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झरियाः आग का दरिया

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विकास के जिस उड़नखटोले पर बैठकर देश का खास वर्ग यात्रा कर रहा है, उसी विकास ने झरिया से उसकी हरियाली और खुशहाली दोनो छीन ली है। एक समय झारखंड का कोयला क्षेत्र झरिया जो अभ्यारण्य हुआ करता था आज आग के दरिया में तब्दील हो गया है। झरिया की कोयला खदानें ऐसी पहचान अख्तियार कर चुकी हैं जिसके नीचे कोयले में आग लगी हुई है लेकिन ऊपर माफिया का राज चल रहा है.

इसी साल आठ अगस्त को झारखंड के अंदर कोयला क्षेत्र में लगी आगों की श्रृंखला में एक नाम और जुड़ गया। कुजू का। कुजू राज्य के लाइफ लान माने जाने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 33 पर आता है। यह आग की घटना साधारण नहीं थी। प्रत्यक्षदिर्शयों के अनुसार उस दिन तेज धमाका हुआ, उसके बाद बीच सड़क से आग की लपटे बाहर निकलने लगी। वह दृश्य बेहद डरावना था। आग की वह लपटे 15-20 फीट तक ऊपर गई। उसके बाद तो मानों वहां सरकारी अधिकारी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर राजनेताओं तक के आने का सिलसिला शुरू हो गया। 

यहां गौर करने वाली बात यह है कि यहां आस-पास रहने वाले लोग इस आग की िशकायत पिछले दो-तीन सालों से कर रहे थे। लोहा गेट दस के पास रहने वाले सुरेश उड़ांव के अनुसार- `यह आज लगी आग नहीं है। यह पांच-सात साल पुरानी आग है।´ एक दैनिक पत्र ने इस क्षेत्र में आग की रपट लगभग दो साल पहले प्रकािशत कर दी थी। आग पर पहले ही काबू पाया जा सकता था, लेकिन उसे बढ़ने दिया गया। आग की घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने कुजू, लोहा गेट से लेकर लकड़ी गेट तक वाहनों का परिचालन पूर्णत: ठप्प करवा दिया है। अब यह क्षेत्र घोषित डेंजर जोन है। यहां रहने वाले लोगों को सीसीएल द्वारा नोटिस दे दिया गया है कि `आप अविलम्ब यह क्षेत्र खाली कर दें। वरना कोई दुर्घटना होने पर जवाबदेही आपकी होगी।´

झरिया में साइकिल चोर का मतलब साइकिल चुरानेवाले से नहीं होता. यहां जो साइकिल से कोयला चुराकर बेचता है उसे साइकिल चोर कहते हैं. छोटा नागपुर आदिवासी सेवा समिति से सम्बद्ध महालाल और फिलेन हॉरो कहते हैं- `रामगढ़ और हजारीबाग में लगभग 2000 परिवारों की रोजी-रोटी इसी प्रकार की कोयला चोरी से चलती है। रामगढ़, चीत्तरपुर, पीठूरिया, सीकीदरी रोड़ से चलने वाले साइकिल चोर कोयला रांची लेकर आते हैं। वहीं दूसरी तरफ मांडू, परेज, घाटो, चरचू, विश्णुगढ़, बड़काघाट के रास्ते चलने वाले साइकिल चोर कोयला हजारीबाग ले जाते हैं। इन सभी रास्तों से प्रतिदिन 200-250 साइकिल चोर प्रतिदिन गुजरते हैं। एक बोरी कोयला जो बीचौलिया 15 रुपए में खरीदता है, वहीं इसे रांची या हजारीबाग के बाजार में बेचने पर 25 से 30 रुपए की रकम आसानी से मिल जाती है। ऐसा ही एक नोटिस किरण देवी को भी मिला है। वह कहती हैं कि हमारा परिवार पिछले तीस-चालीस सालों से यहां रह रहा है। अब हम कहां जाए? ऐसी विषम परिस्थिति में अब कुजू, लोहागेट के आस-पास रहने वाले लोगों ने `रामदास´ होना मंजूर कर लिया है लेकिन विस्थापित होने को वे तैयार नहीं हैं और सीसीएल यहां खोड़ा राम की भूमिका में है।

