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शुरु होने से पहले ही विवादित हो गया नक्सलियों के खिलाफ "बड़ा अभियान"

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नक्सल प्रभावित राज्यों में बड़े पुलिस अभियान से पहले ही विवाद छिड़ गया है। यह विवाद राज्यों और केंद्रीय पुलिस बल के बीच है। राज्य पुलिस केंद्रीय पुलिस बलों पर असहयोग का आरोप लगा रहा है। वहीं केंद्रीय पुलिस बल का आरोप भी यही है। पहले छतीसगढ़ और अब उड़ीसा। दोनों राज्यों से इस तरह के विवाद की सूचना है। स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ के बीच तालमेल नहीं बैठ रहा है। जबकि केंद्र सरकार राज्यों के सहयोग से नक्सलियों के खिलाफ जोरदार अभियान की दंभ भरी घोषणा कर रही है। ताजा घटना उड़ीसा की है। नवीन पटनायक ने केंद्र से और सीआरपीएफ की और टुकड़ियां मांगी है। उधर सीआरपीएफ का आरोप अलग है। उड़ीसा में पहले से तैनात कई बटालियन का उपयोग उड़ीसा पुलिस नहीं कर रही है। यह आरोप सीआरपीएफ के अफसरों का है।

मसला गंभीर है। इससे पहले छतीसगढ़ में सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के बीच असहयोग की बात सामने आयी थी। बस्तर जिले में हाल ही में सीआरपीएफ के दो अफसरों की मौत के बाद विवाद गहराया। सीआरपीएफ ने कार्रवाई के दौरान लोकल इनपुट का आभाव बताया। राज्य पुलिस के असहयोग के आरोप भी लगे। इसके बाद इन इलाकों में सीआरपीएफ ने अपनी पेट्रोलिंग कम कर दी। उनका तर्क वाजिब नजर आया। सीआरपीएफ के जवान स्थानीय भाषा नहीं समझते। लोकल इंटेलिजेंस इनपुट कम है। स्थानीय पुलिस का सहयोग न के बराबर है। उड़ीसा और छतीसगढ़ में स्थानीय पुलिस से तालमेल के आभाव में सीआरपीएफ जवान तंबू में टीवी देख रहे है।

दिलचस्प बात है कि विगत की घटनाओं से केंद्र सरकार ने कोई सीख नहीं ली। पंजाब में भी आतंकवाद के दौरान कुछ ऐसी ही स्थिति थी। इन गलतियों में सुधार किया गया। इन गलतियों के सुधार के बाद पंजाब में हालात ठीक हुए। पंजाब में सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हुआ, आतंकवाद खत्म हो गया। किसी भी राज्य में आतंकी विरोधी चलाए जाने वाले अभियान में इस तरह के विवाद उभरते है। पंजाब में भी स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ के बीच टकराव उभरा था। स्थानीय पुलिस और केंद्र की पुलिस के बीच इगो की समस्या आयी थी। आतंकी किसने मारा, इसपर भी विवाद हो जाता था। लेकिन केपीएस गिल ने इस विवाद को खत्म किया। खुद सीआरपीएफ के डीजी रहे केपीएस गिल पंजाब में डीजीपी बनने के बाद सीआरपीएफ के कई योगय अफसर लेकर आए। इसमें महाराष्ट्र से हाल ही में रिटार्यड हुए आईपीएस एसएस विर्क थे। आईपीएस विर्क को सीआरपीएफ में डेपूटेशन पर लाया गया। उनकी पोस्टिंग जालंधर के सीआरपीएफ बेस में की गई। विर्क जालंधर के ही रहने वाले थे। उन्हें स्थानीय भुगोल, धार्मिक, समाजिक समीकरणों की पूरी जानकारी थी। उन्होंने सीआरपीएफ और लोकल पुलिस के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया। इसके बाद पंजाब में कई सफल ज्वाइंट आपरेशन सीआरपीएफ और लोकल पुलिस ने किए।

