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जमीन की जंग में सब नाजायज

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क्या आंदोलन और खून-खराबे के बाद सरकार किसानों की मांग मानने की आदी हो चुकी है या फिर किसान दमनकारी नीतियों के सामने घुटने टेक देते हैं? आखिर क्यों किसान थोड़े से लालच में अपनी सभी मांगों को भूल शांत बैठ जाते हैं? उत्तर प्रदेश के जनपद गौतमबुद्ध नगर में स्थित मुख्यमंत्री मायावती के पैतृक गांव`बादलपुर´ और `दादरी´ विधान सभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत `घोड़ी-बछेड़ा´ के छह गांवों के किसानों का शासन से समझौता करने के बाद उनके आंदोलन का अंत नििश्चत रूप से यह सवाल पैदा करता है।

क्या इस तरह के फैसलों के बाद किसानों पर कोई विश्वास करेगा और उनकी लड़ाई में कूदने को तैयार होगा? `बादलपुर´ और `घोड़ी बछेड़ा´ के आंदोलन को दो पखवाड़े भी किसान सतत रूप से नहीं चला सके। यही नहीं वे अपनी मांगों पर भी शांत बैठ गए हैं। इससे जितने भीराजनीतिक दल मायावती को उनके गृह जनपद में घेरने के लिए कमर कस रहे थे, उनकी दशा घर के रहे न घाट के जैसी हो गई है। क्योंकि गांव में नजरबंद और खौफ के साए में जीवन गुजारने वाले किसान अब उन पलों को भुला चुके हैं जब उन्हें गोली का िशकार हुए किसानों के शव तक नहीं लौटाए गए और जबरन दाह संस्कार कराकर हाथों में मुआवजे के चेक थमा दिए गए। हफतों तक इलाज के लिए उन्हें गांव से नहीं निकलने दिया गया। दर्द से कराहते बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को गांव की गलियों में फलैगमार्च करने वाले पुलिसकर्मियों के बूटों की धकम रात में जगा देती थी। वह सब शायद अब उन्हें याद नहीं है। अगर मायावती सरकार को उनकी मांगें ही पूरी करनी थीं तो यह कदम पहले ही उठाया जा सकता था। न इतने लोग घायल होते और न मरते। फिर इस जद्दोजहद की जरूरत ही क्या थी? ऐसा भी नहीं है कि दोनों गांवोें के हालात के बारे में मायावती को मालूम नहीं था। बादलपुर के किसान 2008 में उनसे मिलने लखनऊ गए थे। मगर मुख्यमंत्री ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया था। रही बात घोड़ी-बछेड़ा की तो इसका विवाद सपा के शासनकाल का था, जिसको बसपा भी उस समय मुद्दा बनाने की फिराक में लगी थी।

मायावतीगौतमबुद्ध नगर के किसानों पर मायावती सरकार का कहर पिछले एक साल से जारी था। मुख्यमंत्री ने पहले अपने पैतृक गांव `बादलपुर´ में जमीन अधिग्रहण का विरोध करने वाले किसानों को धारा 144 लगाकर नजरबंद करवाया और उसके बाद गांव `घोड़ी बछेड़ा´ के किसानों को। दोनों ही गांवों में एक हफते तक किसानों से मिलने जाने वालों को गिरफतार कर लिया जाता था। बादलपुर गांव में किसान आंदोलन शुरू होना और समाप्त होना भी दिलचस्प है। इस गांव के किसानों के पास बहुत कम जमीन है। ऊपर से बड़े परिवार, जिसके चलते वे जमीन देना ही नहीं चाहते थे। किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष जगदीश नंबरदार ने बताया कि मायावती बादलपुर, विश्नूली और अच्छैजा गांव की 230-554 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण अपने महल के चारों तरफ पार्क और बहुजन समाज के लिए राष्ट्रीय स्तर का पिकनिक स्पॉट बनाने के लिए करा रही हैं। इसी मद्देनजर गांव के बैनामे बंद कर दिए गए, जिससे किसान अपनी जमीन न बेच सकें। उन्हें 850 रूपए वर्गमीटर के हिसाब से मुआवजा दिया जा रहा था। जबकि गांव का सर्किल रेट 1000 रूपए है, उस पर 20 प्रतिशत बोनस लगा दिया जाए तो रेट 1250 रूपए वर्गमीटर का बनता है। साथ ही 1984 की चकबंदी में दर्ज आबादी की भूमि का भी अधिग्रहण किया जा रहा था। उन्हें मात्र छह प्रतिशत विकसित भूमि लौटाने का आश्वासन दिया जा रहा था। उन्होंने बताया कि विरोध कम या ज्यादा मुआवजे का नहीं है। दरअसल बादलपुर गांव में 3500 के करीब किसान परिवार हैं, जिनमें से 1023 के पास जमीन ही नहीं है। 522 किसानों के पास चार से पॉच बीघा जमीन है और 322 सीमांत किसान हैं। ( जिसके पास 5000 वर्गमीटर से कम जमीन होती है)। कई किसानों के पांच-छह बच्चे हैं। अगर उनकी जमीन चले जाती है तो आने वाले समय में वे कहां रहेंगे।