रामदास ठक्कर और खोड़ा राम की कहानी आपको झरिया के पुराने लोग सुनाएंगे। कहानी छोटी सी है। जिसका मुख्य किरदार रामदास बालूगदा में बनियान बनाने का काम करता था। वह एक सुखी सम्पन्न व्यावसायी था। खोड़ा राम कोयले का व्यावसायी था। उस जमाने में लीज की कोई जरूरत नहीं थी, इसलिए वह जमकर खदान से कोयला निकालता और उसे खुले बाजार में बेचता था। उसकी आमदनी रामदास से अधिक थी। इसके बावजूद उसे संतोश नहीं था। वह और पैसा कमाना चाहता था, इसलिए उसने रामदास के सामने बनियान के काम में सांझेदारी की पेशकश की। रामदास तैयार नहीं हुआ। यह बात खोड़ा राम को नागवार गुजरी। उसने रामदास के दूकान के ठीक नीचे से धीरे-धीरे भूमिगत कोयला निकालना शुरू कर दिया। एक दिन ऐसा आया कि रामदास दूकान समेत उस खदान में समा गया। बताने वाले कहानी को 1930 के आस-पास का बताते हैं। चूंकि यह किसी हिन्दी फिल्म की पटकथा नहीं है, इसलिए कहानी का अंत यहीं होता है। वैसे कायदे से कहानी का अंत बालूगदा के खोड़ा राम की मौत के बाद होना चाहिए था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि खोड़ा राम मरा नहीं है। खोड़ा राम जैसे लोग व्यक्ति नहीं होते, वे एक प्रवृत्ति हैं। आज टाटा, सीसीएल, बीसीसीएल, मित्तल जैसी कंपनियों में खोड़ा राम की घुसपैठ है। वह तमाम कोयला खदानों में आउट सोर्स का काम संभाल रहा है। जबकि माइनिंग लॉ में आउट सोर्स के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। खोड़ा राम वही है, दशहरे में आप जिसकी मूर्ति रावण के नाम पर जलाते हैं। वह अगले दशहरे में फिर एक फीट ऊंचा हो जाता है। बगल में खड़े श्री राम की मूर्ति का कद आज भी वही है, जो आज से 40 साल पहले था।

मार्किस्ट को-ऑर्डिनेशन कमिटी के संस्थापक और धनबाद के पूर्व सांसद एके राय बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते है, माइनिंग के जो कानून हैं। वो अब सिर्फ किताबों में है। यहां कोयला क्षेत्र में रहने वाले लोगों की परेशानी बढ़ाने के लिए गुंडा है, माफिया है और उनकी मदद करने के लिए व्यवस्था है। राय के अनुसार धनबाद क्षेत्र में चल  रहा 40 फीसदी खनन गैरकानूनी है। यहां आग प्रभावित क्षेत्रों की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोतरी की एक मुख्य वजह खनन कानून की लगातार हो रही अनदेखी और कोयला क्षेत्र में प्रारंभिक चरण में आग की जानकारी होने के बाद उसकी उपेक्षा को माना जा सकता है। कुजू भी इसका एक उदाहरण है।