आतंकवाद के दौर में केपीएस गिल अपने साथ दस सीआरपीएफ के असिटेंट कमांडेंट रैंक के नए रिक्रूट पंजाब लेकर आए। ये अधिकारी पंजाब में सफल अधिकारी साबित हुए। दिलचस्प बात यह थी कि इनका स्थानीय पुलिस से कहीं विवाद नहीं हुआ। हर जगह पंजाब पुलिस के साथ इनका ज्वाइंट आपरेशन हुआ और सफलता मिली। कई बार तो उग्रवादियों को सीआरपीएफ ने पकड़ा, स्थानीय पुलिस के हवाले किया। यह स्थानीय पुलिस की मोरल बूस्टिंग के लिए किया जाता था। प्रेस कांफ्रेंस में सीआरपीएफ द्वारा पकड़े गए आतंकी स्थानीय पुलिस के हवाले पकड़ा हुआ दिखाया गया। यह एक बेहतर तालमेल का नतीजा था। बकौल केपीएस गिल स्थानीय पुलिस के सहयोग के बिना उग्रवाद पर जीत हासिल नहीं हो सकती। पंजाब में आतंकवाद के दौर में आईआरबी बटालियन का गठन हुआ जिसमें स्थानीय युवाओं को रखा गया। ये स्थानीय भाषा समझते थे, इनका इंटलिजेंस मजबूत था।
छतीसगढ़ और उड़ीसा में स्थानीय इंटेलिजेंस की समस्या आ रही है। सीआरपीएफ के अधिकारी दबी जुबान से यह स्वीकार कर रहे है। उनका मानना है कि इंटेलिजेंस इनपुट न के बराबर है। जो कुछ भी कार्रवाई हो रही है वो रामभरोसे है। सीआरपीएफ के अधिकारियों और जवानों को स्थानीय भाषा समझ में नहीं आती। बंगाल में बंगाली, उड़ीसा में उड़िया सामान्य रुप से स्थानीय जवानों के अतिरिक्त कोई बाहरी नहीं समझ सकता। यह समस्या पंजाब में उतनी नहीं थी। पंजाब में हिंदी और पंजाबी का मिश्रण चल जाता था। इसलिए सीआरपीएफ भी काफी हद तकअपने बल पर इंटेलिजेंस को मजबूत रखती थी। हाल ही में महाराष्ट से रिटाडर्य हुए एसएस विर्क का व्यक्तिगत इ¡टेलिजेंस कमाल का था। पर झारखंड में इंटेलिजेंस के फ्रांसिस इंदवार की हत्या के बाद इंटेलिजेंस की कलई खुल गई है। लोकल पुलिस को इंटेलिजेंस इनपुट के हिसाब से मजबूत करना होगा। जिन राज्यों में केंद्रीय पुलिस बल आपरेशन में है उनस राज्यों में केंद्रीय पुलिस बल में उस राज्य से चयनित किए गए कमांडेंट या उससे उपर के रैंक के अधिकारी की नियुक्ति हो तो स्थानीय पुलिस और स्थानीय लोगों से बेहतर तालमेल स्थापित होगा। कुछ ऐसे ही अफसरों को सीआरपीएफ में लगाना होगा जो नक्सल प्रभावित राज्य के ही हो। नक्सल प्रभावित राज्यों से ही चयनित आईपीएस रैंक के अधिकारियों को डेपूटेशन पर सीआरपीएफ में भेजे जाने पर बेहतर परिणाम आ सकते है। ये स्थानीय पुलिस और लोगों से से बेहतर कोआर्डिनेशन स्थापित कर सकेंगे।

समस्या और भी है। स्थानीय पुलिस भी कई समस्याओं से जूझ रही है। राज्यों में आईआरबी बटालियनों का गठन सुस्त चाल में हो रहा है। फिर इन बटालियनों में भरती में भ्रष्टाचार है। फिट जवानों के बजाए सिफारिशी लोगों को रखा जा रहा है। यह शिकायत छतीसगढ़ में आयी थी। छतीसगढ़ में कुछ समय तक राज्य सरकार के सुरक्षा सलाहकार रहे केपीएस गिल का विवाद इसी मसले को लेकर राज्य सरकार से हो गया था। केपीएस गिल ने आईआरबी बटालियन में भरती के दौरान नक्सल प्रभावित जिलों के स्थानीय जनजातीयों की भरती पर ज्यादा जोर दिया था। उनका कहना था कि ये स्थानीय भूगोल समझते है। ये स्थानीय भाषा समझते है। पर सरकार ने पूरे छतीसगढ़ से सिफारिशी लड़कों को आईआरबी बटालियन में रख लिया। इस कारण ही छतीसगढ़ सरकार और केपीएस गिल के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया था।

