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15 हजार मछुआरे क्या मराठी माणुस नहीं हैं?

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मुंबई से लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पर महाराष्ट्र का एक जिला है- रत्नागिरी। जिले की आबादी लगभग 17 लाख है जिले में कुल 9 तालुकाएं है मंडनगढ़, दापोली, खेड़, चिपलून, गुहागर, संगमेश्वर, लोज़ा, राजापुर, और रत्नागिरी। रत्नागिरी तालुका में समुद्र के किनारे दो गाँव है (1) गोलप मोहल्ला (2) पावस, इन दोनों गावों में लगभग 5000 मछुआरों का परिवार रहता है जिसमें हिन्दू कोली समुदाय और मुस्लिम दाल्दी समुदाय के लोग है और यह दोनों समुदाय मिलजुल कर समुद्र से मछली पकड़कर अपनी आजीविका चलाते है।

मछली पकड़ने का यह कार्य इनका पुस्तैनी धंधा है और लगभग 15,000 लोग इस धंधे पर आश्रित हैं। ये लोग मछली पकड़ने के इस व्यवसाय को सदियों से करते चले आ रहे है किन्तु अब इन मछुआरों का मछली पकड़ने का व्यवसाय खतरे में पड़ गया है अब इन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है इनके नजरों के सामने ही इनके व्यवसाय को तहस-नहस किया जा रहा है.

इन मछुआरों के रोजगार को तहस-नहस करने के पीछे एक कंपनी है जो कि 20 वर्ष पहले यहाँ आयी है। कंपनी का नाम है फिनोलेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड। स्थानीय लोग एवं कंपनी से पीड़ित मछुआरे बताते है कि इस कंपनी और कंपनी के मालिक को मराठा क्षत्रप शरद पवार का आशीर्वाद प्राप्त है इसलिए इन मछुआरों की व्यथा को स्थानीय समाचार पत्रों में भी जगह नहीं मिलती। इलेक्ट्रानिक मिडिया तो दूर की बात है क्योकि यह कंपनी इन्हें नियमित रूप से विज्ञापन देती रहती है सो मछुआरों के इन सवालों से मिडिया नें अपने आपको अलग कर लिया है. चूँकि कंपनी को शरद पवार का आशीर्वाद प्राप्त है इसलिए किसी स्थानीय नेता की इन मछुआरों के पक्ष में खड़े होने की हिम्मत नहीं है. अब ये मछुआरे अपने आपको मछली पकड़ने के अपने पुस्तैनी व्यवसाय से बेदखल किये जाते असहाय होकर देख रहे है कंपनी द्वारा इनके व्यवसाय पर हमले के विरुद्ध उक्त गांव के सभी मछुआरे अपने-अपने घरों के छतों पर कंपनी के अत्याचार के विरोध स्वरूप काले झंडे लगा रखें  है.

फिनोलेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 20 वर्ष पहले यहाँ आकर अपनी जेट्टी बनाया था तथा दूर समुद्र में खड़े मालवाहक जहाजों से माल बार्जों पर लाद कर अपनी जेट्टी तक लाती है। कंपनी को रनपार बंदर के इर्द-गिर्द के समुद्र में किसी की दखलंदाजी बर्दास्त नहीं। कंपनी नहीं चाहती कि मछुआरे मछली पकड़ने के लिए समुद्र में आवाजाही करें। हालाँकि अब तक कंपनी के किसी अधिकारी ने खुलकर इस बारे में कुछ नहीं कहा है. मछुआरों की रनपार बंदर में अपनी एक जेट्टी है. मौजूदा समय में मछुआरों के पास 4 बड़े यांत्रिक बोट (ट्रालर), 60 छोटे यांत्रिक बोट, 20 सादा बोट (बिना यन्त्र के) हैं. मछुआरे इन बोटों को रनपार बंदर में रखते है. रनपार बंदर अंग्रेजी के U के आकर का है. मछुआरे बताते है कि कंपनी के बार्जों के लगातार आवाजाही से भारी मात्रा में रेत किनारे पर बह कर आ जाती है जिसमें मछुआरों की बोट फंस जाती है. मछुआरों की जेट्टी के आस-पास रेत पट जाने के वजह से समुद्र के ज्वार-भाटे की भरती जहाँ तक आती थी अब वहां रेत पट गयी है मछुआरों की बोटों का किनारे तक आना-जाना मुश्किल हो रही है, इस कारण से उन्हें भारी नुकसान सहना पड़ रहा है.