दूसरी बात यह है कि अधिग्रहण के बाद जमीन पर केवल पार्क ही विकसित किए जाएंगे। अगर उद्योग या कोई दूसरी योजना बनाई जाती तो वहां शायद उन्हें रोजगार मिल जाता। क्या किसान पार्कों में खेती कर गुजर बसर करेगा? नहीं, इसलिए वे जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे। सपा सरकार में उनकी इसी जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था, जो विरोध के चलते रूक गया था मगर मायावती ने अपनी सरकार बनते ही पुन: अधिग्रहण की कार्रवाई शूरू करा दी। इसके विरोध में किसानों ने बादलपुर में 29 जुलाई को महापंचायत करनी चाही तो पुलिस ने किसानों पर लाठियां बरसा दीं। जिसमें 18 किसान घायल हो गए। यही नहीं, किसानों नेताओं को नजरबंद कर गांव की नाकेबंदी कर दी गई। कोई भी राजनैतिक दल का नेता किसानों से न मिल सके इसलिए गांव के आसपास धारा 144 लगा दी गई। किसानों के रिश्तेदार तक गांव में न आ सके। इसके बाद रियासी खेल शुरू हुआ और आखिरकार 12 अगस्त-2008 को किसानों की पांच में से चार मांगे मान ली गईं और अंदोलन की इतिश्री कर दी गई। यहां यह बता देना जरूरी है कि जब गांव के पांच किसानों के पास इतनी कम जमीन है और उसके जाने के बाद वे बेरोजगार हो जाएंगे तो वे बोनस की दर का मुआवजा लेने के लिए कैसे तैयार हो गए?

अगर बादलपुर और घोड़ी-बछेड़ा के किसानों के समर्थन में राजनैतिक दल नहीं कूदते तो क्या सरकार उनसे सुलह करने के लिए तैयार हो जाती, नहीं! यह कहां का नियम है मरे व्यक्ति का का शव भी न लौटाया जाएं? किसान दरअसल अब स्वार्थी हो गया है। यही वजह है कि पिछले दो दशकों से कोई भी बड़ा आंदोलन नहीं हो सका है। चाहे महेंद्र सिंह टिकैत हों या फिर बादलपुर और घोड़ी-बछेड़ा का किसान, वह लालच मिलते ही चुप बैठ जाता है। यही वजह है कि प्रदेश में जमीन अधिग्रहण और मुआवजा निर्धारण का कोई स्केल नहीं बन सका है। अब बादलपुर में किसानों को 1250 रूपय गज का मुआवजा मिलेगा। क्योंकि वह मायावती का पैतृक गांव है। क्या इसकी देखादेखी ग्रेटर नोएडा के वे किसान इसी दर की मांग नहीं करेंगे जो बादलपुर में दी गई। इस संबध में किसान नेता सिरोही कहते हैं- किसानों को एक जमीन नीति की जरूरत है। निश्चित ही जमीन नीति की जरूरत है क्योंकि खुद सरकार की कोई अधिग्रहण की नीति नहीं है. घोड़ी बछेड़ा में किसानों के हितैषी बनकर पहुंचे अमर सिंह की पार्टी जब सत्ता में थी तो नोएडा विकास प्राधिकरण ने जितनी जमीनों का अधिग्रहण किया था उसमें किसानों को 382 रूपये वर्गमीटर का मुआवजा दिया गया था. नोएडा प्राधिकरण ने किसानों के विरोध के बाद एक कमेटी बनाई लेकिन उसकी भी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया. बहरहाल साल 2007-08 में जिन गांवों की जमीन का प्राधिकरण ने अधिग्रहण किय उन्हें 850 रूपये प्रति वर्गमीटर का मुआवजा दिया गया.

