दिल्ली में देश के दो लाख गन्ना किसान
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रामलीला मैदान से जंतर-मंतर पहुंचना हो तो बीच में दिल्ली का प्रतिष्ठित कनाट प्लेस पड़ता है. लेकिन गुरुवार को गन्ना किसानों की रैली को देखते हुए इस प्रतिष्ठित व्यावसायिक जगह को एहतियातन बंद करवा दिया गया था. हो सकता है पुलिस ने दुकानदारों की जानमाल की रक्षा को देखते हुए यह कदम उठाया हो लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के कहने पर दिल्ली आये लगभग दो लाख गन्ना किसानों ने छुटपुट उपद्रव के अलावा ऐसा कुछ नहीं किया जिससे "कानून व्यवस्था" का संकट खड़ा होता.
फिर भी दिल्ली के कुछ अति व्यस्त और व्यावसायिक इलाके दिनभर के लिए जाम तो हो ही गये. दिल्ली की परिवहन व्यवस्था तो अगली सुबह रास्ते पर आ जाएगी लेकिन उन किसानों के साथ क्या होगा जो अपनी जायज मांग लेकर दिल्ली आये थे? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से राष्ट्रीय लोकदल के बैनर तले आये ये किसान गन्ने के न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाकर 280-300 रुपये करने की मांग कर रहे हैं. फिलहाल उन्हें पिछले साल 104-145 रुपये क्विंटल का भाव मिला था और इस बार चीनी मिल मालिक प्रति क्विंटल 15 से 20 रुपये इन्सेटिव देने की बात कह रहे हैं. यानी हिसाब लगाने पर 160 से 165 रुपये प्रति क्विंटल कीमत मिलेगी. किसान जो मांग कर रहे हैं उससे चीनी मिलों को प्रति क्विंटल लगभग 150 रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा जिसे मानने के लिए वे तैयार नहीं है. गन्ना किसानों का तर्क है कि पिछले साल जब चीनी मिल मालिक उन्हें 140-145 रुपये का रेट दे रहे थे तो चीनी की कीमत 16 रुपये किलो थी लेकिन आज चीनी की कीमत 38-40 रुपये किलो है ऐसे में चीनी मिलों पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा. गन्ना किसानों का तर्क है कि एक क्विंटल गन्ने से मिल मालिक लगभग 500 रुपये की आय करते हैं ऐसे में 280 रुपये किसानों को देने में उन्हें क्या हर्ज है?
गन्ना किसानों की इस मांग के पीछे का सबसे मजबूत तर्क यह है कि मिल मालिकों को एक क्विंटल गन्ने में चार किलो चीनी के अलावा वे शराब के लिए शीरा और एथेनाल के लिए खोई का इस्तेमाल करता है जिससे उसकी भरपूर कमाई हो जाती है. लेकिन गन्ना किसानों की समस्या सिर्फ कमाई में हिस्सेदारी तक ही सीमित नहीं है. गन्ना किसान और चीनी मिल मालिकों का संबंध इतना जटिल है कि कभी चीनी मिल मालिक बर्बाद हो जाते हैं तो कभी गन्ना किसानों की दुर्गति हो जाती है. यह सब लंबे समय से चला आ रहा है. इसी क्रम में मिल मालिकों को मदद पहुंचाने के उद्येश्य से केन्द्र सरकार ने एफआरपी अधिनियम लागू किया है जिसके तहत गन्ना की खरीद मूल्य 129.84 रुपये निर्धारित किया है. सीधे तौर पर यह मिल मालिकों को मदद पहुंचाने के लिए ही किया गया है लेकिन कृषि मंत्री शरद पवार का कहना है कि यह सिर्फ एक न्यूनतम मार्क निर्धारित करने के लिए किया गया है, जरूरी नहीं कि मिल मालिक इसी कीमत पर गन्ना खरीदें. खुद उनके गृह राज्य में चीनी मिल मालिक 180 रुपये की दर से गन्ना खरीद रहे हैं. 5 नवंबर को आर्थिक संपादकों के एक मुलाकात में उन्होंने कहा था कि राज्य सरकारों को 20 प्रतिशत लेवी चीनी (जो कि राशन के तहत वितरित की जाती है) उसका बोझ उठाना होगा. बात यहीं से बिगड़ गयी और राज्य सरकारें, चीनी मिल मालिक, केन्द्र सरकार और किसानों के बीच चौसर का एक ऐसा खेल शुरू हो गया जिसमें हारना कोई नहीं चाहता.
