Home | जंतर-मंतर | बिजली की एक डील यहां भी हुई है

बिजली की एक डील यहां भी हुई है

image

उत्तराखण्ड सरकार ने फैसला किया है कि वह प्रदेश की उन सभी 14 जलविद्युत परियोजनाओं को निजी हाथों में सौंप देगी जो पिछले 30-35 सालों से राज्य को बिजली मुहैया करा रहे हैं. ऐसे में केन्द्र में परमाणु समझौते के मुद्दे पर भाजपा कांग्रेस को घेर रही है तो यहां राज्य में कांग्रेस भाजपा पर डील करने का आरोप लगा रही है.

सरकार का यह फैसला चौंकानेवाला है. अभी पिछले ही साल इन परियोजनाओं के आधुनिकीकरण तथा क्षमता विस्तार पर विभिन्न वित्तीय संस्थानों से एक हजार करोड़ का समझौता हुआ था. इस सवाल पर सरकार चुप है कि यह अगर निजीकरण होता है तो इस पैसे का क्या हिसाब होगा? ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सरकार के इस निर्णय से प्रदेश को सस्ती दर पर मिलने वाली बिजली की बजाय राज्य वासियों को मंहगी दरों पर खरीदनी पड़ेगी। अखिल भारतीय अभियंता महासंघ ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए सरकार को ऐसा न करने के लिए पत्र लिखा है.

राज्य मंत्रिमंडल ने की बैठक में बीते दिन सबसे प्रमुख मुद्दा ऊर्जा क्षेत्र में प्राईवेट पब्लिक पार्टनरशिप का रहा। इसके तहत राज्य सरकार ने यह निर्णय किया कि राज्य को बीते तीस-पैंतीस सालों से बिजली दे रहे जल विद्युत परियोजनाओं को ''ट्रिपल पी'' के तहत देने का। इसके अलावा कुछ बंद पड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को भी निजी हाथों में सौपनें का फैसला लिया गया। ऊर्जा सचिव शत्रुघन सिंह का मानना है कि निजी हाथों में इन परियोजनाओं को देकर सरकार बिना धन खर्च किए अच्छा खासा मुनाफा कमाएगी और ऊर्जा विभाग पूरी ऊर्जा बड़ी परियोजनाओं में लगाएगी। सवाल यह है कि करोड़ों रूपए निवेश करने वाली यह निजी कम्पनियां इन परियोजनाओं के जरिए अपना हित साधेगी या फिर जनता का हित देखेगी? भारत के कल्याणकारी राज्य के एक प्रदेश उत्तराखण्ड में आज जनकल्याण गौण नजर आता है। क्योंकि इन परियोजनाओं के निजी हाथों में जाने से वहां काम कर रहे कर्मचारियों,अधिकारियों तथा अभियंताओं का क्या होगा? क्या वे पूर्व की सेवा शर्तों के आधार पर ही कार्य करते रहेंगे? इस बारे में ऊर्जा सचिव का कहना है कि पुरानी पड़ चुकी इन जल विद्युत परियोजनाओं के कर्मचारियों,अधिकारियों तथा अभियंताओं को प्रतिनियुक्ति पर इन निजी कम्पनियों में तथा राज्य सरकार की अन्य परियोजनाओं में समायोजित किया जाएगा।

एक सवाल और खड़ा होता है कि करोड़ों रूपया निवेश करने वाला उद्योगपति इन परियोजनाओं से ज्यादातर थके, हारे कर्मचारियों तथा अधिकारियों व अभियंताओं को काम पर रखेगा? क्योंकि इन परियोजनाओं की बुरी गति के लिए इन कर्मचारियों,अधिकारियों तथा अभियंताओं की कार्यप्रणाली को भी नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में वहां तैनात कर्मचारियों तथा निवेशकों के बीच होने वाले संघर्ष से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वहीं निजी निवेशक एक बड़ी धनराशि खर्च करके विद्युत दरों में मुनाफे की राशि जोड़ेगी जिससे राज्य को वर्तमान में सस्ती दरों  पर मिल रही बिजली अवश्य ही महंगी हो जाएगी।

