विरोध का धंधा करनेवाले लोग
यह सब लिखते हुए भी मुझे इस बात का अंदाज और अंदेशा है कि पेस्टीसाईड कंपनियां शांत नहीं बैठेंगी. हो सकता है वे मेरे ऊपर नये सिरे से हमले की योजना बना रही हों.
इसी साल अप्रैल के पहले हफ्ते की बात है. नई दिल्ली में मेरे दफ्तर सीएसई के सामने प्रदर्शनकारियों का एक समूह आ खड़ा हुआ. उनके हाथ में मेरे खिलाफ लिखे गये नारों की तख्तियां थीं. वे लोग मेरे खिलाफ नारे लगा रहे थे. हम लोगों को पक्का यकीन था कि यह विरोध प्रायोजित था और ऐसे विरोधों का सच भी हम खूब समझते हैं. हमने पेस्टीसाईड्स और जहरीले रसायनों के ऊपर जो अध्ययन जारी किया है उससे पेस्टीसाईड्स इंडस्ट्री को झटका लगा है. उनका व्यावसायिक हित प्रभावित हो रहा है तो जाहिर है वे हमें रोकने के हर तरीकों का इस्तेमाल करेंगे.
लेकिन हम ऐसा क्या कर रहे हैं जिसे वे होने नहीं देना चाहते? पिछले कुछ सालों से लगातार पेस्टीसाईड इंडस्ट्री सीएसई के खिलाप प्रेस कांफ्रेंस करने से लेकर एनजीओ स्तर के विरोध का सहारा ले रहा है. इसके मूल में कारण यह है कि सीएसई ने अपने प्रयोगों के द्वारा यह साबित कर दिया है कि पेस्टीसाईड खाने के साथ केवल हमारे शरीर को ही खराब नहीं कर रहे हैं बल्कि वे धीरे-धीरे हवा पानी और जमीन में भी घुल मिल रहे हैं. हवा पानी और मिट्टी में पेस्टीसाईड्स और जहरीले रसायनों के मिलने से तात्कालिक नुकसान के साथ-साथ दीर्घकालिक प्रभाव भी होंगे. पंजाब के किसानों के खून में फैलते कैंसर का जिम्मेदार भी पेस्टीसाईड है और केरल के पद्रे गांव की जहरीली जमीन का कारण भी पेस्टीसाईड ही है. इन बातों को जनहित में उठाने और प्रामाणिकता के साथ कहने के लिए तर्क से ज्यादा साहस की जरूरत थी क्योंकि देश की पेस्टीसाईड इंडस्ट्री संप्रभु लोगों के हाथ में है और ये संप्रभु लोग अपने फायदे में किसी भी प्रकार के खलल को भला क्यों बर्दास्त करेंगे?
शोध और अध्ययन के दौरान ही हमें पेस्टीसाईड लाबी की ओर से दर्जनों नोटिस मिली. प्रमाण सहित हमने हर नोटिस का जवाब दिया. लेकिन हमारे द्वारा दिये गये जवाबों पर कंपनियों द्वारा कभी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गयी. साफ है वे हमारे द्वारा किये जा रहे शोध को प्रभावित करना चाहते थे और उसके लिए उन्होंने हर तरह के हथकण्डे अपनाना शुरू कर दिया था. अब ताजा विरोध हमारे दफ्तर के सामने था. हमने इस विरोध का विरोध करने की कभी कोशिश नहीं की. लोकतंत्र में सबको प्रजातांत्रिक तरीकों से अपनी बात कहने का हक है. और इस विरोध को भी हमने उसी तरह से लिया. लेकिन एक दिन एक पत्रकार जो अक्सर सीएसई आते रहते हैं उन्होंने एक प्रदर्शनकारी को पहचान लिया. उन्होंने उसके बारे में जो जनकारी दी वह चौंकानेवाली थी. वह तथाकथित प्रदर्शनकारी कुछ दिनों पहले उस पत्रकार से मिला था. उन दिनों वह एक बिस्कुट कंपनी के लिए लाबिंग कर रहा था और सरकार पर दबाव डालने के काम में लगा हुआ था कि सरकार प्रसंस्कृति खाद्यानन्न को बढ़ावा दे.
