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बालटाल की खाल

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श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दी गयी जमीन वापस मिल गयी है.क्या अब वन विभाग की उन जमीनों को भी वापस लिया जाएगा जो खैरात के भाव में बांटी गयी हैं?

जम्मू में हिन्दू नेता ऐसे अनेकों सवाल खड़े कर रहे हैं।  वे पूछते हैं कि यदि राजौरी में बाबा गुलामशाह इस्लामिक विश्वविद्यालय बनाने के लिए वन विभाग की जमीन दी जा सकती है, गुलमर्ग में रोशनी एक्ट के अंतर्गत ५५० कनाल जमीन कश्मीर के धन्ना सेठों को होटल बनाने के लिए दी जा सकती है, जब मुगलरोड़ के निर्माण के लिए हजारों पेड़ काटे जा सकते हैं और इसके लिए वाइल्ड लाईफ केन्द्रों को तबाह किया जा सकता है और इधर जम्मू के आसपास बठिंडी, सुंजवा और नरवाल इत्यादि स्थानों पर सैंकड़ों कनाल जमीन बड़े-बड़े कश्मीरी नेताओं को कोठियां बनाने के लिए कौढ़ियों के भाव दी जा सकती है तो अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए जमीन देने से इस्लाम को कौन सा खतरा पैदा हो गया है? कश्मीर में सार्वजनिक स्थलों के निर्माण के बहाने कश्मीरी पंडितों की जमीनों पर सरकारी कब्जे किये जा रहे हैं। उनके घरों, बाग-बगीचों और आस्थास्थलों पर आतंकवादी काबिज हो गये हैं। यह सारी गतिविधियां कश्मीरी नेताओं को क्यों दिखाई नहीं देती? लोग पूछते हैं कि जब मंत्रिमण्डल ने वन विभाग के प्रस्ताव को स्वीकार किया था तो उपमुख्यमंत्री और कानून मंत्री अफजल बेग वहां माजूद थे तब उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया?

बात अभी खत्म नहीं हुई है. नतीजों की चेतावनी देते हुये सभी कश्मीरी (मुस्लिम नेता) खतरनाक बयानबाजी कर रहे हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के कथित उदारवादी चेयरमैन मीरवायज उमर फारूख ने कहा है कि श्राईन बोर्ड को जमीन देकर भारत की सरकार कश्मीर में हिन्दू कालौनी बनाकर जनसंख्या अनुपात को बदलना चाहती है। अगर सरकार ने यह फैसला नहीं बदला तो खुली बगावत होगी।  तहरीके हुर्रियत के नेता सईद अली  शाह गिलानी ने बोर्ड को जमीन देने के सरकारी फैसले को इस्लाम विनोधी करार देते हुये आवाम को इसके विरोध में छेड़ी जा रही जंग में कूद पढ़ने का आह्वान किया है। गिलानी ने सभी गैर कश्मीरियों विशेषतः गरीब मजदूरों को घाटी छोड़ने का आदेश पहले ही दे दिया है।

गिलानी ने इन भारतीय मजदूरों का सामाजिक बहिष्कार करने को भी कहा है। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासिन मलिक, डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के शब्बीरशाह इत्यादि अलगाववादी नेताओं ने भी अपने सभी भेदभाव बुलाकर खुली बगावत पर उतरने का ऐलान कर दिया है। इन नेताओं ने अनुसार कश्मीरी मुसलमानों को अल्पसंख्यक बनाने और इस्लाम को नुकसान पहुंचाने की साजिश अमरनाथ श्राईन बोर्ड कर रहा है। माहौल को शांत करने की बजाय यह अलगाववादी नेता जलती आग पर तेल छिड़कने का काम कर हरे हैं। यासिन मलिक ने विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री डा. तोगड़िया और शिव सेना के संरक्षक बाल ठाकरे को कागजी शेर बताते हुये कहा कि यह केवल ख्याली घोड़े दौड़ा सकते हैं। यासिन मलिक ने इस प्रकार हिन्दू नेताओं को चुनौती दी है या कुछ और यह तो वही जाने।

