मेट्रो के बहाने रियल एस्टेट का धंधा
दिल्ली मेट्रो की आमदनी का मॉडल सीधा है. वह बची हुई जमीन पर रियलएस्टेट कारोबार कर रही है. लेकिन सवाल है कि जरूरत से ज्यादा जमीन दिल्ली मेट्रो को मिली ही क्यों?
यमुना के किनारे जिस 10 हजार हैक्टेयर जमीन की दुहाई श्रीधरन दे रहे हैं उसकी उपयोगिता उनकी इंजीनियरिंग दिमाग से बड़ी है. श्रीधरन जिसे खाली जमीन कह रहे हैं वह दिल्ली के लिए लाईफ लाईन है. यमुना जिये अभियान के संयोजक मनोज मिश्र बताते हैं कि "अगर इस खाली जमीन पर भी स्थाई निर्माण कर दिया गया तो पूरा शहर एक गैस का चैम्बर हो जाएगा. यह खाली जमीन दिल्ली के लोगों के लिए प्राणवायु तो पैदा करती ही है साथ ही भूजल स्तर को टिकाये रखने में भी मदद करती है." लेकिन फिलहाल कारोबारियों को न यह दिख रहा है कि उनके ऐसा करने से शहर गैस का चैंबर हो जाएगा या फिर भूकंप का एक हल्का झटका भी यहां के स्थाई निर्माणों को सदा के लिए माटी में मिला देगा. साथ में वे लोग भी माटी में दफन हो जाएंगे जिन्हें ऊंचे सपनों के तौर पर यहां फ्लैट बेंचे जा रहे हैं.
कानूनी रूप से "खाली" पड़ी इस जमीन का मालिक कौन है यह तय कर पाना बहुत मुश्किल काम है. क्योंकि अभी भी देश में नदियों के बारे कोई ऐसा समग्र कानून नहीं है जो उनकी रक्षा करता हो. इस लूपहोल का सबसे अधिक फायदा दिल्ली के अवैध झुग्गी व्यापारियों ने उठाया अब उनको दूर फेंककर यह काम डीडीए की मदद से रियलएस्टेट कंपनियां कर रही हैं. क्योंकि इसमें कानूनी अड़चन है इसलिए इस कब्जे को अंजाम देने के लिए पहले एक तटबंध बनाया जाता है. तटबंध कई कारणों से बनता है. कईबार बाढ़ से निपटने के लिए कई बार नयी सड़क बनाने के लिए. अब जहां तटबंध आ जाता है उसके कारण नदी का एक हिस्सा नदी से कटकर शहर में शामिल हो जाता है. यहां से डीडीए और रियल एस्टेट कंपनियों का गोरखधंधा शुरू होता है. खाली जमीन क्योंकि शहर का हिस्सा हो जाती है इसलिए शहरी प्लानिंग के नाम पर उसे किसी रियल एस्टेट डेवलपर को दे दिया जाता है. दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन इस गोरखधंधे में नये खिलाड़ी के रूप में सामने आया है.
योजना बनाते समय तो नहीं लेकिन बाद में दिल्ली मेट्रो ने एक रणनीति बनायी कि वह अपनी आय का 3 प्रतिशत रियल एस्टेट के कारोबार से अर्जित करेगी. इसी रणनीति पर चलते हुए दिल्ली मेट्रो अब तक चार बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर चुका है. शास्त्री पार्क मेट्रो डिपो में 6 हेक्टेयर जमीन पर लार्सन एण्ड टुब्रो के साथ मिलकर साफ्टवेयर पार्क, खैबर पास डिपो में 6.8 हेक्टेयर में 194 करोड़ रूपये की परियोजना लागत से आवासीय परिसर, नजफगढ़ के पास ख्याला और भाई वीर सिंह मार्ग पर 3.82 एकड़ पर एक कामर्शियल काम्प्लेक्स विकसित किया जा रहा है. अकेले खैबरपास आवासीय परिसर के निर्माण के लिए पार्श्वनाथ डेवलपर के साथ दिल्ली मेट्रो ने 194 करोड़ रूपये का करार किया है. इसके अलावा पार्श्वनाथ डेवलपर के साथ मिलकर 150 करोड़ रूपये का अलग करार किया है जो दिल्ली मेट्रो स्टेशनों पर उपलब्ध जगहों पर शापिंग माल बनाने के बारे में है. इस तरह के रियल एस्टेट के काम को अंजाम देने के लिए दिल्ली मेट्रो के केन्द्रीय कार्यालय एनबीसीसी प्लेस में अलग से एक विभाग बना दिया गया है जिसे प्रापर्टी डिवीजन के नाम से जाना जाता है.