राज्य सरकारें अपने ऊपर बोझ लेने के लिए तैयार नहीं है और केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार हर हाल में चीनी मिल मालिकों को फायदा पहुंचाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें चीनी मिल मालिकों की पीड़ा बर्दाश्त नहीं हो रही है. ऐसे में किसानों के सामने सिवाय सड़क पर आने के कोई रास्ता नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादकों की भारी तादात है इसलिए राष्ट्रीय लोकदल के लिए यह एक बेहतरीन राजनीतिक मौका है. अगर चीनी मिल मालिक चीनी की बढ़ी कीमतों से अपनी जेब मोटी कर रहे हैं तो फिर किसानों को कम पैसा क्यों दिया जा रहा है? जंतर मंतर पर मय कुनबे सहित चौधरी अजीत सिंह मौजूद थे. ठसाठस भरे जंतर मंतर पर बने मंच पर चौधरी अजीत सिंह के अलावा उनके पुत्र जयंत चौधरी, राष्ट्रीय लोकदल की सांसद किरण चौधरी, भाजपा नेता अरुण जेटली, सपा नेता अमर सिंह मौजूद थे और गन्ना किसानों को उसका हक दिलाने का वादा कर रहे थे. अजीत सिंह चौधरी बनने की तरफ अग्रसर हैं और जयंत को युवराज के बतौर स्थापित करना चाहते हैं इसलिए चौधरी साहब से ज्यादा एकाग्रता से गन्ना किसानों ने छोटे चौधरी जयंत को सुना और तालियां बजायी. तय था ये गन्ना किसान, राष्ट्रीय लोकदल के कर्मठ कार्यकर्ता और समर्थक थे.
अपनी इस रैली से अजीत सिंह ने एक तीर से दो शिकार किये. एक ओर जहां उन्होंने किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत के जंतर मंतर पर हुए टुंटपुजिए धरने को धता बता दिया वहीं दूसरी ओर भाजपा और कांग्रेस को अपने साथ मंच पर लाकर कांग्रेस और मायावती दोनों पर दबाव बनाने की कोशिश भी की. चौधरी साहब जानते हैं कि देश में समर्थन मूल्य की राजनीति किसानों की सबसे बेहतर राजनीति होती है क्योंकि यह एक तरह की व्यवासायिक सौदेबाजी होती है जिसमें चतुर राजनीतिज्ञ किसान के लिए वैसे ही लॉबिंग करता है जैसे अपने किसी व्यावसायिक घराने के लिए फिक्की या सीआईआई का अध्यक्ष सरकार की नाक में दम कर देता है. इसमें अन्यथा कुछ नहीं है. कृषि मंत्री कुछ चीनी मिलों को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं तो चौधरी अजीत सिंह किसानों के हित की बात कर रहे हैं. अगर वे किसानों के अच्छे लाबियिस्ट साबित हुए तो गन्ना किसानों को 280 तो नहीं 200 रुपये तक समर्थन मूल्य दिलवाने में कामयाब भी हो सकते हैं क्योंकि केन्द्र की कांग्रेस सरकार इतनी बड़ी संख्या में किसानों का गुस्सा शायद ही मोल लेना चाहे. वैसे भी भाजपा की ओर से मंच पर आये अरुण जेटली ने साफ कहा कि अध्यादेश अगर कानून की शक्ल में संसद में आता है तो उनकी पार्टी उसे कानून नहीं बनने देगी. राष्ट्रपति कार्यालय ने भी इस अध्यायदेश को कानून की शक्ल न देने का संकेत दिया है ऐसे में गन्ना किसानों की दिल्ली रैली शायद बिल्कुल ही बेकार न जाए. वे जितना चाहते हैं उतना न सही लेकिन उन्हें जितना मिल रहा है उससे कुछ अधिक तो मिल ही जाएगा.
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Digg
kabhi bijnor aao to ye sab dekh kar jana.yaha sab sugar mills ki sath main distillaries, paper mills,chemical, petro chemical factories hain.
patrakaro ko bhi puri bat nahi pata hai . aur kuchh salo main ganna chini ke liye nahi apne industrial products ke liye boya jaya karega.
is bar bhee Rs 300 bikega Ajeet singh ki rajneet se kuchh nahi hoga. usse to aandolan kamjor pada hai v Sonia sarkar ke uvraj ne manmohan ji se jo bat kari hai wo bhi bekar ho rahi hai.
एक बार पुन: धन्यवाद.
Lekin "precaution is better than cure".
Main kishano ke sath hoon
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