उधर पीडीपी के नेता और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अफजल बेग ने अमरनाथ श्राईन बोर्ड के चेयरमैन और राज्यपाल के मुख्य सचिव डा. अरूण कुमार पर इस्लाम की तौहीन करने, प्रदेश का माहौल बिगाड़ने और कश्मीरियों को बदनाम करने का आरोप लगाते हुये उनपर कोर्ट में केस दर्ज करवा दिया है। इसकी एफ.आई.आर. पीडीपी के महासचिव द्वारा दर्ज करवाई गई है। बेग के मुताबिक डा. अरूण कुमार ने कहा है कि कश्मीरियों को हिन्दू प्रदूषण अखरता है इस्लामी प्रदूषण नहीं। इस प्रकार एक हिन्दू प्रशासनिक अधिकारी पर कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है। कोर्ट ने भी सरकार से इस पर स्पष्टीकरण मांगा है। मुख्यमंत्री गुलाम अली आजाद ने भी एक तीन सदस्य कमेटी बनाकर डा. अरूण कुमार के बयान की जांच के आदेश दिये हैं। उपमुख्यमंत्री अफजल बेग ने तो यहां तक कह दिया है कि आर.एस.एस. के इशारे पर ही राज्यपाल और बोर्ड के अध्यक्ष डा. अरूण कुमार प्रदेश में फिरका परस्ती फैला रहे हैं। बकौल बेग संघ ने दोनों को संसद के चुनावों में टिकट देने का आश्वासन दिया है। हैरानी की बात तो यह है कि डा. अरूण कुमार का बयान तो अफजल बेग को खटक गया परन्तु आतंकी और अलगाववादी नेताओं गिलानी, मलिक, शब्बीरशाह, सलाहुदीन और यहां तक कि मुफ्ती और महबूबा के भारत विरोधी बयान उनको सुनाई नहीं दिये।

भीतरी सच्चाई यह है कि अब इस बात का दबाव बनाया जा रहा है कि किसी मुसलमान को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल और मुसलमान को ही अमरनाथ श्राईन बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर कश्मीरी नेता हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों और यात्राओं पर कब्जा करना चाहते हैं।उल्लेखनीय है कि श्रीअमरनाथ बोर्ड को जमीन सौंपने का फैसला मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री की माजूदगी में मंत्रिमण्डल में लिया गया था। वन विभाग ने जो शर्तें बोर्ड के आगे रखीं उन सबसे बोर्ड सहमत हुआ है। पता नहीं आजाद किस आधार पर यह बोल गये कि श्राईनबोर्ड ने पैसा जमा नहीं कराया है जबकि श्राईन बोर्ड ने जमीन का मूल्य २ करोड़ ३१ लाख ३० हजार ४०० रूपये वन विभाग को दिये हैं। इसी स्थान पर पर्यावरण की वृद्धि के लिए वृक्ष लगाने के लिए अतिरिक्त पैसे भी बोर्ड ने वन विभाग को दिये हैं। यात्रा के बाद बोर्ड को यह जमीन वन विभाग को वापिस करनी होगी। यहां पर कोई स्थाई ढांचा भी नहीं बनाया जा सकता। जमीन का टाईटल भी नहीं बदलेगा। श्राईन बोर्ड इस जमीन को लीज अथवा किराये पर भी नहीं दे सकता। उधर विधानसभा की पर्यावरण समिति के अध्यक्ष डा. मुस्तफा कमाल ने भी स्पष्ट किया है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को अस्थाई रूप से जमीन देने का फैसला कश्मीरी आवाम और किसी धर्म के खिलाफ नहीं है।

इस सबके बावजूद भी कश्मीर के सभी वर्गों और विचारों के नेताओं का सड़कों पर उतरना उनके भारत और हिन्दू विरोधी इरादों का परिचायक नहीं है तो और फिर क्या है? दरअसल अमरनाथ यात्रियों की बढ़ती संख्या, अमरनाथ श्राईन बोर्ड की भारी सफलता और हिन्दुओं के इस आस्था केन्द्र की बढ़ती गरिमा को यह कट्टरपंथी नेता बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। इन नेताओं को अपने वोट बैंक मजबूत करने, कश्मीर में निजामे-मुस्तफा की हुकुमत `इस्लामिक राज्य` स्थापित करने और कश्मीर की पुरानी और हिन्दुओं की संस्कृतिक विरासत के चिन्हों तक को मिटाने की चिंता है। पूरे भारत में हज यात्रियों के लिए बने स्थाई केन्द्रों और कश्मीर में किसी प्रकार के स्थाई इंतजामों से प्रदूषण नहीं फैलता परन्तु अमरनाथ यात्रियों के लिए की जा रही अस्थाई व्यवस्था से प्रदूषण  भी फैलता है और इस्लाम को खतरा भी पैदा होता है।