उल्लेखनीय है कि राज्य कैबिनेट ने बीते दिन राज्यभर में बीते तीस-पैतीस सालों से कार्यरत् 14 जलविद्युत परियोजनाएं छिबरो, खोदरी, ढकरानी, कुल्हाल, ढालीपुर, तिलोथ-1, धरासू-2, चीला, पथरी,मोहम्मदपुर, खटीमा,रामगंगा तथा गलोगी हैं। राज्य जल विद्युत निगम के अनुसार इन परियोजनाओं से वर्तमान में छिबरों से 240 मेगावाट, खोदरी से 120 मेगावाट, ढकरानी से 33.75मेगावाट, कुल्हाल से 30 मेगावाट, ढालीपुर से 51 मेगावाट, तिलोथ-1 से 90 मेगावाट, धरासू-2 से 304 मेगावाट, चीला से 144 मेगावाट, पथरी से 20.04 मेगावाट, मोहम्मदपुर से 9.03 मेगावाट,खटीमा से 41.4 मेगावाट, रामगंगा से 198 मेगावाट तथा गलोगी से तीन मेगावाट बिजली उत्पादित की जा रही है।

जबकि एक जानकारी के अनुसार इन जलविद्युत परियाजनाओं में सुधार को लेकर  राज्य सरकार के इस उपक्रम उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम पहले ही  कुछ कम्पनियों से समझौता कर चुका है जिसका उल्लेख राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में उर्जा सचिव द्वारा नहीं किया। जबकि जल विद्युत निगम ने इन परियोजनाओं में खर्च के लिए कई वित्तीय संस्थानों से लगभग एक हजार करोड़ रूपये का समझौता तक कर दिया था। जिसमें छिबरों के लिए 142 करोड़, ढकरानी के लिए 54 करोड़, ढालीपुर के लिए 78 करोड़, चीला के लिए 372 करोड़, पथरी के लिए 59 करोड, मोहम्मदपुर के लिए 28 करोड़, रामगंगा के लिए 37 करोड़, खटीमा के लिए 91 करोड़, गलोगी के लिए पांच करोड़ खर्च किए जाने हैं। ऊर्जा सचिव ने पत्रकार वार्ता में इसका भी उल्लेख नहीं किया कि जिन वित्तीय कम्पनियों से उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम ने इन परियोजनाओं के आधुनिकीकरण तथा उच्चीकरण के लिए समझौता किया था अब उनका क्या होगा?

इन्हीं सब मामलों पर प्रदेश की जनता को अंधेरे में रखने को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए है कि अखिर ऐसी क्या जल्दी थी जो सरकार को इस तरह का निर्णय लेना पड़ा? यही कारण है कि कांग्रेस ने इस मामले पर भाजपा पर वार शुरू कर दिये हैं। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा राज्यसभा में सांसद हरीश रावत ने कहा कि कांग्रेस इसका घोर विरोध करती है। उन्होने दिल्ली से बताया कि राज्य में स्थापित जलविद्युत परियोजनाओं को निजि हाथों में देने के फैसले से यह साफ हो गया है कि सरकार ने कुछ डील जरूर की है। उन्होने कहा कि यह जलविद्युत परियोजनांए राज्य का आत्म विश्वास है क्योंकि इन्हीं से राज्य को सस्ते दरों पर बिजली मिल रही थी जिनके निजी हाथों में चले जाने से राज्यवासियों को मंहगी दरों पर बिजली खरीदने को बाध्य होना पड़ेगा। उन्होने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार पहले ही विश्व हिन्दु परिषद के दबाव में आकर राज्य की परियोजनाओं को बंद करने का ऐलान कर चुकी है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होने साथ ही यह भी कहा कि इससे इन परियोजनाओं में काम करने वाले हाथ बेकार हो जाएंगे। उन्होने कहा कि राज्य सरकार को इन परियोजनाओं को निजी हाथों में देने से पहले राज्य के लोगों तथा विधानसभा में इस पर चर्चा करानी चाहिए थी।

वहीं पूर्व मंत्री तिलक राज बेहड़ का कहना है कि राज्य सरकार ने आगामी लोकसभा चुनावों के देखते हुए निजी कम्पनियों से इस तरह की डील की है उन्होने राज्य सरकार पर खुली लूट करने का आरोप भी लगाया।  जबकि विधायक तथा पूर्व राज्य मंत्री किशोर उपाध्याय ने भी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि केन्द्र में आउटसोसिंग का विरोध करने वाली भाजपा राज्य में आउट सोर्सिंग पर उतारू है। उन्होने भी निजीकरण के द्वारा सरकार पर चुनाव के लिए पैसा इकठ्ठा करने का आरोप लगाया है।

