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चाचा ठाकरे के करीब आ रहे हैं भतीजे राज

image बाल ठाकरे के साथ राज ठाकरे (फाइल फोटो)

भिवण्डी की इस सीट ने प्रदेश मे एक नए राजनैतिक समीकरण एवं गठबंधन की सम्भावनाओं को जन्म दे दिया है। राज ठाकरे एव बाल ठाकरे दोनो इस बात को समझ गए है कि आपसी लडाई के चलते दोनो कभी भी सत्ता प्राप्त नही कर सकेगे और मनसे और शिवसेना के झगडे में कांग्रेस हमेशा सत्ता की मलाई खाती रहेगी। विश्वस्त सूत्रो की माने तो राज ठाकरे एवं बाल ठाकरे के बीच शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी सेतु का काम कर रहे हैं। इन्ही नेता की सलाह पर राज ठाकरे ने भिवण्डी से अपना उम्मीदवार नही उतारा था।

महाराष्ट्र  के ठाणे जिले की भिवंडी सीट पर हुए विधानसभा के उपचुनाव के परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में कई नए समीकरणो को जन्म दे दिया है। भिवण्डी विधानसभा सीट पर चुनाव समाजवादी के प्रदेश अध्यक्ष अबू असीम आजमी के द्वारा विधानसभा से इस्तीफा देने के कारण हुए थे। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू अासिम आजमी गत विधानसभा चुनाव में मानखुर्द और भिवण्डी दोनो स्थानों से विजयी हुए थे। आजमी ने मानखुर्द सीट अपने पास रखते हुए भिवण्डी सीट से इस्तीफा दे दिया था और अपने पुत्र फरहान आजमी को भिवण्डी से समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाया था। अबू आजमी द्वारा हिंदी में शपथ लेने के कारण और मनसे के विधायक राम कदम द्वारा भरी विधानसभा मे अबू आजमी को पिटने के कारण अबू आजमी चर्चा में आए थे हालाकि उक्त घटना के बाद मनसे के चार विधायको को चार साल के लिए विधानसभा से निलंबित कर दिया था।

भिवण्डी विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल है और यहां पर मुस्लिम उम्मीदवार के जीतने की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है। अपने प्रभाव और मुस्लिम वोटो की अधिकता के कारण अबू असीम आजमी ने अपने बेटे फरहान आजमी को इस क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। काॅग्रेस ने यहा से विधानपरिषद सदस्य मुजफ्फर हुसैन को तथा शिवसेना ने यहा रूपेश म्हाणे को उतारा था।

दरअसल शिवसेना की चिन्ता 2012 मे मुम्बई महानगर पालिका के हाने वाले चुनाव है। पिछले 15 सालो मे महानगर पालिका पर शिवसेना का कब्जा है। शिवसेना इस बात को समझती है कि राज ठाकरे के चलते महानगर पालिका मे उसकी वापसी आसान नही है और दोनो ठाकरे के झगडे में काॅग्रेस और राष्ट्रवादी महानगर पालिका मे भी कब्जा कर लेगी।फरहान आजमी की हार ने समाजवादी पार्टी में अंतिम सासे ले रहे अमर सिंह को जमीन सुंघा दी। दरअसल अमर सिंह और अबू आजमी के सम्बध बहुत गहरे है। अमर सिंह के चलते ही अबू आजमी सालों सपा के महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष से बने हुए है। अमर सिंह के चलते ही फरहान आजमी को उनके अब्बा की रिक्त की हुई सीट पर चुनाव लड़ने का मौका मिला। परंतु फरहान आजमी के नामांकन भरने के बाद जिस तरह अमर मुलायम विवाद सामने आते ही अबू आजमी ने अमर सिंह का साथ देने का इरादा जाहिर किया उसके चलते सपा के नेताओ ने फरहान आजमी के चुनाव प्रचार से दूरी बना ली। दुबई में बैठे अमर सिंह ने इसे अपनी अहं से जोड़ लिया और खुद विदेश से फरहान के प्रचार के लिए तो आए ही साथ में जयाप्रदा, मनोज तिवारी, जया बच्चन, संजय दत्त जैसे ग्लेमर का लबादा ओढे नेताओ को भिवण्डी में गली गली घुमाया।