जादूगोड़ा (पूर्वी सिंहभूम) के यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के खदानों के आस-पास रहने वाले परिवारों के बीच वर्ष 2007 में डॉक्टर्स फॉर पीस एंड डेवलपमेंन्ट (आईडीपीडी) ने झारखंडी ऑर्गेनाइजेशन अगेन्स्ट रेडिएशन (जोआर) के साथ मिलकर एक स्वास्थ संबंधी सर्वेक्षण किया। उसके निष्कर्ष किसी को अचंभित कर सकते हैं। इस सर्वेक्षण के परिणाम जादूगोड़ा में तीस किलोमीटर तक के खदानों से ढाई किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले लगभग दो हजार परिवारों से बातचीत करके निकाले गए हैं। सर्वेक्षण के अनुसार यहां रहने वाले 9.5 प्रतिशत नवजात िशशु प्रतिवर्ष मौत के मुंह में चले जाते हैं। यहां कैंसर से मरने वालों की संख्या 2.87 प्रतिशत है। 68.33 प्रतिशत लोगों की मौत 62 साल से पहले हो जाती है। सर्वेक्षण के अनुसार यहां रहने वाली 9.6 प्रतिशत महिलाएं शादी के तीन साल के बाद भी मां नहीं बन पाई हैं।डाक्यूमेन्ट्री फिल्म निर्माता मेघनाथ तो खनन के नाम पर हो रहे शोषण को आन्तरिक उपनिवेशवाद की संज्ञा देते हैं। उनका मानना है, जो कंपनियां या उनके कर्मचारी झारखंड से बॉक्साइड, यूरेनियम, कोयला निकालने आती हैं, उनका एक मात्र मकसद यहां से अधिक से अधिक पैसा बनाना होता है। उनकी कोई सहानुभूति इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के प्रति नहीं है। उनका कोई जुड़ाव यहां की माटी से नहीं है।

झारखंड के कोयला क्षेत्र में एक अनुमान के अनुसार 150 से अधिक जगहों पर आग सुलग रही है। यह आग अब धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। इसमें झरिया को तो आग पर बसा हुआ शहर ही कहते हैं। यहां खुले खदानों में लगी हुई आग को कोई भी देख सकता है। वर्ष 1994-97 में कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के संयुक्त अध्ययन दल ने `दि झरिया माइन फायर टेक्नीकल कंट्रोल एसिस्टेंस प्रोजेक्ट´ के नाम पर एक अध्ययन किया था। अध्ययन के बाद कोयला क्षेत्रों में बढ़ रही आग लगने की घटना पर कई सुझाव दिए गए थे, मसलन इसमें आग पर नियंत्रण के लिए पानी के परदे का जिक्र आता है। अध्ययन दल आग प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले लोगों के पुनर्वास की वकालत करता है।

हाल में ही झरिया में अग्नि प्रभावित क्षेत्र में रह रहे लोगों के बीच पुनर्वास संबंधी एक सर्वेक्षण दल के साथ केन्द्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान के वरिश्ठ वैज्ञानिक डा एम एस आलम नीमतला, बोकापहाड़ी, मुस्लिम बस्ती, ग्वाल पट्टी आदि बस्तियों में गए। डा आलम के अनुसार- उन्होंने देखा वहां ज्यादातर घरों की हालत दयनिय थी। बकौल डा. आलम- मुझे लगता है, जिन इलाकों में हम गए, वहां रहने वाले लोगों का मुख्य रोजगार कोयला चोरी था। इसी चोरी से हुई आमदनी से उनके घर में दो वक्त चुल्हा जलता है।´

वहां छोटी-छोटी कोठरियों में आठ से दस लोग थे। वहां इतनी दुर्गंध थी कि रुकना मुिश्कल। डा. आलम ने यह भी बताया कि वहां कई ऐसे परिवार मिले जो कोयले में लगी भूमिगत आग की आंच पर दाल-चावल पकाने का खतरनाक काम कर रहे थे। इसकी वजह डा आलम उनकी गरीबी और जानकारी की कमी को मानते हैं। वे कहते हैं-`वे नहीं जानते यह आग एक दिन उनका सर्वस्व लील सकती है।´ बीसीसीएल लंबे समय से इस आग को बुझाने के नाम पर प्रतिवर्ष आठ से दस करोड़ रुपए खर्च करता है। विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि झरिया के आग पर काबू नहीं पाया जा सकता। झरिया में आग की पहली खबर 1911 में सूराटांड नामक जगह से मिली। 50 के दशक तक आते-आते आग के कई दर्जन  केन्द्र यहां सक्रिय हो गए। मसलन खोड़ाराम, कुसुंडा, गोपाली चक, भौंरा, केन्दुआडीह, कतरास पूर्व और दक्षिण आदि।

