राजनीतिक आग में जलते सवालों को फिर केन्द्र में लाने की कवायद
आठ फरवरी की सुबह दिल्ली की सड़कों पर जाटों के कदम पड़ेंगे। कल की दिल्ली का नजारा कुछ इस तरह देख सकते हैं कि बसों, ट्रैक्टर, बुग्गियों और कारों-जीपों के काफिले में आने वाले जाट अपनी मांग के लिए किस सड़क पर होंगे। अपनी जरूरतों और जद्दोजहद में उलझी दिल्ली को शायद यह बात रास न आए कि उसकी चाल को यह जाट थोड़ा बदल दें? लेकिन यह कल होने वाला है।
हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश के अलावा आंध्रप्रदेश, गुजरात और बिहार से आने वाले यह जाट दिल्ली की चाल को कल के लिए तो थाम ही देंगे। इस रैली की खास बात यह है कि किसी राजनीतिक दल का इसमें कोई योगदान नहीं है। यानी जाट अब राजनीतिक नाव को छोड़कर अपने पैरों पर भरोसा कर रहे हैं। बीते साल मेरठ में आठ फरवरी को हुई रैली से इस मायने में यह भिन्न है। तब विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने आरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक को जाटों को आरक्षण दिलाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी। सवाल उठता है कि एक साल में इन पार्टियों ने इस मुद्दे पर क्या किया? क्या वे दूसरी राह पर चल निकलीं? या फिर उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं?
इस जाट महारैली के बहाने आरक्षण की राजनीति और उसके संदर्भों पर एक बार फिर बात करना जरूरी हो जाता है। क्योंकि जाटों के आरक्षण का मसला न तो गुर्जर आरक्षण की तरह एकांगी है और न ही अन्य पिछड़ी जातियों की तरह आर्थिक-सामाजिक दंभ का लिजलिजा रूप। यह कुछ मूल सवालों को केन्द्र में रखने वाला मसला है, जिससे सभी राजनीतिक दल आंख चुराते हैं। असल में बीते दो दशक की भारतीय राजनीति के मुद्दों पर गौर करें, तो सांप्रदायिकता के अलावा आरक्षण का मुद्दा सबसे राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे ज्यादा मुफीद रहा है। इन मुद्दों पर ठोस कार्यनीति न बनाकर पार्टियों इन्हें हर समय ज़िन्दा रखना चाहती हैं, ताकि समय-समय पर इन मुद्दों का लाभ उठाया जा सके।
अमूमन जाटों के बारे में जो छवि बनती है, वह खाते-पीते और आर्थिक रूप से संपन्न किसान की छवि है। लेकिन देखना होगा कि क्या सचमुच यह इतनी ही एकतरफा छवि है। अगर ऐसा है, तो जाट बाहुल्य इलाकों में संपन्नता और तरक्की का घटाटोप क्यों दिखायी नहीं देता। असल में जिस तरह से हरित क्रान्ति के नतीजों को आसमान दिखाया गया, उसमें यह भुला दिया गया कि बीते बीस सालों में उन खेतों के हालात खराब हुए हैं जिनसे जाट या अन्य किसी भी किसान की तरक्की का रास्ता गुजरता हैं। केन्द्र हो राज्य सभी सरकारें कुछ विशिष्ट सामाजिक छवियों को भुनाती रही हैं और जाट की संपन्नता, जो सिर्फ उदाहरण है, की छवि भी उसी का नतीजा है, जिसके नीचे जाट ही नहीं तमाम वंचित जातियों की बदहाली छुपाई जाती है। इसे हम यूं भी देख सकते हैं कि मेरठ का कोई युवा अगर भारतीय क्रिकेट टीम में पहुंच जाता है, तो क्या सारे मेरठ के युवाओं के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के रास्ते खुल जाते हैं। नहीं। यह मुमकिन भी नहीं है। ज्यादातर लोगों के लिए उनके जीवन की जरूरी दिक्कतों से हर रोज लड़ना पड़ता है और ऐसे में किसी भी सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह लोगों की तरक्की के लिए अवसर दे।