किसान तो अपनी जमीन न देने की बात कर रहे थे फिर अचानक 20 अगस्त को उन्होंने मायावती सरकार से समझौता कैसे कर लिया? समझौते में मृतकों के परिवारवालों को 10-10 लाख रूपये और नौकरी के साथ ही मुआवजे में 200 रूपये वर्गमीटर की वृद्धि कर दी गयी. इसके अलावा जेपी ग्रुप ने भी मृतकों के परिवारवालों को 9-9 लाख रूपये के चेक दिये. कुछ पैसा सपा ने भी दिया. यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसानों को उनके खोये हुए लोग और जमीन की कमी पैसे से पूरी हो पायेगी? क्या ज्यादा पैसा पाकर उनका उद्येश्य पूरा हो गया?  

(सुशील राघव प्रथम प्रवक्ता के संवाददाता और सूचना अधिकार के कार्यकर्ता हैं.raghav_sushil@rediffmail.com) 

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sangita puri on 05 September, 2008 11:14;12
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पता नहीं , थोड़े लालच में क्यों आ जाते हैं , ये लोग।
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अनिल रघुराज on 05 September, 2008 16:03;15
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ज़मीन का सवाल पूरे देश में बेहद उलझा हुआ है। इसे तफ्सील से समझने की ज़रूरत है। किसानों को लालची बताकर कुछ नहीं निकलनेवाला।
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sanjay Tiwari on 05 September, 2008 19:29;54
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निश्चित रूप से बेहद उलझा हुआ है. जहां तक सुशील राघव के इस लेख का सवाल है तो उनके बारे में यह तथ्य जानने लायक होगा कि वे खुद ऐसे परिवार से हैं जिनकी जमीन गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा ७२ में औने-पौने दामों में ले ली गयी थी लेकिन अपने ही खेत का मुआवजा लेने के लिए किसान कभी इकट्ठे नहीं हो पाये.
एक आंशिक सच्चाई यह है कि किसानों में अधिकांश अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनका असली धन जमीन है. अगर थोड़ी ऊंची कीमत मिले तो बहुत सारे किसान अपनी जमीन बेच देते हैं. झज्जर की पूरी स्टोरी यही है.
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अशोक पाण्‍डेय on 05 September, 2008 22:23;00
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आप का यह लेख कितने किसान पढ़ेंगे मैं नहीं जानता। इतना जरूर जानता हूं कि यह लेख पढ़नेवाले या तो गैर-किसान होंगे या आप की तरह के किसान परिवार से निकले लोग। आप किसानों के पीठ पीछे उन्‍हें स्‍वार्थी बना दीजिए, डकैत बना दीजिए या और कुछ। लेकिन किसी के पीठ पीछे उसे गाली देना कहां की नीति है?

मैं पूछता हूं आप स्‍वार्थी नहीं है? कौन है इस धरती पर जो स्‍वार्थ से परे है? आप पत्रकार हैं, आप लोगों को कोई दूसरा मीडिया घराना बेहतर पगार व सुविधाएं देता है, तो आप दौड़े नहीं चले जाते हैं उस ओर? बंधुवर, दूसरों पर अंगुली उठाना बहुत आसान होता है। खासकर उनपर जो बेजुबान हैं। जी हां, इस देश के किसान बेजुबान ही हैं। ये किसानों का देश है, फिर भी आजादी के तुरंत बाद संविधान में उनकी जुबान पर अंगरेजी का ताला लगा दिया गया।

