आंदोलन हो तो ऑनलाइन हो
गोपाल कृष्ण दिल्ली की एक संस्था टाक्सिक्स लिंक में काम करते थे. टाक्सिक्स लिंक जहरीले रसायनों पर काम करती है और उनके खिलाफ आंदोलन चलाती है. काम का तरीका एनजीओवादी है. इसलिए यहां काम करनेवाले लोग जमीन से ज्यादा कम्प्यूटर से जुड़े रहते हैं. गोपाल भी बाहर मैदान से ज्यादा बेसमेन्ट में अपने कम्प्यूटर पर सक्रिय रहते थे. तब आनलाइन दुनिया की अपनी कोई खास समझ नहीं थी.
इसलिए जब भी मिलने के लिए जाते तो कोफ्त होती. मैं जमीन पर काम करनेवाला आदमी. चिट्ठी लिखकर भेजो फिर फोन करो और लोगों को बुलाकर मीटिंग करो. फिर मिनट्स बनाओ और उन मिनट्स को डाक तार विभाग की मदद से लोगों को भेजो. मुझे ऐसा लगता था कि आंदोलन या विरोध का स्वरूप तो यही हो सकता है. इसमें प्रत्यक्ष तौर काम होता दिखाई दे रहा है. इसलिए अक्सर मैं गोपाल का यह कहते हुए मजाक बनाता था कि तुम लोग ईमेल से आंदोलन करके कोई क्रांति नहीं कर सकते. पांच साल बाद आज जब अपनी ही कही वह बात याद आती है तो अपनी अज्ञानता और आनलाईन दुनिया की अपार संभावना के बीच की दूरी का अहसास होता है. अब गोपाल मेरा मजाक उड़ाते हैं क्योंकि उनसे अधिक आनलाइन सक्रियता मेरी हो गयी है. फिर भी गोपाल इस माध्यम के महत्व को कभी कम करके नहीं आंका.
इसका सबसे बड़ा प्रमाण मिला है बीटी बैंगन के फैसले पर. बीटी बैंगन पर माहिको कंपनी के जबर्दस्त दबाव के बावजूद सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ा. केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी पर जब अनिश्चितकालीन रोक का ऐलान किया तो कई दिनों तक इंटरनेट पर उन ग्रुप्स, वेबसाईटों और फोरम पर खुशियां मनाई जाती रहीं जो पिछले साल सवा साल से बीटी बैंगन के खिलाफ नाक में दम किये हुए थे. एक पत्रकार होने के नाते सूचनाओं के स्रोत तक पहुंचना अपनी भी पहली प्राथमिकता है इसलिए ऐसे दर्जनों समूहों, फोरमों से जुड़ना जरूरी है जो किसी न किसी खास विषय पर केन्द्रित हैं. पूरे बीटी बैंगन आंदोलन के दौरान यह साफ महसूस हुआ कि आंदोलनकारी किसी भी सूरत में हार मानने के लिए तैयार नहीं थे. सरकार और कंपनी की ओर से जो भी चाल चली जाती इंटरनेट के माध्यम से उस चाल का जवाब तुरंत आंदोलन से जुड़े लोगों तक पहुंचा दिया जाता. मैंने देखा कि किस तरह से दुनिया भर के बीटी बैंगन विरोधी लोग आनलाईन माध्यम से अपने विरोध को पुख्ता कर रहे थे. जब बीटी बैंगन पर फैसला हुआ तो लोगों ने कहा कि यह जनसुनवाई का दबाव था. मेरा मानना इससे भिन्न है. अगर इंटरनेट न होता तो शायद बीटी बैंगन पर सरकार की अस्थाई रोक भी न होती. देशभर में नाम के लिए सुनवाई पूरी की जाती और दिल्ली आकर फैसला वही किया जाता जो कंपनी का हितसाधन करता. किसी कंपनी के खिलाफ यह फैसला एक ऐसी सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्री ने लिया जो कहती है कि निजी क्षेत्र का विकास ही विकास के केन्द्र में आ गये हैं. ऐसे में भला सरकार किसी कंपनी को नुकसान पहुंचाने की हिम्मत कैसे जुटा पाती? लेकिन आजादी के इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ जब सरकार ने कंपनी, कंपनी समर्थक मीडिया के खिलाफ जाकर कोई फैसला किया. ऐसा सिर्फ इसलिए संभव हो सका क्योंकि आनलाईन दुनिया की ताकत को मंत्री जी दरकिनार नहीं कर सकते थे. बीटी बैंगन पर लड़ाई लड़नेवाली संस्था ग्रीनपीस ने तो समूचे बीटी आंदोलन को ही ई-आकार में ढाल दिया है. इसी तरह पंजाब में खेती विरासत मिशन भी जितना जमीन पर सक्रिय है उतना ही इंटरनेट पर भी.
