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लोकतंत्र के योद्धाओं की खानाबदोश बस्ती

image मछिन्द्रनाथ जंतर मंतर पर चला रहे हैं जूता मारो आंदोलन

वैसे तो देश भर में हर राज्य की राजधानी में एक ऐसा स्थान नियत किया गया है जहां लोकतात्रिक तरीके से लोग अपनी बात कह सकते हैं. लेकिन संसद और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र होने की वजह से दिल्ली का अपना महत्व है. देश भर से हताश और निराश लोग इस उम्मीद में जंतर मंतर आते हैं कि यहां उनकी बात सुनी जाएगी. लेकिन संवेदनशून्य हो चुकी हमारी व्यवस्था और प्रशासन या तो उनकी बात सुनता ही नहीं, या फिर कार्रवाई इतनी लंबी होती है कि न्याय मिलते-मिलते जीवन का एक लंबा अरसा गुजर जाता है. कहते हैं दिल्ली उंचा सुनती है. जंतर-मंतर पर यह सही साबित होती है.

संसद पर सात सालों से धरना दे रहे वेतन विहीन शिक्षक संघ के अध्यक्ष बाल्मीकि मंडल से मिलने के बाद एक चेहरा बार-बार मेरे आंखों के सामने झांकने लगा. जंतर-मंतर रोड़ के फूटपाथ पर मैं उस चेहरे को ढूंढता रहा. झुर्रियों की घाटी में  मुरझाया वह उदास चेहरा... पोपले गालों और काले पड़ चुके माथे के बीच गहरी धंसी हुई आंखे... कांपते हाथों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को लिखी चिठ्ठियों का पहाड़ सा पुलिंदा... फटी और मैली साड़ी में लिपटी वह असहाय बुढ़िया का चेहरा, जिसका जिस्म न्याय के लंबे इंतजार में झुक के दोहरा हो गया था, आज भी मुझे अच्छी तरह याद है. एक साल बाद मैं जब जंतर-मंतर के फुटपाथ पर धरना देने वालों से मिल रहा था, तो बरबस ही निगाहें, उसे खोज रही थी... कई चक्कर लगाने के बाद भी वह बुढ़िया तो नहीं मिली, लेकिन बस इतना भर पता चल पाया कि लंबे समय से धरना दे रही वह महिला कुछ समय पहले पागल हो गई थी.... और इसके बाद वह यहां दुबारा नहीं दिखी. एक बार फिर बाल्मीकि मंडल की कही यह बात बार-बार कानों में गूंजने लगती है, “प्रताडित और व्यवस्था से परेशान कई धरनाधारियों को जब न्याय नहीं मिला तो वे मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गए. सात साल में मैने ऐसे कई लोगों को देखा है जो राज्य स्तर पर अपनी मांगे पूरी न होने पर जंतर मंतर पर इस गुमान पर आए कि उनकी बात संसद में जरूर सुनी जाएगी. लेकिन न्याय मिलने की बात तो दूर, अब वे पागल हो कर दिल्ली की सड़कों पर घूम रहे हैं. कुछ की तो न्याय के इंतजार में धरना स्थल पर मौत भी हो गई है.” 

करीब साल  भर पहले एक दिन जब मैं जंतर-मंतर रोड़ पर गुमशुदा बच्चों के मां-बाप के धरने को कवर कर रहा था, तभी उस बूढ़ी महिला से मेरी मुलाकात हुई थी. दिल्ली के बीचोबीच बसा यह वही जंतर-मंतर रोड़ है जिसे राष्ट्रीय धरना स्थल के रूप में जाना जाता है. लोकतंत्र में आस्था रखने वालों के लिए यह एक ऐसी जगह है. जहां से वे लोकतंत्र के सबसे बड़े न्याय के मंदिर यानी संसद में अपनी गुहार लगा सकते हैं. यहां हर साल करीब सात हजार धरना और प्रदर्शन होते हैं. उस बूढ़ी महिला ने मुझसे एक खबर छापने का आग्रह किया और खुद को एक स्कूल की शिक्षिक बताते हुए इशारे से मुझे एक कोने में ले गई, फिर धीरे से कान में कहा, “मेरी जान को खतरा है.” मैने पूछा किससे? जवाब थोड़ा हैरान करने वाला था, “प्रधानमंत्री से... उसने पुलिस वाले मेरे पीछे लगा दिए हैं.” आखिर क्यों, “मुझे सरकारी नौकरी से हटा दिया था. मैं अपने खिलाफ हुए 