वही दूसरी तरफ महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने किसी भी स्थिती में इस सीट से अबू आजमी के बेटे फरहान आजमी को न जीतने देने की कसम खा ली थी। राज ठाकरे ने गजब का धर्म का परिचय देते हुए भिवण्डी विधानसभा क्षेत्र से अपना उम्मीदवार उतारा ही नही। राज ठाकरे इस बात को समझते थे कि मनसे के उम्मीदवार उतारने पर शिवसेना का उम्मीदवार तो दौड़ से बाहर हो जाएगा और मुख्य मुकाबला सपा और कांग्रेस के बीच होगा जिसमे सपा के जीतने की संभावनाए ज्यादा रहेगी। राज ठाकरे ने अपने किसी बेहद करीबी से कहा भी कि मै शिवसेना के उम्मीदवार की जीत देख सकता हू लेकिन सपा या काॅग्रेस जीते यह मुझे बर्दाश्त नही होगा। आखीरकार मनसे द्वारा उम्मीदवार न उतारने के कारण शिवसेना के उम्मीदवार रूपेश म्हात्रे ने यह सीट 1676 वाटो से जीत ली। फरहान आजमी को 33,700 वोट मिले जबकि शिवसेना के उम्मीदवार को 35,376 मत प्राप्त हुए। काॅग्रेस के उम्मीदवार मुजफ्फर हुसैन ने पार्टी के सभी दिग्गजो को अपने प्रचार मे झोंक दिया था। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने भी इस सीट पर पूरी ताकत लगा दी थी उसके बाद भी काॅग्रेस के उम्मीदवार को 24,000 मत मिले।

ऐसे में, राज ठाकरे और बाल ठाकरे अब समझ गए है कि आपस मे लड़ने पर दोनो कमजोर होते रहेगे और इसका फायदा उठाकर कांग्रेस सत्ता में बनी रहेगी। वही दूसरी तरफ शिवसेना की सहयोगी पार्टी भाजपा से भी शिवसेना के सम्बधों मे खटास आ गई है। पृथक विदर्भ के मुद्दे पर शिवसेना और भाजपा आमने सामने है वैसे भी गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद शिवसेना ने बेहद थंडा रूख अपनाया है। गडकरी भी सेना से पीछा छुडाकर अपना संगठन महाराष्ट्र में मजबूत करना चाहते है। ऐसी स्थिति में भाजपा और शिवसेना का गठबंधन लंबा चलेगा इसकी संभावना कम है।

शिवसेना और मनसे के बीच सामजस्य बिठाने का जिम्मा इस समय शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी निभा रहे है। मनोहर जोशी दोनो ठाकरे के करीबी है। शिवसेना प्रमुख मनसे का शिवसेना मे विलय चाहते है। वही राज ठाकरे अपने लिए सम्मानजनक समझौता चाहते है। उंट किस करवट पर बैठेगा फिलहाल यह कहना मुश्किल है परंतु आने वाले दिनो में महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण बनेंगे यह बात निश्चित है। 

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सुरेश चिपलूनकर on 30 January, 2010 20:02;56
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"…राज ठाकरे ने अपने किसी बेहद करीबी से कहा भी कि मै शिवसेना के उम्मीदवार की जीत देख सकता हू लेकिन सपा या काॅग्रेस जीते यह मुझे बर्दाश्त नही होगा…" बस यही भावना, यही भावना होना चाहिये…
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Jeet Bhargava on 31 January, 2010 03:46;25
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सबसे अव्वल बात, आपकी सूचना ही गलत है. राज ठाकरे ने शिव सेना के नहीं बल्कि कोंग्रेस के समर्थन में अपना उम्मीदवार हटाया था.
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Sadashiv Joshi on 31 January, 2010 03:54;06
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दर असल देखा जाए तो राज ठाकरे को जान बुझकर भड़काया जाता है. आप विगत के घटनाक्रम पर गहराई से गौर करेंगे तो पाएंगे कि राज ठाकरे को मुद्दे थमाए जाते हैं. कभी यह काम अबू आजमी करते हैं तो कभी संजय निरुपम, कृपाशंकर और कभी मुख्यमंत्री चव्हान (हालिया टैक्सी विवाद) और कभी मीडिया (सचिन विवाद). यह सब जानबूझकर किया जाता है ताकि राज ठाकरे भड़के और महाराष्ट्र में हिन्दू वोट बाँट जाए और अंतत: कोंग्रेस सत्ता में बनी रहे. इसमे हमारे जैसे पर-प्रांतीय पीटते भी रहे तो कोंग्रेस को क्या फर्क पड़ता है?? राज ठाकरे के डर से पर-प्रांतीयो के वोट तो कोंग्रेस को ही मिलने है!!
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Pinakin Raje on 01 February, 2010 02:55;44
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दाऊद के गुर्गे और को हराने के लिए देशहित में चचा-भतीजा एक हो जाए तो अच्छी बात ही है.
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image समीर चौगांवकर समीर चौंगावकर लेखक, पत्रकार और स्वतंत्र राजीनीतिक विश्लेषक हैं. नागपुर में रहते हैं और महाराष्ट्र तथा संघ भाजपा की राजनीति को नजदीक से देखते और उसकी समीक्षा करते हैं. विस्फोट.कॉम के विश्लेषक।
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