आप कह रहे हैं कि किसानों पर कैसे कोई राजनीतिक दल विश्‍वास कर उनकी लड़ाई में कूदना चाहेगा। आप कह रहे हैं कि किसानों के स्‍वार्थी होने की वजह से पिछले दो दशकों से कोई बड़ा आंदोलन नहीं हो सका है। महोदय, आप सरासर गलत कह रहे हैं। आप की बात से तो लगता है कि इस देश की समस्‍याओं के लिए आप किसानों को कसूरवार मानते हैं और राजनीतिज्ञ दलों को बेचारा - बेचारों का किसान ढंग से साथ नहीं देते। यही न कहना चाहते हैं आप। आप बताएंगे कि आजादी की किस लड़ाई में किसानों ने हिस्‍सा नहीं लिया? आजादी की हर लड़ाई में किसानों ने खून पसीना बहाया। जो शहीद हुए उनमें से अधिकांश किसानों के ही बेटे थे। क्‍या दिया इस देश के राजनीतिज्ञों ने इसके बदले में उन्‍हें?

आजाद भारत के राजनीतिज्ञों ने शासन तो अंगरेजों से अपने हाथों में ले लिया, लेकिन उनकी भाषा नहीं हटाई। कितना बड़ा छल किया किसानों के साथ? संविधान में हिन्‍दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दिया, लेकिन प्रावधान कर दिया कि राजकाज अंग्रेजी में होगा। कितने किसान अंगरेजी समझने-बोलने वाले थे? हिन्‍दी राजकाज की भाषा रहती तो किसान कहीं भी किसी भी स्‍तर पर अपनी आवाज रख सकता था। लेकिन यहां तो नीयत थी कि ऐसा कर दो कि भारत का किसान बोलने लायक ही नहीं रहे।

उन राजनीतिज्ञों ने बापू को भी धोखा दिया। खुद राजसिंहासन पर बैठ गए और उन्‍हें हत्‍यारों के आगे छोड़ दिया। बापू ने हर लड़ाई किसानों के बल पर लड़ी थी, वे किसानों और उनके द्वारा बोली जानेवाली भाषा के हितैषी थे। लेकिन उनके शरीर और विचार दोनों की हत्‍या कर दी गयी। तिनके तक का सहारा नहीं छोड़ा गया किसानों के लिए। आज किसान अशिक्षित है, निर्धन है, आत्‍महत्‍या कर रहा है, तो सब इन्‍हीं राजनीतिज्ञों की वजह से अथवा आप जैसे उनके पैरोकार बुद्बिजीवियों के चलते।

कब साथ दिया है आप लोगों ने किसान का? जब वह मरने लगता है तो मातमपुर्सी करने जरूर पहुंच जाते हैं। उत्‍तरी बिहार में कोसी की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद कितना आंसू बह रहा है आप पत्रकारों की आंखों से? ये आंसू उस समय कहां थे जब उन इलाकों के किसान बाढ़ से पहले मक्‍के की अपनी उपज का बेहतर मूल्‍य मांग रहे थे?

कर्जमाफी के नाम पर राजनीतिज्ञों ने डिफाल्‍टर किसानों को इनाम दिया और ईमानदार किसानों को ठेंगा दिखा दिया, आप ने कुछ लिखा? चावल, गेहूं, मक्‍का आदि की घरेलु बाजार में उपलब्‍धता सुनिश्चित कर उनकी कीमत नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने उनके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन धान व मक्‍का के बीज के निर्यात की अनुमति दे दी। आप ने कुछ बोला? क्‍या अनाज की तरह बीजों का सस्‍ता होना जरूरी नहीं है?

बेचारा किसान तो जान भी नहीं पाता है कि उसके साथ कदम कदम पर कितना धोखा किया जा रहा है। इस्‍तेमाल करो और हलाल कर दो - उनके साथ राजनीतिज्ञों की यही नीति है। क्‍या रहने दिया है किसानों के पास कि उनसे लंबी लड़ाई की अपेक्षा कर रहे हैं? लंबी लड़ाई लड़ेगा तो कैसे जिलाएगा अपने बच्‍चों को? आप काम करेंगे उसके खेतों में?

जो आर्थिक तंगी में आत्‍महत्‍या करने को विवश है, उसके हाथ में कुछ पैसे धराए जाएं तो वह कैसे नहीं लेगा?