इधर अखिल भारतीय बिजली अभियंता महासंघ तथा उत्तराखंड विद्युत अभियंता संघ के शैलेन्द्र दूबे ने कहा कि सरकार प्राकृतिक संसाधनों को निजि हाथों बेचने का जो प्रयास कर रही है हम उसका विरोध करते हैं। उनका कहना है कि जल विद्युत सबसे कम दर पर मिलती है सरकार द्वारा निजिकरण किए जाने के बाद यह और मंहगी हो जाऐगी। उन्होने इस संबध में प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विरोध भी जता दिया है कि अखिल भारतीय बिजली अभियंता महासंघ इसका पुरजोर विरोध करता है।

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image राजेन्द् जोशी 24 सालों से पत्रकारिता. लगभग 12 साल राष्ट्रीय सहारा में सीनियर रिपोर्टर रहे. इसके अलावा कई स्थानीय अखबारों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बाद अब देहरादून से विभिन्न अखबारों-पत्रिकाओं के लिए लेखन कार्य .
Rate this article
3.40
More from जंतर-मंतर
Previous
image
पान बनाम खान की जंग
दक्षिण कोरियाई और विश्व की अग्रणी स्टील निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनी पोस्को के उड़ीसा स्थित जगतसिंहपुर जिले के प्रस्तावित स्टील फैक्ट्री परियोजना का पारादीप के समीप के गांओं में पान की खेती करने वाले किसानों का विरोध जारी है. पान बनाम लोहे के खान की इस जंग को जानते हुए हमें यह भी सोचना होगा कि आखिरकार हमें किसानों की पान अर्थव्यवस्था को बचाना है या फिर कोरियाई स्टील कंपनी की खान अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है. ...
image
कैसे बांधोगे नर्मदा की विरोध धारा?
पिछले दिनों विकास संवाद के एक कार्यक्रम में महेश्वर जाने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में काफी तादाद में मीडियाकर्मी जमा हुए। यूं तो बहस का एजेंडा- मीडिया के मानक और लोग- था, लेकिन चूंकि ये इलाका नर्मदा पर बन रहे बांध की वजह से नर्मदा बचाओ आंदोलन की कर्मभूमि है, सो फिजा में डूब से प्रभावित लोगों का सवाल भी घुला रहा। खुद आयोजकों ने भी कार्यक्रम कुछ इस तरह से ऱखा कि मीडियाकर्मी नर्मदा पर बन रहे बांध और उससे प्रभावित लोगों की हकीकत से दो-चार हुए और उन्हें ये मुद्दा उद्वेलित कर गया।...
image
आंदोलन हो तो ऑनलाइन हो
गोपाल कृष्ण दिल्ली की एक संस्था टाक्सिक्स लिंक में काम करते थे. टाक्सिक्स लिंक जहरीले रसायनों पर काम करती है और उनके खिलाफ आंदोलन चलाती है. काम का तरीका एनजीओवादी है. इसलिए यहां काम करनेवाले लोग जमीन से ज्यादा कम्प्यूटर से जुड़े रहते हैं. गोपाल भी बाहर मैदान से ज्यादा बेसमेन्ट में अपने कम्प्यूटर पर सक्रिय रहते थे. तब आनलाइन दुनिया की अपनी कोई खास समझ नहीं थी. ...
image
15 हजार मछुआरे क्या मराठी माणुस नहीं हैं?
मुंबई से लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पर महाराष्ट्र का एक जिला है- रत्नागिरी। जिले की आबादी लगभग 17 लाख है जिले में कुल 9 तालुकाएं है मंडनगढ़, दापोली, खेड़, चिपलून, गुहागर, संगमेश्वर, लोज़ा, राजापुर, और रत्नागिरी। रत्नागिरी तालुका में समुद्र के किनारे दो गाँव है (1) गोलप मोहल्ला (2) पावस, इन दोनों गावों में लगभग 5000 मछुआरों का परिवार रहता है जिसमें हिन्दू कोली समुदाय और मुस्लिम दाल्दी समुदाय के लोग है और यह दोनों समुदाय मिलजुल कर समुद्र से मछली पकड़कर अपनी आजीविका चलाते है।...
image
राजनीति की पहली पाठशाला में चाहिए आरक्षण
