24 साल बाद मिली 'काजू' को जमीन
आखिरकार उड़ीसा के कोरापुट जिले में पिछले 24 सालों से चला आ रहा आदिवासियों का आंदोलन थम गया है। आदिवासियों का यह आंदोलन काजू फल की खेती को लेकर था जिसमें वे फसल उगाने के लिए जमीन पर अधिकारों की मांग कर रहे थे। देश में उड़ीसा काजू के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सबसे पहले इस आंदोलन की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। उड़ीसा में 20 जिले ऐसे हैं जहां काजू की खेती बहुतायत में होती है। आदिवासी और दलित बहुल इस राज्य में काजू के उत्पादन पर इन दोनों वर्गों का अधिपत्य रहा है, लेकिन खेती-गृहस्ती का इनका सिलसिला बहुत दिनों तक चल नहीं पाया।
कोरापुट जिले में मृदा संरक्षण के नाम पर ओड़िसा स्टेट केश्यू डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (ओएससीडीसी) ने 30690.5 हेक्टेयर भूमि पर इस फसल को उगाना शुरू किया। काजू की खेती के अलावा लगभग पिले 30 सालों तक यह निगम फसल उगाने की निविदा का अधिकार भी अपने से बांटता रहा। निगम को इससे अच्छा मुनाफा मिलता था। लेकिन अधिकारों से वंचित रहे आदिवासी और दलित हाशिए पर चले गए। आमदनी का एकमात्र जरिया ओड़िसा सरकार के इस निगम ने बंधक बना लिया। अधिकारों के पुनर्बहाली के लिए इस आबादी के पास विरोध और आंदोलन के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। सो, सबसे पहले फसल उगाने के अधिकार को लेकर इन्होंने विरोध करना शुरू किया। निगम के नियम-कानूनों की अवज्ञा शुरू की। परिणामत: पिछले कुछ वर्षों से इस समुदाय ने निगम के निविदा संबंधी प्रक्रिया को उलट कर निगम की जमीन पर बलात् खेती आरंभ कर दी थी। इस विरोध का परिणाम यह हुआ कि मसले को सुलझाने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को खुद सामने आना पड़ा।
31 जुलाई 2008 को एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता पटनायक ने की, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि इस फसल को उगाने का अधिकार आदिवासियों और दलितों को दे दिया जाए। मोडिफाइड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी और क्लस्टर एरिया के नाम से चिन्हित क्षेत्रों में आदिवासियों और दलितों की बहुलता को देख उन्हें खेती का अधिकार प्रदान किया गया। इसका सबसे ज्यादा फायदा कोरापुट जिले के आदिवासियों को मिलेगा, जहां काजू की खेती सबसे बड़े पैमाने पर होती है। इस क्षेत्र के अंतर्गत 6,608 हेक्टेयर भूमि आती है। इस समुदाय को मिलने वाले अधिकार की जहां तक बात है तो उन्हें सिर्फ भूमि के रेहन संबंधी अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिसमें वे फसल तो उगा सकेंगे लेकिन भूमि का स्वामित्व उनका नहीं होगा। किसी परिवार को 0.8 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि नहीं दी जा सकती और प्राथमिकता उन आदिवासियों को दी जाएगी जो भूमिहीन हैं। इसके बाद की सूची में गरीबी रेखा से नीचे के छोटे और सीमांत आदिवासी आते हैं। इसके बाद जो जमीन बचती है उसे गरीब पिछड़ी जातियों में बांटने का प्रावधान है। नवीन पटनायक की अध्यक्षता वाली समिति ने ही यह तय किया कि जमीन आवंटन की प्रक्रिया होगी। यह आवंटन क्षेत्र के ग्राम सभा, प्रखंड विकास पदाधिकारी, ओएससीडीसी के प्रतिनिधियों और मृदा संरक्षण विभाग की आपसी सहमति के आधार पर की जाएगी। इसके लिए कमेटी का गठन तो शुरू हो गया है लेकिन चुनावों के कारण आवंटन में देरी की संभावना है। आदिवासियों ने इस अधिकार प्राप्ति के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। घेराव और विरोध प्रदर्शन उनकी आम जिंदगी में शामिल हो गयी थी। कुछ आदिवासियों का कहना है कि उनकी लड़ाई सिर्फ निगम और सरकार से ही नहीं था वरन् व्यापारियों, धन्नासेठों और पुलिस व्यवस्था से भी थी। क्योंकि इस पूरी मशीनरी ने उनके अधिकारों पर धावा बोल रखा था। हालांकि उनकी लड़ाई अभी थमी नहीं है। वे रेहन संबंधी अधिकारों से संतुष्ट नहीं हैं, वे जमीन पर अपने स्वामित्व को लेकर आगे आने की फिराक में हैं।