दूर रह कर सिद्धांत झाड़ना बहुत आसान है, आइए खेत में उतरिए फिर समझ में आ जाएगा आंटा चावल का भाव।

भावावेश में कुछ अप्रिय लिख दिया होगा तो क्षमा करेंगे। मैं किसान हूं और आप जैसे बुद्धिजीवी का राजनीतिज्ञों का पक्ष लेकर किसानों पर अंगुली उठाना मुझे बहुत बुरा लगा।
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visfot .com on 06 September, 2008 12:20;23
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सुशील खुद ईमेल देखने से ज्यादा कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं कर पाते इसलिए आपके कुछ सवालों का जवाब मुझे देना पड़ रहा है. उनका इरादा ऐसा कहना कतई नहीं है कि किसान लालची और मक्कार आदि है. वे तो बस इतना कह रहे हैं कि किसान अगर संगठित हो जाए तो अपनी शर्तों पर अपनी जमीन की कीमत तय कर सकता है. भली बात तो यह है कि वह जमीन बेचे ही नहीं, अगर सरकार या कंपनियां उसकी जमीन लेती हैं तो कम से कम उसको इतना पैसा मिले कि वह भविष्य की चिंता कर सके.
पिछले साल रिलायंस एसईजेड के विरोध में शामिल होने मैं झज्जर गया था. किसानों की सभा थी. भाषणों की बातें अलग हैं लेकिन निजी बातचीत में कई सारे किसान सिर्फ बेहतर मुआवजे की मांग पर अटके हुए थे. सिर्फ एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि माटी का कोई मोल नहीं होता. हमें किसी भी कीमत पर अपनी माटी रिलायंस को नहीं देनी चाहिए.
लेकिन उस बुजुर्ग किसान की बात कौन सुनेगा जब लोगों का सपना गाड़ी खरीदना और शापिंग माल में शापिंग करना हो तो माटी नहीं सिर्फ पैसा चाहिए. यह हकीकत है. इसके कारण वे किसान भी मारे जाते हैं जो सचमुच अपनी माटी नहीं बेचना चाहते.
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vikram singh chowdhary on 07 November, 2008 17:09;35
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sir, plz help me how i write my comments in hindi, plz add new option of "HELP" which help to all daily readers. I am very very thankful to you for this site and i appreciat for helping me early as possible.

Vikram
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visfot .com on 10 November, 2008 09:23;10
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विक्रम सिंह जी आपने अपना ईमेल भी नहीं दिया है कि आपको जानकारी भेजी जा सके.
फिलहाल आप इस लिंक पर जाकर रोमन में टाईप करेंगे तो वह हिन्दी में बदल देगा.
http://www.google.co.in/transliterate/indic
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ummed Singh Baid Saadhak on 12 November, 2008 15:58;46
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मूल्य बदलने की सजा, भुगते हिन्दु समाज.
क्या किसान, क्या मन्त्री, सब पैसे के दास.
पैसे के हैं दास, कृषि-ऋषि गये काम से.
तन-मन-बुद्धि-भावना-सब बिकते हैं दाम से.
कह साधक कवि, और तीव्र होगी यह सजा.
भुगतेगा ये समाज, मूल्य बदलने की सजा.
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sanjay singh on 29 June, 2009 01:57;52
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aaj bhi sarkar angrajo ke banayen kanoon par chal kar kisano dk pet par lat mar di jati hai.
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Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

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नरेगा के प्याले में कर्मचारियों का तूफान
मजदूरों को काम का अधिकार देने वाले नरेगा कानून से अब उसके कार्मिक ही खफा हो गये है। राजस्थान भर में 15 हजार नरेगा कर्मचारियों ने कलमबंद हड़ताल कर रखी है। 17 जुलाई के राज्य सरकार के एक आदेश ने इन कार्मिकों की परेशानियॉ बढा दी है। सरकार की ओर से कर्मचारियों को उनके संविदा नियमों से हटकर प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से लगाने की योजना है। जबकि कर्मचारी नियमित नियुक्ति के सपने पाले हुऐ थे। देश भर में काम के हिसाब से नंबर वन राजस्थान में नरेगा भ्रष्टाचार और शिकायतों में भी नंबर वन ही है।...
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