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अप्राकृतिक संबंधों को कानूनी मान्यता

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दिल्ली हाईकोर्ट में गे संबंधों पर लंबित मामले पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया है कि अगर कोई भी स्त्री या पुरुष 18 साल से ऊपर है और आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो उसे गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता.

कोर्ट ने यह फैसला नाज फाउण्डेशन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करने के दौरान दिया है. हाईकोर्ट में 2001 से यह केस लंबित था. हाईकोर्ट में सुनवाई बहुत धीमी चल रही थी इसलिए नाज फाउण्डेशन ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट में अपील किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खुद याचिका स्वीकार नहीं की बल्कि हाईकोर्ट को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता की याचिका पर पूरी सुनवाई की जाए और उनके सारे पहलू सुने जाए. 2006 से हाईकोर्ट लगातार इस मसले पर सुनवाई कर रहा है और आज उसने फैसला दिया कि कानून की नजर में कोई भी वयस्क व्यक्ति अगर आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो कानून की नजर में अपराध नहीं होगा.

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अजीत प्रकाश शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर ने अपने फैसले में कहा कि अगर धारा 377 को संशोधित नहीं किया जाता तो यह भारतीय संविधान की धारा 21 का उल्लंघन होगा जो कि देश के सभी नागरिकों को एक समान होने का अधिकार प्रदान करता है. समानता और सबको समान अधिकार यह संविधान की मूल भावना है.

हाईकोर्ट का यह फैसला दिल्ली में गे परेड के चार दिन बाद आया है. गे परेड के बाद कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा था कि सरकार धारा 377 को समाप्त करने के बारे में किसी जल्दबाजी में नहीं है. हालांकि इस बयान के बाद सात साल से लंबित मामले में आया फैसला भी कई तरह के सवाल पैदा करता है. नाज फाउण्डेशन की याचिका का विरोध कर रहे जैक इंडिया के संचालक पुरुषोत्तमन मुल्लोली का कहना है कि हम इस फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और अपनी लड़ाई जारी रखेंगे. उन्होंने कहा कि फैसले की प्रति दो िदनों में उपलब्ध हो जाएगी इसके बाद हम आगे की रणनीति तय करेंगे. हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया है कि जब तक संसद धारा 377 में संशोधन नहीं कर देता तब तक यह फैसला लागू नहीं होगा.

हाईकोर्ट ने अपने 100 पेज के फैसले में यह भी कहा है कि धारा 377 में सुधार होना चाहिए लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बच्चों के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने संबंधी जो भी प्रावधान इस धारा में निहित हैं वे बनाये रखे जाएं. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सरकार अब धारा 377 को चाहे तो समाप्त कर सकती है या फिर उसमें संशोधन करके अप्राकृतिक संबंधों को कानूनी मान्यता दे सकती है. 

फैसले के वक्त गे समूहों के कोई 100 प्रदर्शनकारी हाईकोर्ट के सामने मौजूद थे और उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन करार दिया. उपस्थित गे समूह के लोगो ने कहा कि आज उनका भारतीय कानून व्यवस्था पर विश्वास बढ़ गया है.

 

समलैंगिकता पर आठ साल तक चली कानूनी लड़ाई का घटनाक्रम इस प्रकार है (याहू जागरण)

2001: समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले नाज फाउंडेशन ने जनहित याचिका दायर कर मांग की कि वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को वैध किया जाए।

2 सितंबर 2004: दिल्ली हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की मांग की गई थी।

सितंबर 2004: समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने समीक्षा याचिका दायर की।

3 नवम्बर 2004: हाईकोर्ट ने समीक्षा याचिका खारिज की।

दिसंबर 2004: समलिंगी कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

3 अप्रैल 2006: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

4 अक्तूबर 2006: हाईकोर्ट ने भाजपा नेता बीपी सिंघल की याचिका स्वीकार की, जिसमें उन्होंने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने का विरोध किया।

18 सितंबर 2008: केंद्र ने गृह मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के बीच मतभेदों के चलते इस मुद्दे पर कोई कदम उठाने के लिए और समय मांगा। अदालत ने आग्रह खारिज किया और अंतिम सुनवाई शुरू हुई।

25 सितंबर 2008: समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि नैतिकता के नाम पर सरकार समानता के मौलिक अधिकार से उन्हें वंचित नहीं कर सकती।

26 सितंबर 2008: समलैंगिकता पर स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय द्वारा परस्पर विरोधी हलफनामे दायर किए जाने पर हाईकोर्ट ने केंद्र की खिंचाई की।

26 सितंबर 2008: केंद्र ने कहा कि समलैंगिकता अनैतिक है और इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने से समाज का नैतिक पतन होगा।

15 अक्तूबर 2008: हाईकोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को प्रतिबंधित करने के लिए धार्मिक मान्यताओं को मानने पर केंद्र की खिंचाई की और कहा कि वह इसे उचित ठहराने के लिए वैज्ञानिक नजरिया पेश करे।

नवम्बर 2008: सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष कहा कि न्यायपालिका को मामले में हस्तक्षेप करने में संयम बरतना चाहिए, क्योंकि इस पर संसद फैसला करेगी।

7 नवम्बर 2008: हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।

2 जुलाई 2009: हाईकोर्ट ने वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को वैध घोषित किया।

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