संरक्षण बनाम भक्षण : कोरापुट में बांध के अंतर्गत बहुत सारी बंजर जमीन आती है। 1950 के आसपास मृदा संरक्षण विभाग ने इस क्षेत्रों में भूमि अपरदन रोकने के लिए काजू की खेती आरंभ की। सरकार ने यह पहल उस क्षेत्र से गरीबी कम करने के लिए की थी। लेकिन सरकार की नीतियां आदिवासीजनों के विरुद्ध थी। जिस बंजर जमीन पर विभाग ने फसल उगाना शुरू किया, उस पर क्षेत्र के आदिवासी काफी लंबे दिनों से खेती करते आ रहे थे। लेकिन उस जमीन का अधिकार आदिवासियों या दलितों को नहीं दिया गया था। इसके पीछे कारण उनकी जमीन को लेकर अनभिज्ञता थी या सर्वे की खामियां।
विभाग जब फसल उगाना शुरू किया तो आदिवासियों का एक तबका इसके विरोध में आगे आया। अपनी ही जमीन पर सरकार द्वारा खेती और उसका मुनाफा उनके हाथों से सरकता देख दिनों-दिन विरोध के स्वर मुखर होते गए। सरकार ने इस खतरे को भांप इन समुदायों को यह आश्वासन दिया कि लगाए जाने वाली फसल की उपज उन्हें ही दी जाएगी। इस आश्वासन पर इलाके के आदिवासी चुप्पी साध गए और फसलों की निगरानी में ईमानदारी से जुट गए। लेकिन मृदा संरक्षण विभाग ने उनके विश्वास के साथ धोखा किया और फसल पकते ही उसे काट ले गए तथा उसे बेच पैसा भी बनाया। यह आदिवासियों के लिए बहुत बड़ा झटका था। क्योंकि सरकार ने संरक्षण के नाम पर भक्षण की नीति अपनाई।
कोरापुट जिले की कुल आबादी का आधा हिस्सा आदिवासियों का है लेकिन निजी जमीन का आवंटन देखें तो कुल जमीन का एक तिहाई भी उनके जिम्मे नहीं है। रही-सही कसर क्षेत्र में बांध निर्माण ने पूरी कर दी जिसमें अधिकांश जनसंख्या को अपनी जमीन छोड़ पलायन करना पड़ा। 1979 में जब ओएससीडीसी की स्थापना हुई तब सरकार ने इस निगम को फसल उगाने और निविदा जारी करने का अधिकार दिया। इस संबंध में सरकार की निष्पक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि निगम द्वारा लिए गए कुल जमीन का 90 फीसदी हिस्सा लीज पर नहीं था। इसके बावजूद उसने आदिवासियों की जमीन का उपयोग फायदे के लिए किया। सरकारी नियम के अनुसार कोरापुट जिले में फसल की निविदा निकालने से पूर्व क्षेत्रों के ग्राम सभा से राय-मशविरा करना जरूरी था। लेकिन निगम ने इसे जरूरी नहीं समझा। यही छोटी-छोटी चिंगारियां बाद में आंदोलन की आग में परिणत हो गई।
चिंगारी बनी लपट : निगम के इस जनविरोधी काम के कारण आदिवासियों में गुस्सा पहले से ही उबाल मार रहा था। आंतरिक गुस्से की यह चिंगारी 1985 में आग की लपटों में तब्दील हो गई जब आदिवासियों का पहला विद्रोह कोरापुट के इनुगु गांव से आरंभ हुआ। इस विद्रोह की अगुवाई एक सीमांत किसान सानिया सिसा ने की। निगम द्वारा व्यावसायियों को पट्टे पर दी गई फसलों में आदिवासी जबरन घुस गए। व्यावसायियों ने समझौते का प्रलोभन दिया लेकिन आदिवासी विद्रोह की मंशा पर अडिग रहे। देखते-देखते विद्रोह की लहर पड़ोसी गांवों बंगुरपाड़ा, रायपाड़ा, महादा और दहानापुट में फैल गई। लोगों ने पट्टे पर दी गई फसलों को जबरन काटना शुरू दिया। गिरफ्तारियां भी हुई लेकिन इसका असर विद्रोह की तेजी पर नहीं पड़ा। विद्रोह की तीव्रता को आगे बनाए रखने के लिए आदिवासियों ने सन् 2000 में डांगर सुरक्षा समिति का निर्माण किया जिसके अध्यक्ष के रूप में सानिया सिसा नियुक्त हुए। यह समिति 2005 में डांगर अधिकार समिति के रूप में बदल गई। इस समिति ने सबसे पहले लोगों के भूमि अधिकार और काजू फसल उगाने के अधिकारों की मांग शुरू की। आदिवासी और दलित जन जैसे-जैसे इस विरोध से जागरूक होते गए उन्होंने निगम को फसलों और जमीनों से दूर रखना शुरू किया। विरोध और विद्रोह के प्रभावों को देख नवीन पटनायक को आगे आना पड़ा। आदिवासियों को फसल उगाने का अधिकार मिला, लेकिन उनकी लड़ाई भूमि के स्वामित्व को लेकर अभी भी जारी है। सरकार और आदिवासियों द्वारा बनाई गई डांगर अधिकार समिति के बीच शांति समझौता जारी है। लेकिन निगम के कुछ लोगों का मानना है कि आदिवासी संघर्ष का अवसान शांतिप्रद हो, इसमें संदेह है। सरकार ने भूमिहीन लोगों को प्राथमिकता देकर आदिवासियों और दलितों के बीच `फूट डालो, राज करो´ की नीति अपनाई है। इसके मद्देनजर डांगर अधिकार समिति के कार्यकर्ता सरकार की इस नीति से लोगों को जागरूक कराने में लग गए हैं। विरोध अभी जारी है, भले ही वह दबा-दबा हो। (डीटीई स्टोरी. अनुवाद- रवि पराशर)
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