झरिया एक्शन प्लान के अनुसार बीसीसीएल के आग प्रभावित क्षेत्रों में पैंसठ हजार लोग रहते हैं। अब बात हो रही है, इनके विस्थापन की। 1950 के बाद 30 फीसदी झारखंड के लोग विस्थापित हुए और 41 प्रतिशत लोगों की जमीन छीनी। जिन लोगों की जमीन छीनी गई, उनके अनुभव अच्छे नहीं है। वे दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं। अब यह सवाल उठना लाजमी है कि जिस राज्य में देश का 29 प्रतिशत कोयला, 14 प्रतिशत लोहा हो, उस राज्य की 44 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे कैसे है? क्यो इस राज्य के 90 प्रतिशत जिले देश भर के सबसे गरीब 150 जिलों में शामिल हैंर्षोर्षो 1950 से 91 के बीच 41 सालों में झारखंड के 26 लाख लोगों को विस्थापित किया गया। उनमें सिर्फ 25 फीसदी लोगों को पुनर्वास का लाभ मिला। गौरतलब है कि विस्थापितों में 52 फीसदी आदिवासी थे। पुराने अनुभव जब इतने खतरनाक हैं, फिर कैसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे एक बार फिर उजड़ने को तैयार हो जाएंगे?

उन लोगों का दर्द सिर्फ इसी बात से समझा जा सकता है कि आग प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पता है कि उनकी जान किसी भी दिन जा सकती है। किसी भी दिन आग उनकी जीवन लीला समाप्त कर सकती है, उसके बावजूद वे नई जगह पर जाने को तैयार नहीं हैं। पुनर्वास के लिए तैयार नहीं हैं। इस क्षेत्र में आग बुझाने का प्रयास लगातार जारी है। आग प्रभावित क्षेत्र का संपर्क ऑक्सीजन से काटना, आग बुझाने की एक कारगर पद्धति रही है। लेकिन यह पद्धति आग का क्षेत्र व्यापक होने पर कारगर नहीं साबित नहीं होती। चूंकि अधिक गर्मी से मिट्टी में दरार पड़ जाती है। जिससे आग ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है। आग बुझाने के लिए सीएमआरआई (कोयला खनन शोध संस्थान) द्वारा विकसित पद्धति कारगर साबित हो सकती है। जिसमें पानी, और अज्वनशील गैसों की मदद से आग बुझाने का प्रयास किया जाता है। इसी प्रकार आईएसएम (धनबाद) के छात्रों द्वारा तैयार एसेस फायर सॉफ्टवेयर कोलियरी में आग होने उसकी सूचना झट से देगा। इससे समय रहते आग पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। वर्ष 2004 में वासुदेवपुर के कोयला खदान में इसका सफल परिक्षण हो चुका है। आज के समय में जरूरत है, इस तरह के शोध को प्रोत्साहित करने की। जो जमीन हमने आग लगने की वजह से गंवाई उसे वापस पाने के लिए प्रयत्न करने की और झारखंड में कुजू जैसे नए आग के केन्द्र तैयार ना हो, इसके लिए सतर्क रहकर प्रयासरत रहने की।

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sanjay swadesh on 27 September, 2009 18:08;36
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badhiya hai anshu ji,
eshe 2 bar padh liye.
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अविनाश वाचस्‍पति on 27 September, 2009 19:46;13
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आग के इस दरिया को बुझाना होगा
पर जैसे नहीं जल रहा है रावण
रोज ही बढ़ रहा है रावण
उसी तरह यह आग नहीं बुझेगी
यह आग जो दिख रही है
सिर्फ वही नहीं है
आग भीतर भी है
जिसका बुझना संभव नहीं है।
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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