समुद्र में खड़े मालवाहक जहाजों तक बार्जों के आने-जाने के लिए कंपनी नें सिग्नल की बोई लगा रखी है जिसमें आये दिनों मछुआरों की मछली पकड़ने की जाली फंस कर फट जाती है. एक जाली के फटने से मछुआरों का लगभग 70 000/- रूपये का नुकसान हो रहा है. पहले जिस रास्ते से मछुआरे समुद्र में जाते थे अब उस रास्ते के बीचों-बीच से कंपनी के बार्ज मालवाहक जहाजों तक आ जा रहे है इस कारण कंपनी अब मछुआरों को सीधे समुद्र में जाने से सख्ती से रोक लगा रही है. इस वजह से अब मछुआरों को लगभग 8 किलोमीटर घूम कर समुद्र में जाना पड़ता है, जिसके कारण मछुआरों को हर बार अतिरिक्त 20 लीटर डीजल जलाना पड़ता है. इससे मछुआरों को हर बार समुद्र में जाने पर अतिरिक्त 800/- रूपये का बोझ पड़ रहा है जो कि मछुआरों के आर्थिक स्थिति को और खराब कर रहा है.

अपना अस्तित्व बचाने के लिए मछुआरे एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं लेकिन फिलहाल वे कामयाब नहीं हैं. अब यहां के मछुआरे कहने लगे हैं कि उनके पास दो ही रास्ते बचे हैं. या तो वे विदर्भ के किसानों की तरह आत्महत्या कर लें या फिर गढचिरौली और चंद्रपुर के आदिवासियों की तर्ज पर हथियार उठा लें और नक्सली हो जाएं. वर्ष 2006  में महाराष्ट्र राज्य की मत्स्य उद्योग मंत्री श्रीमती मीनाक्षी ताई पाटील के कार्यकाल में रनपार बंदर के मच्छीमार जेट्टी के विकास के लिए कुल 3  करोड़ रूपये का फंड पास किया गया था जिसमे मछुआरों के गांव से जेट्टी तक के सड़क का निर्माण, मच्छीमार जेट्टी का पुनर्विकास, मछुआरों द्वारा पकड़ी गयी मछलियों के नीलामी के लिए नीलाम घर  (आक्सन हॉउस) का निर्माण, मच्छीमार जेट्टी पर मछुआरों के लिए शौचालय एवं स्नान घर का निर्माण आदि के लिए था. मत्स्य विभाग द्वारा उक्त फंड से मछुआरों के जेट्टी का काम शुरू किया गया लगभग 65  लाख रूपये खर्च करके मछुआरों के गांव से मछुआरों की जेट्टी तक के सड़क का निर्माण कार्य शुरू किया गया और 12  फिट चौड़ी और 1 किलोमीटर लंबी सड़क बन भी गयी किन्तु मच्छीमार जेट्टी का सरकारी फंड से विकास होते देख  फिनोलेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड नें रत्नागिरी सत्र न्यायालय में दिनांक 12 /03 /2006 को (दीवानी वाद क्र. रे.मु.नं. 73 / 2006 ) सहायक संचालक मत्स्य विभाग, रत्नागिरी कोल्हापुर के विरूद्ध मुकदमा दायर कर दिनांक 17 /03 /2006 को उक्त निर्माण कार्य पर एकतरफा स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया. जब इस स्थगन आदेश के बारे में मछुआरों नें पता किया तो पता चला कि मत्स्य विभाग नें मुकद्दमें की पैरवी के लिए सत्र  न्यायालय में अपना वकील ही नहीं खड़ा किया था जिसके कारण कंपनी को एकतरफा स्थगन आदेश प्राप्त हो गया मछुआरों का कहना है कि कंपनी तो हमारे पीछे पड़ी है किन्तु महाराष्ट्र राज्य मत्स्य विभाग द्वारा भी कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए मुकद्दमे की पैरवी के लिए वकील न खड़ा करके हमारे साथ धोखाधड़ी की गयी  है महाराष्ट्र सरकार द्वारा मच्छीमार जेट्टी के विकास के लिए पास किये गये  3 करोड़ रूपये  में से बाकी बचे 2 करोड़ 35 लाख रूपये वैसे ही पड़े है.
 
