पेट काटकर कार को रास्ता
सियासी चालों और कारोबारी नैनों के बीच चल रहे कार और पेट के इस खेल में जीत शायद कार की हो जाए, पर यह जीत देश के करोड़ों गरीबों को किसी नैनो के तले कुचलने जैसे अपराध से कमतर हरगिज न होगी। नेताओ, बस इतना जवाब दे दो-चुनाव नैनो के मसले पर पर लड़ते हो या पेट और भूख के मसले पर...
कोलकाता। विचारधारा की बात करें तो पश्चिम बंगाल आज दोराहे पर खड़ा है। तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी सिंगुर के किसानों की 400 एकड़ भूमि लौटाने की मांग पर आमादा है, जबकि रतन टाटा ने यह कहकर सेल्समैनी धौंस जमाने की पुरअसर कोशिश की है कि यदि वे सोनार बांगला की धरती पर अनवांटेड हैं तो नैनो प्रोजेक्ट के लिए खपाई गयी 1500 करोड़ की रकम की परवाह न करते हुए यहां से कूच कर जाएंगे। ममता और टाटा-दोनों के अपने पक्ष हैं। जायज -नाजायज का फैसला उस दौर में कौन करे, जब बात-बात में बाजार की दुहाई दी जा रही हो।
असल में टाटा भी व्यावसायिक रणनीति के तहत की काम कर रहे हैं. लोग शायद अभी भूले नहीं होंगे कि रतन टाटा को नैनो कार प्रोजेक्ट के लिए जरूरत से ज्यादा जमीन वह भी औने-पौने दाम में दी गयी थी. इसके अलावा मुफ्त पानी, लगभग मुफ्त बिजली और टैक्स आदि की छूट भी दी गयी थी. उस समय लाख विरोध और नरसंहार के बावजूद टाटा ने सार्वजनिक रूप से कभी कुछ नहीं कहा. अब जब प्लांट बन गया है और असेंबली लाईन के चालू होने का वक्त आया तो रतन टाटा कह रहे हैं कि उनके कारखाने और कर्मचारियों की सुरक्षा सर्वोपरि है. अगर उन्हें कोई खतरा नजर आता है तो वे किसी और राज्य में चले जाएंगे. यह तो राज्य सरकार के लिए डूब मरने की बात है कि एक कंपनी का मालिक अपने कर्मचारियों को लेकर इतना सचेत है कि १५०० करोड़ रूपये भी पानी में बहाने के लिए तैयार है और राज्य सरकार अपने ही नागरिकों की बलि लेकर रतन टाटा को सिर पर बैठा रही है. कम से कम राज्य के नेतृत्व को रतन टाटा से यह तो सीखना ही चाहिए अपने लोगों की सुरक्षा और हित सर्वोपरि होता है, बाद में दूसरी बातें आती हैं.
सर्वहारा की हिमायती कहलाने का दंभ भरने वाली वाममोर्चा सरकार इससे पहले इतनी बेचारी शायद कभी नहीं रही। तीस सालों तक वामपंथियों ने बंगाल में छोटे-बड़े कारोबारियों के साथ जो बर्ताव किया है, वह शायद ही दूसरे प्रदेश में देकने को मिले। इस राज्य में छोटी-छोटी दुकानों में काम करने वाले इक्का-दुक्का कर्मचारियों के लिए भी मजदूर संगठन हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यूनियनबाजी के नाम पर नेता मजदूरों का भला कम, अपना भला अधिक करते रहे हैं। बाटा कंपनी के प्रबन्ध निदेशक को चांटा रसीद करने की घटना बंगाल में ही हो सकती है। यही नहीं, वामपंथियों ने खुद यहां कारोबारियों को बाहर का दरवाजा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर जो सोमनाथ चटर्जी महाशय बैठे हैं, वे कभी यहां औद्योगिक विकास निगम के अध्यक्ष हुआ करते थे, ज्योति बसु के मुख्यमंत्रित्वकाल में।
जब वैश्वीकरण की बयार बहना शुरू हुयी तो सोमनाथ बाबू ने दनादन निवेशकों के साथ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग पर हस्ताक्षर करना शुरु कर दिया। कई हजार करोड़ के निवेश की लिखा-पढ़ी हुई, पर कहां गए वे सारे निवेश? बंगाल में आज भी खुलकर कारोबार करनेलायक स्थिति हर कारोबारी के लिए नहीं है। रमानाथ गोयनका, हर्ष नेवटिया,वेणुगोपाल धूत जैसे इक्का-दुक्का घरानों को छोड़कर यहां वर्षों से लोग नहीं पनप पाए। एक जमाने में जूट का व्यवसाय यहां पूरे देश-दुनिया को माल दिया करता था, उन जूट मिलों की हालत भी बेसाख्ता पस्त है। इन हालात के लिए क्या किसान दोषी हैं? किसने रोका था वामपंथियों को व्यवसाय पनपाने से?मुख्यमंत्री बुधदेव भटाचार्य की विवशता समझी जा सकती है। उनकी हालत उस छात्र की तरह है, जो साल भर मस्ती करता है और इम्तिहान के समय सर पीटकर रोने लगता है। अब टाटा यदि यहां से भागते हैं तो तमाम राज्य कटोरा लेकर उनके सामने याचक बने खड़े हैं। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के साथ किसी समझौते पर पहुंचा जाता है तो यह वामपंथियों के मुंह पर करारा तमाचा होगा। परमाणु करार पर केंद्र से पिटने के बाद वामपंथियों को दूसरे बड़े आघात से गुजरना पड़ रहा है।
(प्रकाश चण्डालिया कोलकाता से निकलनेवाले महानगर इंडिया के संपादक हैं.mahanagarindia@gmail.com)
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