा भविष्य का सबसे लाभदायी व्यापार साबित होनेवाला है जिसमें गरीब विद्यार्थियों के लिए कहीं कोई जगह नहीं होगी. इसी बात के मद्देनजर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र यह विरोध कर रहे हैं किसी भी कीमत पर विश्विविद्यालय परिसर में निजी क्षेत्र को प्रवेश नहीं करने देंगे. वैसे भी छात्रों का आरोप है कि जिस व्यक्ति जी के राय को यह परिसर चलाने का जिम्मा सौंपा रहा है उनके पास पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई खास अनुभव नहीं है. छात्र उन्हें "अचार चटनी मुरब्बा" बेचनेवाला कहकर उनकी आलोचना करते हैं.

आंदोलन चला रहे लोगों का कहना है कि एक तरफ सालों से खट रहा पत्रकारिता और जनसंचार विभाग है जिसमें छात्रों के बैठने के लिए ढंग की कुर्सियां तक नहीं हैं। ऐसे में पैसा देकर पत्रकार बनाने वाली डिग्री शुरू करना कहां तक उचित है? वहां पर एक छात्र की फीस एक लाख बीस हजर रूपए है जबकि हमारे यहां चौदह हजार रूपए। इस नए पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय प्रशासन प्रोत्साहित कर रहा है जबकि सालों से पत्रकारिता पढ़ाने वाले विभाग की उपेक्षा की ज रही है। एक ही विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के दो तरह के छात्र तैयार किए ज रहे हैं। एक में धनाड्य वर्ग के लोग आ रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र जरूरी सुविधाओं के बिना पढ़ाई कर रहे हैं।

विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस मुद्दे को लेकर कुलपति, डीन कला संकाय, डीन स्टूडेंट वेलफेयर और अध्यक्ष पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग को जो ज्ञापन दिया है, उसमें कई मुद्दे उठाए गए हैं। ज्ञापन में कहा गया है कि यूजीसी के नियमों को ताक पर रखकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले २५ वर्षो से चल रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के होते हुए भी -मीडिया अध्ययन केन्द्र- के रूप में नए व्यावसायिक संस्थान की स्थापना की है। इसमें कई और सर्टिफिकेट और डिप्लोमा शुरू किए ज रहे हैं। छात्रों ने पूछा है कि एक ही विश्वविद्यालय में किसी विभाग के समानांतर दूसरा पाठ्यक्रम चलाने का औचित्य क्या है। खासकर तब जब दोनों का पाठ्यक्रम यूजीसी के तय पाठ्यक्रम के समान हो। दूसरे इसको अभी तक विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी से मंजूरी तक नहीं मिली।

विश्वविद्यालय के छात्र धर्मेन्द्र सिंह ने कहा-यह सारा मामला चंद लोगों के निजी फायदा पहुंचाने के लिए शुरू किया गया है। इसमें विश्वविद्यालय प्रशासन के शीर्ष पर बैठे लोग शामिल हैं। यही वजह है कि बिना किसी अर्हता के सेंटर फार फोटो जर्नलिज्म एंड विजुअल कम्युनिकेशन के प्रभारी के प्रस्ताव को विद्वत परिषद ने आंख मूंदकर मुहर लगा दी। कुल मिलाकर यह प्रस्ताव दोहरी शिक्षा प्रणाली का प्रतीक है जिसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र स्वीकार नहीं करेंगे और आंदोलन बढ़ाया जएगा। आंदोलन में शामिल पूर्वोतर के छात्र लोडाम गंगो ने कहा-अभी तक हम लोग देश के उत्तर पूर्वी हिस्से से आकर यहां सस्ती शिक्षा पा लेते थे। लेकिन अब इसी पाठ्यक्रम को महंगा कर जो समानांतर व्यवस्था शुरू की गई है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में पत्रकारिता का मौजूदा विभाग समाप्त कर लाखों रूपए फीस पर लोगों को पत्रकारिता की शिक्षा दी जएगी। यह एक बड़ा खतरा है।

इस खतरे को टालने के लिए पत्रकारिता के छात्र कुलपति को पत्र लिखने से लेकर बुद्धि शुद्धि यज्ञ और लोगों तक बात को ले जाने के हर संभव रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं. समय ही बताएगा कि लंबे समय बाद निजीकरण की कोशिशों के खिलाफ उठ खड़े हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ये छात्र सफल होते हैं या विफल. लेकिन इस आंदोलन को कहीं से नाजायज नहीं ठहराया जा सकता. पूर्वी उत्तर प्रदेश की जैसी आर्थिक परिस्थिति है उसमें लाख सवा लाख की फीस का मतलब है वहां के नौजवानों को उच्च शिक्षा से सीधे बेदखल कर देना. विश्वविद्यालय प्रशासन को कम से कोई फैसला लेने से पहले आस पास के सामाजिक आर्थिक परिवेश का ध्यान जरूर रखना चाहिए.

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