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राजनीति की पहली पाठशाला में चाहिए आरक्षण

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image छात्रसंघ चुनावों की घोषणा का स्वागत और अपने लिए आरक्षण की माँग करती छात्राएं

राजस्थान में छात्र संघ चुनावों पर रोक थी. अब आगामी शिक्षण सत्र से ये चुनाव आरम्भ हो जाऐगें. इसके लिए मुख्यमंत्री घोषणा पत्र के किये वायदे के अनुरूप मंजूरी दे दी है. राजनीति की पहली पाठशाला माने जाने वाले कालेज छात्रसंघों की क्लास अब फिर से शुरू होने जा रही है. लेकिन इसके फिर से शुरू होने से पहले ही छात्राओं ने अपने लिए आरक्षण की माँग करके राजनीति को फिर से गरमा दिया है.

प्रदेश में पिछले पाँच सालों से छात्र संघ के चुनावों पर रोक थी. न्यायालय में चले लम्बे विवाद के बाद आखिर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव चाहने वालों की जीत हुई. उधर कांग्रेस ने भी विधानसभा चुनावों के अपने घोषणा पत्र में छात्र संघ चुनावों का वायदा किया था. लोकसभा और शहरी निकायों के चुनावों के चलते सरकार छात्र संघ चुनावों को चालू सत्र में तो नही करा पाई. उधर प्रदेश में 5 वर्षो में किनारे हो गये छात्र संघ भी इस दिशा में कोई बुलंद आवाज नहीं उठा पाये थे. वैसे चुनावों की घोषणा के साथ ही प्रदेश में छात्र संगठनों की गतिविधियाँ तेज हो गई है.

प्रदेश में छात्र संघ के चुनाव शिक्षण सत्र 2004-05 में आखिरी बार हुये थे. उसके बाद से छात्र संघ चुनावों पर रोक लगा दी गई. छात्र संघ चुनावों की रोक का प्रभाव ऐसा पडा कि प्रदेश में राजनैतिक दलों की छात्र ईकाईयाँ पूरी तरह से निष्क्रिय हो गई. इतना ही नहीं विश्वविधालय और महाविद्यालयों में विद्यार्थी भी कम रूचि लेने लग गये थे. कालेजों में छात्रों की संख्या न के बराबर रह गई. छात्र संघ चुनावों की घोषणा के साथ ही छात्र संगठनों की गतिविधियाँ एक दम से बढ गई है. लेकिन छात्राओं के द्वारा की जा रही आरक्षण की माँग ने उन्हें फिलहाल बैक फुट पर ला दिया है. इतना निश्चित है कि आगामी शिक्षण सत्र में काँलेजों में फिर से खोई रौनक वापिस आ जाएगी.

प्रदेश में छात्र संघ चुनावों को लेकर उच्च न्यायालय की दो पीठों के निर्णयों को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी. सर्वप्रथम उच्च न्यायालय की वृहद पीठ जोधपुर ने राज्य में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के अनुसार चुनाव कराने के आदेश दिये थे. जिनमें ये कहा गया था कि हिंसा मुक्त वातावरण में चुनाव सम्पन्न कराये जाए. इस हेतु सरकार से कानूनों में आवश्यक संशोधन करने की भी बात कही थी. इसके बाद न्यायालय की जयपुर पीठ ने 5 मई 05 के अपने एक आदेश में मैरिट में आये विद्यार्थियों में से छात्रसंघ के पदाधिकारी चुनने की बात कह दी. तो 13 मई 05 को जोधपुर की एक अन्य पीठ ने एक जनहित याचिका पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनाव कराये जाने संबधी फैसला सुना दिया. ये फैसला उसने अपने क्षेत्राधिकार के तीन विश्वविधालयों और उनसे संबधित काँलेजों के लिए दिया था.