मछुआरों की दो सोसायटियां है (1) परशुराम मच्छीमार सोसायटी, (2) पावस मच्छीमार सोसायटी, इन दोनों सोसायटियों के पदाधिकारी कंपनी के इस कार्रवाई से और मत्स्य विभाग द्वारा कंपनी का साथ देने से अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे है. मछुआरों के अनुसार कंपनी जिस जमीन को अपनी जमीन बताकर सत्र न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त किया वह सी.आर.जेड. ( केंद्र सरकार) की जमीन है और वहां तक ज्वार-भाटे के समय समुद्र की भरती आती है दोनों सोसायटियों के पदाधिकारी सुरेन्द्र भडेकर, विट्ठल पावस्कर, प्रशांत हरचेकर, गणेश सुर्वे, जिक्रिया पावस्कर, शफी भुजबा, आदि मछुआरों के प्रतिनिधि के रूप में श्रीमती पाटील के बाद मत्स्य उद्योग मंत्री हसन मुश्रीफ़ से मिले और मछुआरों पर कंपनी द्वारा किये जा रहे अत्याचार को रोकने की गुहार लगायी. मछुआरों के प्रतिनिधि मंडल नें मांग की कि कंपनी के स्थगन आदेश के विरूद्ध हम सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे हमें मत्स्य विभाग अनुमती दे किन्तु हसन मुश्रिफ ने मछुआरों के अनुरोध को अनसुना कर दिया. इसके बाद भी मछुआरों के प्रतिनिधि मंडल नें अपना प्रयास जारी रखते हुए बंदर विकास मंत्री प्रीतम कुमार शेगावकर से मिले किन्तु वहां से भी मछुआरों को बैरंग वापस लौटना पड़ा. मछुआरे कहते है कि अब कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है हमारे सामने अब केवल दो रास्ते है या तो हम विदर्भ के किसानों की तरह आत्महत्या कर लें या गढ़चिरौली, चन्द्रपुर के आदिवासियों की तरह कंपनी, शासन और प्रशासन के विरुद्ध हथियार उठा लें.
 
स्थानीय जानकार कंपनी के इन करतूतों को पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बता रहे है इनके अनुसार रनपार बंदर का 8 किलोमीटर का समुद्री किनारा है और रनपार बंदर के तीन तरफ से पहाड़ है इस 8 किलोमीटर लंबे समुद्री किनारे पर समुद्री घास मैन्ग्रोस की बहुतायत है समुद्री मछलियां इन्ही समुद्री मैन्ग्रोस के पास अंडे देने आती है रनपार बंदर का समुद्री किनारा मछलियों के अंडे देने का सबसे पसंदीदा जगह था किन्तु अब कंपनी के  मालवाहक जहाज और बार्जों के आवाजाही से रनपार बंदर के समुद्री किनारे का पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है अब जब संयुक्त राष्ट्र नें वर्ष 2010 को बायोडाईवर्सिटी इयर यानि जैव विविधता वर्ष घोषित किया है कंपनी ( फिनोलेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड) रनपार बंदर के जैव विविधता को ध्वस्त करने पर तुली है. चूँकि यह कंपनी मछुआरों के रोजगार को छीन रही है इसलिए मछुआरे कंपनी के विरुद्ध आवाज उठा रहे है. मछली व्यवसाय के इस धंधे के कुल 15,000  आश्रितों के आजीविका को छीनने वाली इस कंपनी में केवल 300 लोग रोजगार पाते है जिसमे 26 लोग स्थानीय यानि मराठी माणुस हैं. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे, मनसे प्रमुख राज ठाकरे और मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण यह बताने की कोशिश करेंगे कि 15000 मछुआरे मराठी माणुस क्यों नहीं है?

(राजेश सिंह मानवाधिकार संगठन AIHRCO के अध्यक्ष हैं और नागरिक विकल्प नामक पत्रिका के संपादक हैं. संपर्क: nagrikvikalp@gmail.com)

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Sanjeet Tripathi on 28 February, 2010 00:59;11
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vakai ek bahut hi badhiya rapat.
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Jitendra Dave on 01 March, 2010 02:02;40
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अच्छी रपट. खोजपूर्ण बात जिसे मुख्यधारा का बिकाऊ मीडिया बताने से बचता है. लेकिन क्या करे भाई, शरद पंवार चीज ही ऐसी है? शक्कर से लेकर दाल और मछली को भी नहीं छोड़ा?
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Rajesh Sawant on 03 March, 2010 17:58;52
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बहुत खूब, बढ़िया, मराठी मानुष के नाम पर राजनीति करने वालों की पोल खोलती रिपोर्ट है
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