जद (यू) पर संकट के पीछे कांग्रेस का मजबूत हाथ
कांग्रेस की कृपा से आखिरकार जनता दल युनाइटेड संकट में आ ही गया. इस्तीफे की धमकियों के बीच चार महीने पहले दोबारा जनता दल युनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष चुने गये राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इस्तीफे का यह तोहफा राहुल गांधी के बिहार दौरे के दिन दिया गया.
राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह नीतीश कुमार के सबसे करीबी नेता हैं और दोनों के संबंधों के बारे में पार्टी के अंदर पहले भी विरोध के स्वर उभरते रहे हैं लेकिन नीतिश कुमार के आगे किसी की नहीं चली और ललन सिंह पार्टी में ताकतवर नेता बने रहे. दोनों के संबंध कितने प्रगाढ़ थे कि राबड़ी देवी ने लोकसभा चुनाव के दौरान खुलेआम आरोप लगा दिया था कि ललन सिंह नीतिश का साला है. इसलिए ललन सिंह द्वारा इस्तीफा दिया जाना प्रदेश में जद (यू) के लिए संकट का बड़ा कारण है. हालांकि ललन सिंह ने अभी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है और पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने कहा है कि वे पार्टी में केन्द्रीय नेतृत्व के साथ काम करेंगे.
जबकि जद (यू) के अंदर हालात इतने सामान्य नहीं है. पिछले हफ्ते कांग्रेस के एक आला नेता जगदीश टाइटलर (जो बिहार के प्रभारी भी हैं) ने ललन सिंह से दिल्ली में मुलाकात की थी. उस मुलाकात के वक्त लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव भी मौजूद थे. जगदीश टाइटलर की ललन सिंह से गुपचुप मुलाकात के पीछे राज्य में कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद है. जगदीश टाइटलर अपने आप को साबित करना चाहते हैं इसलिए बिहार चुनाव को लेकर वे पूरी मेहनत कर रहे हैं. हाल में ही उन्होंने मुंबई का भी दौरा किया था और वहां बिहार के प्रवासी उद्योगपतियों और सामाजिक कर्मियों से मेल मुलाकात की थी. कांग्रेस ने फैसला किया है कि वह बिहार में अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी ऐसे लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों के विश्वस्त लोगों पर डोरे डाल रही है. साधु यादव पहले ही कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं. अब ललन सिंह भी कांग्रेस के खेमे में जाने के लिए तैयार हैं. इसके साथ ही जद यू के प्रभुनाथ सिंह भी नाराज हो गये हैं. खबर है कि प्रभुनाथ सिंह भी विरोध कर रहे हैं और पार्टी से बाहर जाने की धमकी दे रहे हैं.
इसके साथ ही पिछले साल अक्टूबर में पार्टी विरोधी गतिविधियों में बाहर किये गये तीन सांसदों में से एक जहानाबाद से सांसद जगदीश शर्मा भी हैं. इन सभी नेताओं का नीतीश कुमार पर आरोप है कि वे तानाशाह की तरह काम करते हैं. और नेताओं के अलावा अब ललन सिंह का भी यही आरोप है. जाहिर है, चुनावी साल में प्रदेश को अच्छे काम का आधार देनेवाले नीतीश कुमार के लिए हालात फिलहाल पार्टी के स्तर पर तो बिल्कुल ही अच्छे नहीं होनेवाले हैं.
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राजनीति के दल-दल में दल रपट गये हैं सारे.
रपट गये हैं सारे, कौन दूध का धोया?
किसको कहें खराब,सराहें किसको गोया!
कह साधक इस रेलमपेल में ध्यान हो किसका?
सब पैसे के दास, यहाँ पर कौन है किसका?
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