यह हमारे लिए चौंकानेवाली बात थी. क्या भारतीय उद्योगों की भारतीय समाज और बाजार में यही पकड़ है कि वे अपने विरोध के लिए भी लोगों को किराये पर लेते हैं. अगर ताकतवर पेस्टीसाईड इंडस्ट्री जनहित की दुहाई दे रही है तो क्या उस जनसमुदाय में पांच लोग भी नहीं मिले जो उसके सही काम के समर्थन में "गैरजिम्मेदार" सीएसई के विरोध के लिए यहां आते. अभी तक हम यह तो देखते आये हैं कि अमेरिका जैसे कंपनी संचालित देश में कंपनियां अपना काम करवाने के लिए लाबिंग और खरीदे गये लोगों के सहारे प्रदर्शन आदि का सहारा भी लेती रही हैं लेकिन क्या यह सब अब भारत में भी शुरू हो गया है? हमने तय किया कि हम इस विरोध की भी जांच करेंगे.
हमने पता करना शुरू किया तो पता चला कि मुंबई में एक छोटे से आफिस से यह मीडिया एक्सप्रेशन कन्सोर्टियम काम करता है. इस पीआर ग्रुप का मुख्य काम कंपनियों के लिए फर्जी प्रदर्शनों से लेकर मीडिया लाबिंग तक हर तरह के काम करना हैं. हमारे सीएसई के प्रतिनिधि ने बातों-बातों में उससे जानना चाहा कि वह किन लोगों के लिए काम करता है तो उसने बड़े गर्व के साथ कहा कि देश की नामी गिरामी पेस्टीसाईड कंपनियों से लेकर बिस्कुट इंडस्ट्री में उसके कई सारे ग्राहक हैं जिसके लिए वह काम करता है. उसने बड़े गर्व के साथ कहा कि सीएसई के सामने जो प्रदर्शन हुआ था वह उसकी पीआर कंपनी ने ही आयोजित किया था लेकिन एक ही सांस में वह यह भी बताने से नहीं चूका कि उसको ऐसे विरोधों से कुछ लेना-देना नहीं है. यानी उसने सिर्फ अपने ग्राहक के कहने पर इस तरह का प्रदर्शन करवाया और अपना बिल वसूल लिया. भारतीय लोकतंत्र में यह पूंजी का नया व्यावसायिक चेहरा है जहां विरोध और प्रदर्शनों को भी पैसे के बदौलत खरीदा या बेचा जा सकता है.
कुछ साल पहले पेस्टीसाईड एसोसिएशन आफ इंडिया जो अब फसल सुरक्षा फेडरेशन के नाम से जाना जाता है उसने केरल में पद्रे के डाक्टर वाई एस मोहनकुमार को एक नोटिस भेजा कि उनके कारण पेस्टीसाईड कंपनियों को नुकसान हो रहा है. उनका दोष सिर्फ इतना था कि उन्होंने केरल के पद्रे गांव में पेस्टीसाईड कंपनियों के दुष्प्रभाव से निपटने के लिए दिनरात काम किया और लोगों का मानसिक तथा शारीरिक उपचार कर रहे थे. केरल का पद्रे गांव ऐसी जगह है जहां हर घर पेस्टीसाईड कंपनियों के कहर से त्रस्त है. कंपनियां अपनी जिम्मेदारी समझकर गलती महसूस करती इसकी बजाय वे गलढिठाई और बत्तमीजी पर उतर आयी है. वाई एस मोहनकुमार के बाद अब कंपनियों का ताजा शिकार एक रिटायर्ड वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने अपनी खोजबीन में पद्रे में किसानों की बर्बादी के लिए केमिकल और पेस्टीसाईड कंपनियों को दोषी पाया है.
यह सब लिखते हुए भी मुझे इस बात का अंदाज और अंदेशा कि है कि पेस्टीसाईड कंपनियां शांत नहीं बैठेंगी. हो सकता है वे मेरे ऊपर नये सिरे से हमला करने की योजना बना रही हों. पिछले हफ्ते उन्होंने मेरे घर पर भी धावा बोल दिया और मेरी चाची और मेरी 80 साल की मां को परेशान किया. लेकिन मुझे कोई चिंता नहीं. बहुत कुछ दांव पर लगा है. देश के असंख्य लोगों के हितों की रक्षा के लिए कुछ हड्डियां टूटती भी हैं तो क्या फर्क पड़ता है?
(सुनीता नारायण सीएसई की निदेशक हैं.)
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Lekin dukh hai ki ve ab jakar samjhhin hain ki desh men sab-kuchh bik raha hai ! Aadmi bhi aur aadmi ka ha-hakar bhi !!
मुझे जैसे असंख्य लोगों को उनका समर्थन है
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