अन्याय की शिकायत करने प्रधानमंत्री के पास गई तो, मिलने की बजाए उन्होंने मेरी पुलिस से पिटाई करवाई. इससे पहले मैने प्रधानमंत्री को इस बारे में कई चिठ्टी लिखी थी. जब जवाब नहीं आया तभी मैं उनसे मिलने गई थी. अब मैं उनके खिलाफ यहां धरना दे रही हूं, तो उन्होंने मुझे मरवाने के लिए यहा अपने आदमी भेज दिए. कल रात वे मेरा सारा सामान छीन ले गए.” उसने मुझे प्रधानमंत्री और राष्ट्पति को लिखी चिठ्ठी भी दिखाई जिसमें उसने अपने साथ हुए अन्याय की कहानी लिखी थी. बातचीत से तब मुझे यह आभाष तो हुआ कि महिला का दिमाग ठीक नहीं है. लेकिन इस महिला ने अपना मानसिक संतुलन क्यों खो दिया था, इसका एहसास मुझे एक साल बाद बाल्मीकि मंडल और दूसरे धरना देने वालों से मिलने के बाद हुआ. लंबे समय तक न्याय न मिलने के बाद मानसिक रूप से विक्षिप्त होने वाली यह महिला अकेली नहीं है. जंतर-मंतर पर घूमने पर पता चला कि ऐसे कोई लोग है जिन्होंने अपना घर बार छोड कर न्याय के लिए यहां सालों धरना दिया, लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, उनकी उम्मीद की लौ धीमी होती चली गई. नतीजन निर्दयी और बेहरम व्यवस्था की उदासीनता से उनकी निराशा अवसाद में बदल गई. नतीजा यह हुआ कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वे पागल हो गए. कोयला खदान शिक्षक मोर्चा के महामंत्री बीके सिंह 16 साल से, डा. रमा इंद्र कुमार 13 साल से तो वेतन विहीन शिक्षक समूह के अध्यक्ष बाल्मीकि मंडल सात साल से जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं. 
 
जंतर मंतर पर न तो धरना देने वालों  के लिए कोई रैन बसेरे  की व्यवस्था और न ही खाने पीने की. कई दिन तक भूखे पेट  रहना यहां के लोगों की नियति  है. फिर भी लोकतंत्र में उनकी गहरी आस्था और न्याय के लिए उनका संघर्ष ही, उन्हें जीवित रखने के लिए संजीवनी का काम करता है. पेट न भरने से शरीर जर्जर और कई बीमारियों का शिकार हो जाता है. धरने पर बैठे ज्यादातर लोग किसी न किसी बिमारी से ग्रसित हैं. कई तो इसी वजह से काल के गाल में भी समा चुके हैं. ऐसा ही एक नाम है रौनकी राम बाजीगर. क्रिमनिल ट्राइबल के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले विमुख जनजाति मोर्चा के संस्थापक रौनकी राम बाजीगर नौ साल से अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे. खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर लगातार नौ साल तक रहने से रौनकी राम का शरीर जर्जर और कई बीमारियों का शिकार हो गया था. आखिरकार, नवंबर, 2003 में धरने के दौरान ही उनकी मौत हो गई.

