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दस थाली टूट गयी पर सरकार नींद में गाफिल

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थाली बजाकर विरोध करने का तरीका बहुत निराला और मार्मिक होता है. थाली उस वक्त बजायी जाती है जब दरिद्र से मुक्ति पानी हो. नागपुर में धरने पर बैठी ये विधवा महिलाएं थाली बजाकर अपने दरिद्रपन से मुक्ति पाने की गुहार कर रही हैं लेकिन दस थालियों के टूट जाने के बाद भी अब तक सरकार को उनकी आवाज सुनाई नहीं दी है.

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में विधानमंडल का शीत सत्र समाप्ति पर है। नागपुर के पॉश इलाके सिविल लाइन्स स्थित हिस्लॉप कॉलेज से विधायक निवास की ओर जाने वाली सड़क के किनारे अस्थायी पंडाल में करीब दर्जन भर से ज्यादा संगठन विविध मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। इनमें से एक संगठन है संजय गांधी निराधार मोर्चा। राज्य में विधवा व निराधार महिलाओं के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तीन योजनाएं चल रही हैं पर तीनों योजनाओं का लाभ योग्य निराधार महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है। सरकार ने विधवा महिलाओं को राहत के लिए दस हजार की आर्थिक सहायता की लिए योजना बनाई है।

चार दिन शीतसत्र की कार्यवाही नहीं होने के बाद जहां धरना देने वाले दूसरे प्रदर्शनकारी वापस चले गए। वहीं यह संगठन सुबह से शाम तक लगातार डटा रहा। धरने पर बैठी महिलाएं इस राह से गुजरने वाले हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचती रही। मोर्च में हर दिन करीब सौ निराधार विधवा महिलाएं लगातार चम्मच बजा रही हैं। धरना को संगठित करने वाले वसंतराव मोटघरे कहते हैं कि महिलाएं 9 दिसंबर से धरने पर बैठी हैं। लगातार थाली बजाने के कारण दस थाली टूट चुकी है। बाकी सभी थाली टूटने के कगार पर हैं पर निराधार विधवाओं के प्रति जनप्रतिनिधियों में मन में इतनी भी दया नहीं उमड़ी कि वे यहां आकर बेसहारा महिलाओं का दु:ख -दर्द समझ सकें। धरने पर बैठी अधिकतर महिलाएं बुजुर्ग हैं। इनकी शिकायत है कि सरकार पेंशन नहीं दे रही है। कई महिलाएं ऐसी हैं जिनका कई साल बाद अचानक बंद हो गया। पेंशन लेने के लिए सरकार ने औपचारिकाताओं के कई पेंच लगा दिए। तमाम जद्दोजहद के बाद भी सैकड़ों महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें पेंशन नहीं मिलती। जिला कार्यालय में जाने पर संबंधित विभाग का बाबू कहते हैं कि पेंशन जारी कर दिया गया है, पोस्ट ऑफिस में पता करो। पोस्ट ऑफीस में जाने पर डाक बाबू कहते हैं जिला कार्यालय जाओ, अभी खाते में पेंशन आई नहीं।

धरने में बैठी 75 साल की लक्ष्मी बाई महादेव वर्मा कांपते हाथों से चम्मच पकड़ थाली बजा रही है। कहती हैं कि उनका कोई नहीं है। सरकारी पेंशन का बड़ा सहारा था। गत दो साल से अचानक पेंशन बंद हो गई। कहती हैं कि उनकी दो बेटियां है। गरीबी के कारण बड़ी बेटी के विवाह की उम्र निकल गई। वह मजदूरी करती है और अपना गुजरा स्वयं करती है। दूसरी बेटी का विवाह मुल्ल्ले के लोंगों ने चंदा जमा कर कराया। अब अपना गुजारा करने के लिए मुहल्ले के तबेले से गोबर लेकर उपले बनाकर बेचती हैं। तभी पास खड़ी हीराबाई ने कहा- झूठ क्यों बोलती हो। सच बताओ की खान मस्जिद में भीख मांग कर गुजारा करती हो। हीरा बाई की भी पेंशन दो पांच साल से रुकी है। पेंशन चालू करने के लिए दलाल पैसे मांगता है जो देने के लिए नहीं है। शशिकाला मदने की भी पेंशन रुकी है। दूसरे के घर बर्तन मांज कर गुजरा करती है। पर अब कांपते हाथों से बर्तन ठीक से साफ नहीं होता है।

सुमन तलमले का पति 15 साल पहले ही भाग गया। जन्म से ही पंजों के विकृति होने से कोई काम ठीक से नहीं करती। भाई के दया पर गुजारा चल रहा है। बतूल बी शेख बब्बू कहती है कि दस साल पहले सरकारी दफ्तर के काफी चक्कर काटने के बाद दस हजार की राशि मिली पर पेंशन शुरू करने में नाकामयाब रही। पांच सौ रुपये की विधवा पेंशन लेने के लिए हर साल सरकार को यह दिखाना पड़ता है कि आवेदक जिंदा है। इसके लिए अस्तित्व प्रमाण पत्र बनाने के लिए विधवाओं को सरकारी अस्पताल का लगातर चक्कर काटने पड़ते हैं। संजय गांधी निराधार मोर्चा के कार्यकर्ताओं का कहना है कि अस्पाल वाले यह प्रमाण पत्र देने में काफी परेशान करते रहे। सामान्य मेडिकल जांच कर जारी होने वाले प्रमाण पत्र में महिनों का समय लग जाता है। बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं चलता है। इसी बीच मिलने वाली पेंशन रूक जाती है। बाद में कुछ महीने बाद जब यह प्रमाण पत्र जिला कार्यालय के संबंधित विभाग में जमा किया जाता है तो फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल के बीच ही अटक जाती है।

वर्ष 2004 से 2006 के दौरान विधवा हुई सैकड़ों महिलाओं की राहत राशि अभी तक नहीं मिली है। अब सरकार ने इस वर्ष में विधवा हुई महिलाओं को राशि देने से मना कर दिया है। सरकार का कहना है कि 2006 तक के विधवा महिलाओं के आवेदनों को स्वीकृत कर उन्हें राशि दी जा चुकी है। लेकिन धरने में बैठी कई गरीब और बेवश महिलाएं ऐसी हैं जो 2004 से 2006 के दौरान विधवा हुई थी। राहत राशि के लिए आवेद भी दिया था। लेकिन आवेदन का कुछ पता नहीं चला। फिलहाल सरकार 2006 से वर्ष 2009 में विधवा हुई महिलाओं के आवेदन स्वीकार कर रही है। पर आवेदन करने वाली उन्हीं महिलाओं को राहत रशि की चेक मिल रही है जिन्होंने किसी दलाल के माध्यम से आवेदन दे रही है। धरने के संयोजक वसंतराव मोटघरे का कहना है कि जिन विधवा महिलाओं के घर में कोई सदस्य है, वे कहीं से कमीशन की राशि जुगत कर राहत राशि प्राप्त कर रहे रहे हैं, लेकिन मूल राहत राशि कमीशन का कर्ज चुकाने के बाद महज पांच हजार रूपये ही रह जाती है। चेक वितरण में भारी धांधली हो रही है। दलालों का एक सक्रिय गिरोह केंद्र सरकार को करोड़ों का चूना लगा रहा है। चेक वितरण की धांधली को यदि सरकार सीआईडी जांच कराये तो कई अधिकारी हेराफेरी में फंसेंगे।

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image संजय स्वदेश किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं। sanjayinmedia@rediffmail.com
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