हैरानी की बात है कि अमरनाथ यात्री तो कश्मीर में प्रदूषण फैलाते हैं परन्तु राजस्थान के अजमेर-शरीफ पर एकत्रित होने वाले दुनिया भर के मुसलमान प्रदूषण नहीं फैलाते। भारत में हजारों स्थानों पर मुमलमान भाई अपनी धार्मिक गतिविधियों को हिन्दुओं के सहयोग और सरकारी मदद से चलाते हैं। क्या कभी किसी हिन्दू नेता ने भी उनपर उंगली उठाई है। कश्मीर के लोग पूरे देश में जमीन जायदाद खरीद सकते हैं, अपनी राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियों को स्वतंत्रतापूर्वक अंजाम दे रहे हैं। फिर कश्मीर में हिन्दुओं की धार्मिक गतिविधियों पर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है? कश्मीर की धरती अलगाववादियों, आतंकवादियों अथवा कश्मीर के राजनीतिक दलों की नीति जायदाद नहीं है। उसपर सारे देशवासियों का हक है। अपने इस हक के लिए यदि समस्त भारतवासी खासतौर पर हिन्दू प्रयास करते हैं तो कश्मीर में एक विशेष समुदाय के नेताओं के पेट में मरोड़ क्यों उठता है?

अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन तो एक बहाना है अन्यथा श्राईन बोर्ड द्वारा यात्रा को पूर्णत: प्रदूषण मुक्त बनाने के सभी आधुनिक, वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाने के बावजूद भी कश्मीरी नेताओं का सड़कों पर उतरकर खुली बगावत करना उनके नापाक इरादों का ही प्रतीक है। भारत के सभी ऐतिहासिक, संस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक चिन्हों को समाप्त करके, कश्मीर को पूर्णत: हिन्दूविहीन करने का षड्यंत्र अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ऐतिहासिक स्थलों, नदियों और शहरों के नाम बदलने, कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं को उनके घरों से भगाने, मुस्लिम धार्मिक आधारों और राजनीतिक नेताओं को कौड़ियों के भाव जमीन देने, हज यात्रियों के लिए हज हाउस बनाने और उन्हें ढेरों सुविधाएं देने, प्रशासनिक और आर्थिक सुविधाओं के ढेर कश्मीर में लगाने के बाद घाटी के इन नेताओं ने अब बाबा अमरनाथ यात्रा को नुकसान पहुंचाने के भारत विरोधी षडयंत्र को कामयाब करने का फैसला कर लिया है।

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संजय बेंगाणी on 02 July, 2008 12:39;08
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सोचना होगा. बाते गम्भीर है.
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suresh chiplunkar on 02 July, 2008 22:16;12
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ये लोग ऐसे सुधरने वाले नहीं हैं… जब तक इन्हें पकड़कर इनके पिछवाड़े पर कोड़े न बरसाये जायें… तमाम कश्मीरी मुसलमान जोंक हैं जो हिन्दुस्तान का खून चूसने में लगे हैं…
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Brijesh on 03 July, 2008 14:25;00
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यह सब हमारे सहनशीलता का नतीजा है, जब तक हम एक वोट बैंक नही बनेगे तब तक यही होगा
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Prateek Abhay on 28 June, 2009 01:41;19
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भाई नरेन्द्र सहगल जी का लेख पडा, कडवे लेख के लिए साधुवाद, हुरिंयत कांफ्रेंस के मीरवायज व तहरीके हुर्रियत के सईद अली साह गिलानी और ना जाने इनके जैसे कितने अलगाववादी नेताओं की फिरका परस्ती का ही परिणाम है कि आज कश्मीर जो भारत का अभिन्न अंग है, शांत नहीं है। कारण खोजने जर जो भयानक सच्चाई सामने आती है वह है इन अलगाववादी नेताओं की संकीर्ण मानसिकता, ये नेता रहते तो भारत में हैं पर गाते पाकिस्तान की हैं। भारत सरकार को रिटायर्ड फौजी अफसरों व जवानों को कश्मीर में मुफ्त आवासीय योजना के तहत मकान उपलब्ध कराने चाहिये। जिससे भारत के लिए नासूर बन चुकी कश्मीर समस्या स्वत: ही समाप्‍त हो जायेगी।
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