यह हमारे लोकतंत्र का कड़वा सच है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की हकीकत है. मैं नहीं जानता  की न्याय की गुहार करने वाली वह बुढ़िया अब कहां है? जिंदा भी है, या फिर न्याय की लड़ाई में खुद को स्वाहा कर दिया. लेकिन मैंने उन लोगों को देखा, जो सालों से न्याय की बाट जोह रहे हैं. भूखे-प्यासे ये लोग, सर्दी हो या गर्मी, जंतर मंतर रोड के फुटपाथ पर खुले आसमान के नीचे डेरा जमाए हुए हैं. हमारे बहरे नेताओं के कान उनकी आवाज को नहीं सुन पाते और उनके दुख और दर्द संसद की दीवारों से टकरा कर वापस हो जाते हैं. यही निर्मम व्यवस्था लोगों को हथियार उठाने के लिए भी मजबूर करती है. चाहे चंबल की दस्यु समस्या हो या फिर देश के आदिवासियों के हथियार उठा कर नक्सली बनेने का मामला... इसकी जद में यह बेरहम व्यवस्था ही है. यह तो डा. रमा इंद्र कुमार, बीके सिंह और बाल्मीकि मंडल का धैर्य ही है जो सालों से उन्हें जंतर मंतर पर न्याय की आस में रोके हुए है. 16 साल का समय बहुत लंबा होता है. न्याय के इंतजार में बीके सिंह और बाल्मीक मंडल ने जंतर मंतर पर अपनी जवानी बिता दी. अगर ये लोग कल को बंदूक उठा लें तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? 

दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनाट प्लेस के बीचो-बीच बसे  जंतर मंतर की अपनी अलग दुनिया है. वैभव और आधुनिककता की चकाचौंध से घिरे कनाट प्लेस  को जंतर मंतर पर बनी धराना देने वालों की खानाबदोश छोटी सी बस्ती मुंह चिढ़ाती है. गरीबी और अभाव से भरी यह एक ऐसी नायाब बस्ती है, जहां लोकतंत्र के योद्धा रहते हैं. गांधी और लोहिया के रास्ते पर चलते हुए अहिंसात्मक तरीके से अपनी अपनी लड़ाई लड़ने वाले लोग... करीब 50 लोगों की इस बस्ती में कम लोगों के घरों में ( यह घर नहीं, फुटपाथ का एक हिस्सा भर होता है.) ही चूल्हा जलता है. ज्यादातर लोग गुरुद्वारों और मंदिरों में जाकर भिखारियों को बांटे जाने वाले भोजन से अपने पेट की भूख शांत करते हैं. कई बार तो वह भी नहीं मिलता और फिर रात भूखे पेट गुजार देनी पड़ती है. देश के दूर दराज इलाकों से आए और एक दूसरे से अनजान इन लोगों में अपनत्व भी है गहरा प्यार भी. वे बीमार होने पर एक दूसरे को अस्पताल भी ले जाते हैं और मरने पर कंधा भी देते हैं. वे हर दुख-सुख को साझा करते हैं. करें भी क्यों न.. उनका यहां और कौन है. दिल्ली के पास उनका दुख दर्द जानने का वक्त ही कहां है? जंतर मंतर से गुजरने वाले दिल्ली वाले तो इन्हें “फुटपाथ पर कब्जा करने वाला” समझते हुए, हिकारत भरी नजरों से देखते हैं. जब पटना के नवादा गांव के सुदामा जादव की गर्भवती पत्नी को प्रसव पीड़ा हुई तो पति से ज्यादा आप-पास के धरना देने वालों ने उसकी चिंता की और अस्पलात पहुंचाया. मुजफ्फरपुर के धूली गांव की उर्मिला की बेटी जब जंतर मंतर पर पल-बढ़ कर जवान हुई तो उसकी शादी में घराती भी धरना स्थल के लोग ही बनें. हां, कुछ संवेदनशील पुलिसवाले भी इन धरना देने वालों से सहानुभूति रखने लगे हैं और उनकी मदद के लिए तैयार भी रहते हैं. पोस्टमैन अजीत सिंह तो दस सालों से नियमित रूप से जंतर मंतर पर धरनाधारियों की चिठ्ठी और मनीआर्डर पहुंचाते आ रहे हैं. वे बिना पते वाली (नाम के आगे बस जंतर-मंतर लिखा होता है.) चिठि्ठयों को बड़ी ही आत्मीयता से धरना देने वालों तक पहुंचाते हैं.