इंटरनेट के उदय और विस्तार से आंदोलनकारियों को वह मौका प्रदान कर दिया है जो कारपोरेट मीडिया माध्यम उन्हें नहीं दे रहे थे. अब अगर कोई उनका पक्ष जानना चाहे तो समग्रता में उनकी बात जान सकता है. इंटरनेट की महिमा के कारण अब आंदोलन समूहों को भी वही पहुंच प्राप्त है जो कारपोरेट मीडिया जगत को. इंटरनेट के रूप में आंदोलन समूहों को ऐसा हथियार मिल गया है जिसे वे कारपोरेट मीडिया के समानांतर संचालित कर सकते हैं और कम ही सही लेकिन आसानी से उन लोगों के पास अपनी बात पहुंचा सकते हैं जो उनका पक्ष सुनना चाहते हैं.
ऐसा नहीं है कि आनलाईन दुनिया की ताकत समूह में ही पैदा हो रही है. एक अकेला आदमी भी चाहे तो आनलाईन दुनिया का इस्तेमाल करके असर पैदा कर सकता है. दिल्ली में रहनेवाले मैथिली गुप्त और उनकी पत्नी निशा ने आनलाइन माध्यम का ही इस्तेमाल करके नोएडा में मोबाइल टावरों को रहिवासी इलाकों से न केवल हटाने पर मजबूर कर दिया बल्कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और कंपनियों को मजबूर कर दिया कि आगे से वे रहिवासी इलाकों में कोई मोबाइल टावर नहीं लगा सकेंगे. जैसे बीटी बैंगन के सवाल पर मीडिया का बड़ा वर्ग कंपनी की तरफदारी कर रहा था और कह रहा था कि सरकार के इस फैसले से "वैज्ञानिक शोध" को धक्का पहुंचेगा उसी तरह से मैथिली गुप्त की लड़ाई में भी मीडिया ने तब खबर प्रकाशित की जब प्राधिकरण के आदेश के बाद मोबाइल टावरों को निष्क्रिय कर दिया गया. खबर भी सिर्फ यही आयी कि इससे नागरिकों को परेशानी हो रही है लेिकन रहिवासी इलाकों में मोबाइल टावर इंसानों के लिए कितने खतरनाक हैं इसे मीडिया ने कभी जिक्र करने की जहमत नहीं उठायी. मैथिली गुप्त बताते हैं कि उन्होंने न तो किसी अखबार और टीवी चैनल वाले का सहारा लिया और न ही किसी नेता को इस मामले में शामिल किया. उन्होंने सिर्फ आरटीआई और इंटरनेट के जरिए यह पूरी लड़ाई लड़ी और वे लोग विजयी साबित हुए. अब नोएडा प्राधिकरण ने गाईडलाईन जारी की है जिसमें मोबाइल टावर लगाने के लिए विस्तृत प्रावधान किये गये हैं. ई-आंदोलन की यह दूसरी बड़ी सफलता है.
ई-आंदोलनों की भारत में सफलता की कुछ इक्का दुक्का कहानियों के सहारे साफ तौर पर समझा जा सकता है कि देश में न केवल ई-पत्रकारिता की भरपूर संभावना है बल्कि ई-आंदोलनों ने आंदोलनकारियों को लड़ाई का नया हथियार दे दिया है जहां वे द्रुत गति से सूचनाओं का आदान प्रदान कर सकते हैं और अपना समर्थक वर्ग पैदा कर सकते हैं. इसमें न तो देश की कोई सीमारेखा आड़े आती है और न ही संवाद के साधन कभी कोई बाधा बनते हैं. हालांकि अभी भी सिर्फ राजनीतिक रूप से जितने भी ई-प्रयास किये गये हैं वे दिखावटी और सजावटी ही साबित हुए हैं लेकिन सामाजिक क्षेत्र में ई-आंदोलनों ने सफलता की कहानी लिखनी शुरू कर दी है. इंटरनेट पर उदित होते इस जंतर-मंतर की अहमियत दिल्ली के उस जंतर-मंतर से कतई कम नहीं है जो विरोध प्रदर्शन का प्रतीक है. उस जंतर-मंतर से भले ही परिणाम शायद ही कभी निकलते हों लेकिन इंटरनेट का यह जंतर-मंतर परिणामकारी साबित हो रहा है. देर से ही सही गोपाल की कम्प्यूटर क्रांति का महत्व अब समझ में आने लगा है.
(अगर आपके पास भी इस तरह के ई-आंदोलन की कोई जानकारी है तो आप हमें visfot@visfot.com पर भेज सकते हैं जिसके बारे में हम लोगों को बताएंगे.)
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
http://hindi.gougram.org/
वैबसाइट अंग्रेज़ी, हिंदी और कन्नड़ में है। हिंदी कच्ची है।
dur huyi baten Bhranti ki.
chamtkar ghar ghar ho raha.
Jago Insan jago computer har paksh me chha raha.
Post your comment