जनरैल को नौकरी से निकालने पर पंजाब में तीखी प्रतिक्रिया
सिख सियासत के बाबा बोहड़ माने जाते एसजीपीसी के दो दशक तक सचिव रहे जत्थेदार मनजीत सिंह कलकत्ता ने जरनैल सिंह को बर्खास्त करने की कार्रवाई को दुभाग्यपूर्ण करार दिया है.
सिख सियासत ने पत्रकार संगठनों से अपील की है कि एक ईमानदार व भावुक पत्रकार के कैरियर को बर्बाद करने वाली इस कोशिश का विरोध करें।
उन्होंने जरनैल का पीआईबी का परिचय पत्र पुलिस के माध्यम से जब्त करने का अर्थ यही निकाला कि सरकार की ही कोई हिदायत हो सकती है अलबत्ता घटना के समय जबगृहमंत्री चिदंबरम ने भी यह मान कर कि ये एक भावुक प्रतिक्रिया है, कोई मामला दर्ज नहीं करवाया तो पुलिस किस अधिकार से जरनैल के सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार होने के दस्तावेज़ों को जब्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि एस.जी.पी.सी प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ पहले ही इस मामले में अपना स्टैंड स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि जरनैल सिंह को आर्थिक समस्या आएगी तो शिरोमणि कमेटी उनके साथ डट कर खड़ी होगी।
पंथक वाच डाग ग्रुप के प्रिजीडियम मैंबर व जालंधर केंद्रीय सिंह सभाओं के अध्यक्ष जत्थेदार जगजीत सिंह गाबा ने कहा है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने तीन माह बाद ये फैसला लेकर ये जता दिया है कि सरकार के दबाव के चलते उन्हें ये कदम उठाने पर विवश होना पड़ा है। यदि देश का गृहमंत्री मामले को भूलने को कहता है व थाने का थानेदार जरनैल के साथ द्रुव्यवहार करते हुए उसके सरकारी दस्तावेज़ जब्त कर लेता है तो साफ जाहिर है कि स्टेट नामक सिस्टम इस मामले में भी काम कर रहा है। उधर चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने एक आपात बैठक बुलाई है जो उनके घर पर चल रही है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक में जरनैल के मुद्दे पर भी विचार हो सकता है।
ज्ञात हो कि 84 के दंगों के आरोपियों को दोषमुक्त करार दिये जाने के विरोध में पत्रकार जनरैल सिंह ने गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंका था जिसके बाद से दैनिक जागरण ने उनको छुट्टी पर भेज रखा था. अब तीन महीने बाद 1 जुलाई से उन्हें जागरण समूह से कार्यमुक्त कर दिया है.जनरैल सिंह को बर्खास्त करते हुए जागरण ने जो पत्र भेजा है उसमें लिखा है कि उन्होंने चिदम्बरम पर जूता फेंककर जो अनुशासन तोड़ा है उसे देखते हुए अब जागरण मैनेजमेन्ट उन्हें और अपने साथ नहीं रख सकता. हालांकि अब तीन महीने बाद भले ही जागरण उन्हें नौकरी से निकाल रहा हो लेकिन घटना के बाद जनरैल सिंह को जागरण ने तीन महीने जबरन छुट्टी पर रखा और लगातार दबाव डाला कि वे अपना इस्तीफा भेज दें. इस दौरान तीन महीने की सैलरी भी जनरैल सिंह को नहीं दी गयी है. जनरैल सिंह इस बात की पुष्टि करते हुए बताते हैं कि उनके ऊपर इस्तीफे का भारी दबाव था, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया तो संस्थान ने उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया.



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