राजस्थान में छात्र संघ चुनावों पर रोक थी. अब आगामी शिक्षण सत्र से ये चुनाव आरम्भ हो जाऐगें. इसके लिए मुख्यमंत्री घोषणा पत्र के किये वायदे के अनुरूप मंजूरी दे दी है. राजनीति की पहली पाठशाला माने जाने वाले कालेज छात्रसंघों की क्लास अब फिर से शुरू होने जा रही है. लेकिन इसके फिर से शुरू होने से पहले ही छात्राओं ने अपने लिए आरक्षण की माँग करके राजनीति को फिर से गरमा दिया है....
image
विदर्भ के दर्द की दवा दे गये हरित प्रदेश के हिमायती
विदर्भ की मांग का लेकर दिन प्रति दिन ज्वाला भड़कती जा रही है। इस आंदोलन को आज उस समय और अधिक बढ़ावा मिला, तब लोकदल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं किसान नेता चौधरी अजीत सिंह नागपुर पहुंचकर इस मांग को जायज ठहराते हुए कहा कि संसद के घेराव से ही पृथक विदर्भ के गठन के लिए सरकार जागेगी।...
image
महात्मा गांधी के नाम पर
वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में एक ओर आज जहां ’स्थापना दिवस’ मनाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे हैं। इन विद्यार्थियों ने इस दिन को ’शोक दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है।...
image
दस थाली टूट गयी पर सरकार नींद में गाफिल
थाली बजाकर विरोध करने का तरीका बहुत निराला और मार्मिक होता है. थाली उस वक्त बजायी जाती है जब दरिद्र से मुक्ति पानी हो. नागपुर में धरने पर बैठी ये विधवा महिलाएं थाली बजाकर अपने दरिद्रपन से मुक्ति पाने की गुहार कर रही हैं लेकिन दस थालियों के टूट जाने के बाद भी अब तक सरकार को उनकी आवाज सुनाई नहीं दी है....
image
गांधी के शिक्षाग्राम में अंबेडकर कर रहे हैं विरोध
वर्धा गांधी की प्रयोगभूमि है. दुनिया वर्धा को इसीलिए जानती है क्योंकि अपनी कर्मभूमि के लिए गांधी ने इसका चुनाव किया था. लेकिन गांधी के नाम पर बने यहां के एक शिक्षाग्राम में अब अम्बेडकर को माननेवाले ही गांधी के नाम पर शिक्षा में हो रही धोखाधड़ी का विरोध कर रहे हैं. वर्धा में गांधी और अंबेडकर को माननेवाले आमने-सामने खड़े हैं....
image
लोकतंत्र के योद्धाओं की खानाबदोश बस्ती
वैसे तो देश भर में हर राज्य की राजधानी में एक ऐसा स्थान नियत किया गया है जहां लोकतात्रिक तरीके से लोग अपनी बात कह सकते हैं. लेकिन संसद और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र होने की वजह से दिल्ली का अपना महत्व है. देश भर से हताश और निराश लोग इस उम्मीद में जंतर मंतर आते हैं कि यहां उनकी बात सुनी जाएगी. लेकिन संवेदनशून्य हो चुकी हमारी व्यवस्था और प्रशासन या तो उनकी बात सुनता ही नहीं, या फिर कार्रवाई इतनी लंबी होती है कि न्याय मिलते-मिलते जीवन का एक लंबा अरसा गुजर जाता है. कहते हैं दिल्ली उंचा सुनती है. जंतर-मंतर पर यह सही साबित होती है....
image
दिल्ली में देश के दो लाख गन्ना किसान
रामलीला मैदान से जंतर-मंतर पहुंचना हो तो बीच में दिल्ली का प्रतिष्ठित कनाट प्लेस पड़ता है. लेकिन गुरुवार को गन्ना किसानों की रैली को देखते हुए इस प्रतिष्ठित व्यावसायिक जगह को एहतियातन बंद करवा दिया गया था. हो सकता है पुलिस ने दुकानदारों की जानमाल की रक्षा को देखते हुए यह कदम उठाया हो लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के कहने पर दिल्ली आये लगभग दो लाख गन्ना किसानों ने छुटपुट उपद्रव के अलावा ऐसा कुछ नहीं किया जिससे "कानून व्यवस्था" का संकट खड़ा होता. ...
image
हमारी शक्लें चीनीयों से मिलती हैं इसका मतलब यह नहीं कि हम चीनी हैं
अरूणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है, हमलोग भारत के वासी हैं। यह हमलोग दिल और दिमाग से कह रहे हैं, हमलोगों की भावनाएं भारत के साथ वर्षों से जुड़ हुई है। चीन ने अरूणाचल में आ कर वहां चाइना लिख दिया और हमलोग चुप रह गये। भारत सरकार इस मसले पर चुप्पी साधे हुए है बल्कि वे तो यह भी कह रही है कि कुछ मीडिया इस तरह के गलत खबरे दे रहे हैं।´´...
image
सीमा पर बचे लेकिन सरकार से घायल
मातृभूमि पर अपनी जान की बाजी लगा देने वाले सैनिकों को अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद पैंशन के असमान वितरण से जूझना पड़ रहा है। आज के दौर में सरकार सैनिकों को पैंशन उनके रिटायरमेंट के समयानुसार प्रदान करती है। जिससे एक समान रैंक वाले दो सैनिकों को अलग-अलग सत्र में रिटायर होने के कारण अलग-अलग पैंशन मिलती है, जिसमें काफी बड़ा अंतर है। समान रैंक, समान पैंशन की मांगों को लेकर पूर्व सैनिकों ने 25 अक्टूबर को रविवार के दिन जंतर-मंतर पर धरना किया और पांचवी बार अपने पदकों को राष्ट्रपति को वापिस लौटा दिया। ...
image
डॉ कोठारी का 'दाल सत्याग्रह'
अंग्रेजों द्वारा नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा कर 'सत्याग्रह' किया था। उस दौरान महात्मा गांधीजी के साथ हजारों लोगों का हूजूम उमड़ गड़ा था किन्तु इस दौर में गांधीजी को प्रेरणास्रोत मानकर उनकी विचारधारा पर पिछले कई सालों से संघर्षरत एक आधुनिक गांधी सरकार से बात मनवाने के लिए अन्न त्याग कर प्राण त्यागने की जिद पर अड़े हैं लेकिन अभी तक उनके आस-पास कोई इकट्ठा नहीं हुआ है....
image
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्रों का आंदोलन
इधर दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिस वक्त केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी देश में चार और आईआईएमसी खोले जाने की घोषणा कर रही थी उसी वक्त दिल्ली से दूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्र अपने ही कुलपति के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े पत्रकारिता के छात्रों का यह आंदोलन थोड़ा बेतुका जरूर है लेकिन अप्रासंगिक नहीं है. मसलन आंदोलन करनेवाले छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय परिसर में निजी पत्रकारिता संस्थान न खोला जाए भले ही विश्वविद्यालय के जर्जर पत्रकारिता संकाय में एक ही शिक्षक उन्हें पत्रकारिता पढ़ाता रहे. ...
image
दोहा दौर का दोहरा संकट
तीन सितंबर से नई दिल्ली में शुरू हुए दो दिन के मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस और उसका विरोध दोनों शुरू हुए. दिल्ली में हो रही इस दो दिवसीय मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस का हजारों किसानों और प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया और भारत सरकार से किसी भी कीमत पर दोहा दौर से समझौता न करने की मांग की....
image
नरेगा के प्याले में कर्मचारियों का तूफान
मजदूरों को काम का अधिकार देने वाले नरेगा कानून से अब उसके कार्मिक ही खफा हो गये है। राजस्थान भर में 15 हजार नरेगा कर्मचारियों ने कलमबंद हड़ताल कर रखी है। 17 जुलाई के राज्य सरकार के एक आदेश ने इन कार्मिकों की परेशानियॉ बढा दी है। सरकार की ओर से कर्मचारियों को उनके संविदा नियमों से हटकर प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से लगाने की योजना है। जबकि कर्मचारी नियमित नियुक्ति के सपने पाले हुऐ थे। देश भर में काम के हिसाब से नंबर वन राजस्थान में नरेगा भ्रष्टाचार और शिकायतों में भी नंबर वन ही है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2