अकेले और निरीह व्यक्ति की बात तो संसद और कानून बनाने वालों के कानों तक तो पहुंच ही नहीं पाती. हां, उन लोगों की मांगों पर जरूर कुछ कार्रवाई हो जाती है, जो एक बोट बैंक होते हैं. आम लोग तो पुलिस के जरिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को मांगपत्र भेज कर न्याय की राह तकते रहते हैं. एक लोकतांत्रिक देश में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां जुल्म के सताए लोगों को शीघ्र न्याय मिल सके, क्यों कि देर से मिला, न्याय न मिलने सरीखा ही है. बाल्मीकि मंडल कहते हैं, “सरकार को एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जहां धरना देने वालों की मांगों पर एक निश्चित समय सीमा में जांच कर उचित कार्रवाई हो सके. इसके लिए एक धरना आयोग का गठन करना चाहिए.” अगर सरकार एक धरना आयोग का गठन कर दे तो इससे लोगों को फौरन न्याय तो मिलेगा ही, साथ ही लोकतंत्र में इनकी आस्था भी मजबूत होगी.

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SUNIL PARBHAKAR on 08 December, 2009 16:07;54
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LAJWAB PATERKARI LAJWAB SHABAD NAI ANKHON MAE ANSU LAA DIEY
AJJ INQULAB JINDABAAD K SATH SATH PANDEY G APKI KALAM KI BI ZINDABAAD OR VISFOT.COM BI ZINDABAAD.
AJJ SAE ROOJ 5 NAEY DOSTON KO VISFOT.COM K BARREY MAE BATONGA
SACH MAE ANIL BHAI JANTAR MANTAR KA JO ASLI DARD APKI KALM NAE LIKH DALA USSKEY LIEY AAP SADUTAV K PATAR HAIN
BARREY DINO SAE SOCH REHA THA ISS ARTICLE PAE KYA COMMENT KARU BAHOOT SOCHA DIL SAE BI OOR DIMAG SAE BI BASS YAHI NIKLA ZINDABAAD
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saaz@rediffmail.com on 23 March, 2010 16:16;01
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khati patrakarita
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10nov@rediffmail.com on 23 March, 2010 16:19;37
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खटिया पत्रकारिता है मैं भी मिला हूँ. उन्होंने काफी ऐसा नहीं कहा-
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pushyamitra on 23 March, 2010 18:28;16
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बहुत खूबसूरत!

अपनी और अपने साझेदारों की हवेलियाँ भरने में जुटी सरकारें अब जरा सा विरोध भी बर्दास्त नहीं कर पाती. सरकारें जंतर मंतर पर रोड रोलर नहीं चलवा रही यही क्या कम है. लोग न्याय मांगते मांगते पागल हो जाते हैं और सरकार भिखमंगों और प्रदर्शनकारियों में कोई फर्क नहीं समझती और करती है. आपने वाकई बहुत ही मार्मिक खबर से हमें बाखर किया है.

धन्यवाद्
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संजय तिवारी on 23 March, 2010 19:22;10
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वैसे एक जानकारी आप लोगों के लिए जंतर मंतर से मछिन्द्रनाथ को हटा दिया गया है. मछिन्द्रनाथ जैसे और भी ऐसे आंदोलनकारी जो स्थाई रूप से वहां जम गये थे उन्हें वहां से जबरन रुखसत करने पर मजबूर कर दिया गया है.

अब डीडीए ने विरोध का नया नियम बनाया है. सुबह दस से पांच. इसलिए जिनका भी विरोध का स्थाई डेरा बसेरा था वह उजाड़ दिया गया है.
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image अनिल पाण्डेय पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. वर्तमान में 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
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