छतीसगढ़, बंगाल, उड़ीसा, झारखंड में नक्सली लड़ाई पंजाब से अलग है। भौगोलिक परिस्थतियां काफी विषम है। इस कारण लड़ाई स्थानीय लोगों केसहयोग के बिना नहीं लड़ी जा सकती है। नक्सल विरोधी आपरेशन में लगे केंद्रीय पुलिस बल के 15 से से 20 प्रतिशत जवान विपरित भूगोल के कारण बीमार रहते है। इस इलाके में मच्छरों की भरमार है। सीआरपीएफ के जवानों को काफी ज्यादा तकलीफ मलेरिया से हो रही है। इन इलाकों में चालीस से पचास किलोमीटर तक कोई अस्पताल नहीं मिलता। जवान बीमार पड़ जाए या गोली लग जाए तो अस्पताल ले जाने में भारी दिक्कत आती है। ये सारी समस्या पंजाब में नहीं थी। पंजाब में न तो पहाड़ थे, न ही जंगल। हर गांव तक सड़क थी। जिले के किसी भी इलाके से जिला हेडक्वार्टर में आधे घंटे से एक घंटे के बीच पहुंचा जा सकता था। इंटेलिजेंस इनपुट पंजाब में काफी बढ़िया था। आतंकियों के छिपे हुए जगह पर दस मिनट में पुलिस पहुंचती थी। सिर्फ मंड के इलाके में पुलिस को परेशानी होती थी। पर इस समय नक्सल प्रभावित इलाके में भारतीय पुलिस फोर्स को पाकिस्तान के वजीरस्तान जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इन इलाकों में हमारी पुलिस का हाल कुछ पाकिस्तानी सेना जैसा ही है। जंगल, पहाड़, गुफा से हमारी पुलिस परेशान है तो पाकिस्तानी फौज भी परेशान है।

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alok nandan on 12 November, 2009 16:02;13
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बेहतर रिपोर्ट!!
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girish kesharwani on 27 July, 2010 19:38;45
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इस पूरी लेख के पढने के बाद मैं यही टिपण्णी करना चाहूंगा सबसे पहला तो राज्य पुलिस की खुफिया तंत्र बहुत कमजोर है नक्सलियों के मुताबिक़ नक्सलियों के खुफिया तंत्र शहरों से लेकर गाँवों तक सुदृढ़ स्थिति में है वे अपने मुखबिरों को मुंह माँगा रकम देते हैं वहीँ राज्य सरकार अपनी तय रकम में से भी आधी रकम मुखबिरों तक नहीं पन्हुच्पति इसका सबसे बड़ा कारण इन मुखबिरों के लिए निर्धारित रकम को पुलिस विभाग द्वारा अन्य मद में खर्च करना है |
और रही बात सी.आर.पी.एफ. और राज्य पुलिस में तालमेल न होने की तो इसमें सौ टका सच्चाई है छ.ग. पुलिस के डी.जी.. ने पिछले दिनों एक पत्रकार वार्ता में कहा था राज्य पुलिस सी.आर.पी.एफ. के जवानों को ऊँगली पकड़ कर चलना थोड़े ही सिखाएगी यह तो जंगलवार है उन्हें इनकी सामना स्वयं ही करना होगा |
इसी से पता चलता है की राज्य पुलिस और सी.आर.पी.एफ. के बिच तालमेल कितना बेहतर है |

गिरीश केशरवानी
संवादाता p7 न्यूज़
रायपुर (छ.ग.)
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image संजीव पाण्डेय छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये संजीव पाण्डेय ने कई अखबारों के लिए काम किया है. हाल-फिलहाल तक अमर उजाला में कार्यरत थे. वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभलेखक.
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