किसान रैलियों में हम देख चुके हैं कि दूर दराज से आने वाले ज्यादातर किसानों के पास न तो पहनने को कपड़े हैं और न ही खेतों को उन्नत करने की तकनीक। हरित क्रान्ति के क्षेत्र में भी महज 20 फीसदी किसान ही उस तरक्की को छू पाए जो सरकारी आंकड़ों में इस इलाके की बेहतर छवि बनाती है।
आरक्षण की आग पर तप रही राजनीतिक रोटियों में कई वर्गों का ईंधन लगा हुआ है। दलित तो पहले ही इस आग में झोंके गये हैं, लेकिन अब महिला राजनीति का ईंधन भी इसे जलाये हुए है। दिलचस्प बात यह है कि सब कुछ खोने के बाद भी इन वर्गों को आरक्षण के नाम पर बरगलाया ही जाता रहा है। यानि सरकारें इस मुद्दे को ज़िन्दा तो रखना चाहती हैं, लेकिन वे वंचित और पिछड़े समूहों को उनका हक नहीं देना चाहतीं। धार्मिक राजनीति में भी तकरीबन यही विरोधाभास है। जाहिर है यह जमीनी राजनीति के वे गुर हैं, जो मुख्यधारा की राजनीति ने बीते दो दशकों में हासिल किए हैं।
आरक्षण के सवाल को संपन्नता से जोड़कर भटकाने की कोशिश की जाती रही है, जबकि संपन्नता गांवों से लेकर कस्बों और शहरों तक महज 20 फीसदी लोगों के हिस्से का मुद्दा है। असली लड़ाई तो आज भी ज़िन्दा रहने और सम्मानजनक जीवन के लिए हैं। जाटों में शिक्षा का अभाव कोई नई बात नहीं है। गैरजरूरी विकास ने विभिन्न तबकों पर पैसे बरसाए और शिक्षा के अभाव में ये भोली-भाली जनता अंधी दौड़ में शामिल हो गई। पश्चिमी यूपी से लेकर हरियाणा और राजस्थान तक के जाट बेल्ट में राजनीतिक लुंपेनों ने अपना काम बखूवी किया और तरक्की की एक ऐसी राह दिखायी जिस पर अन्त में गरीबी और बदहाली के अलावा अपराध का साम्राज्य बिछ जाने वाला है।
आरक्षण के मसले को भटकाने वाली राजनीति को महिला आरक्षण के उदाहरण से समझा जा सकता है। सरकार और राजनीतिक दल महिला आरक्षण का शिगूफा जब-तब छोड़ते रहे हैं। उसी कड़ी का विस्तार हाल ही में जयन्ती नटराजन कमेटी की सिफारिश भी है कि महिला आरक्षण विधेयक अपने मूल स्वरूप में लागू किया जाए। इससे पहले राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने 4 जून 2009 को 15वीं लोकसभा के पहले सत्र में इसे 100 दिन में लागू करने की बात कही थी। कांग्रेस और बीजेपी सहित अधिकांश दल इस मुद्दे पर एकमत दिखते हैं कि महिला आरक्षण होना ही चाहिए जबकि सपा सहित कुछ छोटे दल कुछ विशेष कारणों से इस विधेयक को मूलरूप में पारित करने के विरोधी हैं। देखना चाहिए कि जब राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्ष और विपक्ष की नेता महिला हो। इसके अलावा रेल मन्त्रालय से लेकर सबसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री भी महिला ही हो, तब राजनीतिक पटल पर ऐसी कौन सी नौटंकी खेली जा रही है कि महिलाओं को उनका हक नहीं दिया जा रहा है।
फिर लौटते हैं जाट आरक्षण के मसले पर। राजनीतिक दलों को शायद 8 तारीख के बाद यह अहसास हो जाएगा कि जाट मूर्ख नहीं हैं, जो हर वक्त नेताओं के बहकावे में आ जाएं। जाट अपने उत्थान के लिए खुद सक्षम होगा तभी उसकी तरक्की की राह निकलेगी। यह बात अन्य वंचित समूहों पर भी इसी सन्दर्भ में लागू होती है।
आठ फरवरी की जाट रैली के सन्दर्भ में हम देख सकते हैं कि अब गांव से लोग दिल्ली की सड़कों पर अपना हक लेने पहुंच रहे हैं। वे यहां बसने के लिए नहीं, बल्कि फिर अपनी जद्दोजहद भरी मुश्किल जिन्दगी में लौट जाएंगे, लेकिन यह सवाल जरूर छोड़ जाएंगे कि आखिर दिल्ली की खुशहाली में जिस वर्ग का योगदान है, उसे क्यों भुला दिया जाता है।
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- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
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