ग्राम पंचायतों को सीधे मिले केन्द्रीय बजट का सात प्रतिशत
राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन महामंत्री गोविन्दाचार्य ने कहा है कि केन्द्रीय बजट का सात प्रतिशत सीधे ग्राम पंचायतों को मिलना चाहिए. गोविन्दाचार्य का मानना है कि इससे विकेन्द्रित और संतुलित विकास करने में मदद मिलेगी.
गोविन्दाचार्य द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार विकास और विकास के लाभों को गांवों तक पहुंचाने के लिये, देश में विकेिन्द्रत तथा सन्तुलित विकास करने के लिये तथा गांधीजी के `ग्राम स्वराज्य´ के सपने को साकार करने के लिये यह जरूरी है.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के 60 वर्ष से अिधक हो जाने के बावजूद गांवों की बदहाली तथा कंगाली बढ़ती जा रही है। आर्थिक सुधारों के बाद गांवों के उजड़ने और लोगों के शहरों की ओर पलायन की गति बढ़ती जा रही है। केन्द्र एवं राज्य सरकारों की अनेक योजनाएं ग्राम विकास के नाम पर चल रही हैं। परन्तु उनका हाल तो भूतपूर्व प्रधानमन्त्राी श्री राजीव गांधी के कथनानुसार ही है कि दिल्ली से 1 रुपया निकलता है परन्तु आखिर तक 15 पैसे ही पहुंचते हैं। संविधान संशोधन द्वारा देश में पंचायती राज्य की स्थापना हुयी। पंचायतों को कुछ कामों के अिधकार भी मिले पर आर्थिक संसाधन तो उपलब्ध कराये ही नहीं गये, अत: वे अिधकार भी कागजी रह गये।
गांधीजी के `ग्राम स्वराज्य´ के सपने को साकार करने के लिये गांवों को और अिधक विधायी अिधकार तथा वित्तीय अिधकार देने होंगे। परन्तु अभी तो लगातार 200 वर्षों से एक तरफा शोषण के कारण गांव कंगाल हो रहे हैं। अत: विकास के लिये ग्राम पंचायतें स्वयं आर्थिक संसाधन जुटाएं ऐसा उपदेश देना जले पर नमक छिड़कने जैसा है। पंचायती राज से प्राप्त अिधकारों को लागू करने में ग्राम पंचायतों को आर्थिक संसाधन हस्तान्तरित करने की तुरन्त आवश्यकता है। विकास की दौड़ में कुछ राज्य बहुत आगे निकल गये हैं तो कुछ बहुत ही पिछड़ गये हैं। अत: राज्यों से वित्तीय हस्तातंरण इस विषमता को बढ़ाने वाला ही होगा।
चूंकि देश की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। अत: हम मांग कर रहे हैं कि केन्द्रीय बजट की कम से कम सात प्रतिशत राशि सीधे ग्राम पंचायतों को दी जाय। इस राशि के खर्च करने में गांव पुरी तरह स्वतन्त्रा हों। `ग्राम सभा´ विकास कार्यों का निर्णय करे तथा `ग्राम पंचायत´ उन कामों को करें।



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