दोनों फैसलों से प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी. दोनों  विरोधाभासी फैसलों के चलते 18 मई 05 को ये फैसला करने का अधिकार वृहदपीठ को सोंप दिया गया था. हाल ही में वृहदपीठ ने सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुये फैसला दिया है कि ‘‘ सरकार लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के अनुसार छात्र. संघों के चुनाव कराना चाहती है जिससे न्यायालय संतुष्ट है. साथ ही उसने पुराने सभी आदेशों को निरस्त कर दिया है. सरकार की ओर से हरी झंडी मिलते ही छात्र राजनीति करने वाले संगठनों ने अपने निष्क्रिय तंत्र को सुचारू करना आरम्भ कर दिया है. इसके साथ ही चुनावी मुददों पर अपनी राय जाहिर करना शुरू कर दिया है. प्रदेश में भाजपा के एबीवीपी और कांग्रेस के एनएसयूआई छात्र संगठनों का ही दबदबा है. इनके अलावा इक्का दुक्का संगठन क्षेत्र विशेष में ही सक्रिय है.

अखिल भारतीय विधार्थी परिषद के प्रदेश संगठन मंत्री विक्रांत खंडेलवाल का कहना है कि परिषद ‘सेव कैंपस’ के मुददे को छात्रों के बीच ले जाऐगी. इसके साथ ही वो ‘ग्रीन कैंपस,क्लीन कैंपस’ की भी बात को आगे रखना चाहते है. खंडेलवाल मानते है कि प्रदेश में शिक्षा तंत्र पूरी तरह से विफल हो गया है ऐसे में चुनावों के दौरान परीक्षा प्रणाली में सुधार और परिणामों में देरी होने पर प्रशासन की जबाबदेही होने की बात भी प्रभावी तरीके से सामपने लाई जाएगी. उधर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन की प्रदेश अध्यक्ष रंजू रमावत का मानना है कि वो राहुल गांधी की विचार धारा को आगे बढाते हुये ‘युवा अधिकारों’ को चुनावों के दौरान प्रमुख मुददा बनाएगी.. उनका मानना है कि युवाओं को अधिक से अधिक अधिकार दिये जाऐ जिससे वो आगे बढ सकें. वही एसएफआई का मानना है कि वो कैंपस में जातिवाद के वढते स्वरूप को लेकर छात्र से रायशुमारी कराऐगें.

प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों की घोषणा होते ही एक बडा मामला और सामने आया है. हाँल ही में सरकार ने पंचायतीराज और शहरी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की सीमा 33 से बढाकर 50 प्रतिशत की है. अब छात्र संघ के चुनावों में भी छात्राओं ने अपने लिए आरक्षण की माँग करना आरम्भ कर दिया है. ये माँग राजस्थान विश्वविधालय की छात्राओं की ओर से सामने आई है. उधर प्रदेश भर में छात्राऐं इस बात कों मुखर होती नजर आ रही है. इन छात्राओं का मानना है कि छात्रसंघ से ही उनके लिए राजनीति के रास्ते खुलेगें. छात्राओं के द्वारा की जा रही आरक्षण की माँग पर छात्र संगठन अभी कुछ भी कहने से बच रहे है. वही प्रदेश की कुछ महिला विधायक उनके साथ खडी दिख रही है.  अजमेर दक्षिण से भाजपा  विधायक अनीता भदेल कहती है कि छात्रसंघों में छात्राओं की भागेदारी बढाने के लिए उनके लिए आरक्षण का प्रावधान करना जरूरी है. वही कांग्रेस की एक विधायक परम नवदीप का कहना है कि राजनीति की पहली पाठशाला में छात्राओं को आरक्षण जरूरी है. भरतपुर के नगर क्षेत्र से भाजपा विधायक अनीता सिंह का कहना है कि राजनीति में महिलाओं को आगे बढाने के लिए छात्रसंघों में आरक्षण जरूरी है.

प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों की घोषणा के साथ ही छात्रा आरक्षण के मुददे पर सरकार की ओर से अभी कुछ भी नहीं कहा जा रहा है. उधर छात्राओं की ओर से अपनी माँग के पक्ष में लगातार माहौल बनाया जा रहा है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि छात्राऐं अपनी माँग को किस सीमा तक ले जाती है. और सरकार का रवैया किस प्रकार का रहता है. इतना जरूर है कि इस मुददे पर प्रदेश में राजनीति गरमाना शुरू हो गई है.

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रमेश on 17 January, 2010 14:11;07
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छात्राओं को आरक्षण नहीं माँगना चाहिए। उनके तो चेहरे देखकर वैसे ही काँलेज विश्वविधालय में वोट दे देते है।
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग.
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