अब सवाल यह है कि दिल्ली मेट्रो के पास यह "अतिरिक्त" जमीन आयी कहां से जिसका उपयोग वह रियल एस्टेट के कारोबार के लिए कर रहा है. दिल्ली मेट्रो बनाने के लिए जो जमीन दी गयी है उसका अधिकांश हिस्सा सरकार ने दिया है. सरकार ने जो जमीन दिल्ली मेट्रो को दी है उसमें 155.9 एकड़ जमीन ऐसी है जिसे मेट्रो को देने लिए लैण्ड यूज में भी बदलाव किये गये. ऐसी किल्लतों और दूसरी जरूरतों को पूरा करने में कोताही करते हुए दिल्ली मेट्रो को जो जमीन दी गयी है उसमें वह लगभग 42.59 हेक्टेयर जमीन प्रापर्टी डेवलमेन्ट के रूप में उपयोग कर रहा है. यह कोई खामख्याली आंकड़ा नहीं बल्कि दिल्ली मेट्रो के प्रापर्टी डिवीजन की रिपोर्ट है जो निवेशकों को आकर्षित करने के नीयत से तैयार की गयी है. सवाल यह है कि दिल्ली मेट्रो के पास यह "अतिरिक्त" जमीन आयी कहां से जिसका उपयोग वह रियल एस्टेट के कारोबार के लिए कर रहा है.
दिल्ली में यमुना के किनारे आज जिस खाली जमीन पर दिल्ली मेट्रो और डीडीए अलग-अलग नजर गड़ाए हुए हैं उसके कुछ हिस्सों पर कोई चार साल पहले तक झुग्गियां होती थीं. सरकार ने कहा कि यह नदी का अतिक्रमण है. झुग्गियों में जानवरों की तरह रहनेवाले लोगों से यमुना की पवित्रता को खतरा था इसलिए 5 फरवरी 2004 को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद यमुना के किनारे बसी झुग्गियों को रातों-रात उखाड़ दिया गया. दो महीने में सारी झुग्गियां गायब. कोर्ट ने कहा था कि दो कारणों से झुग्गियों का हटना जरूरी है. पहला, जमीन पर अतिक्रमण और दूसरा इनके कारण होनेवाला यमुना का प्रदूषण. इन दो आधारों पर अगर झुग्गियों को यमुना का अतिक्रमण कहा गया तो शास्त्री पार्क डिपो, यमुना डिपो, अक्षरधाम मंदिर, डीएनडी फ्लाईओवर, दिल्ली सरकार का नया सचिवालय, कामनवेल्थ गेम्स विलेज किस श्रेणी में गिने जाएंगे? जहां तक प्रदूषण का सवाल है तो हजार्डस सेन्टर के 2006 के अध्ययन में कहा गया था कि यमुना में अकेले दिल्ली से हर साल 3600 मिलियन लीटर गंदा पानी जाता है. इसमें उन झुग्गियों का हिस्सा महज 0.8 प्रतिशत होता था. जिस दिन यमुना डिपो काम करना शुरू कर देगा उस दिन से वह 25 मिलियन क्यबिक मीटर सीवेज और 12 मिलियन लीटर कचरा यमुना में प्रवाहित करेगा. सवाल है यमुना की हत्या का असली दोषी कौन है? वे झुग्गीवाले जिन्हें मारपीट कर भगा दिया गया या फिर दिल्ली मेट्रो मनमानी करने की कानूनी वैधता मिली हुई है.
लेकिन दिल्ली मेट्रो के इस भयानक और घिनौने चेहरे को कोई देखना नहीं चाहता. शायद दिल्ली के जनपरिवहन के घोर पतन का ही नतीजा है कि लोग मेट्रो की एसी ट्रेनों की चर्चा तो करते हैं लेकिन इस क्षणिक आराम के लिए अनजाने में ही वे कितनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं इसका अंदाज उन्हें नहीं है.
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