गुजरात में गहरी है छुआछूत की जड़ें
बतौर एक गणराज्य भारत अपने 60 साल पूरा कर चुका है, मगर गुजरात के गांवों में लोकतंत्र की जड़ों के मुकाबले छूआछूत की जड़ों का जाल कितना घना तना है- इसका खुलासा अहमदाबाद स्थित गैर सरकारी संस्था नवसर्जन और यूएस स्थित रोबर्ट एफ केनेडी सेंटर फार जस्टिस एण्ड ह्यूमन राईटस द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण से होता है।
यह 32 पेजों वाली ऐसी सर्वेक्षण रिपोर्ट है जिसमें बीते 3 सालों से गुजरात के 1500 से भी ज्यादा गांवों के विभिन्न आकड़ों और तथ्यों को इकट्ठा किया गया है। सर्वेक्षण रिपोर्ट की एक खासियत यह है कि इसमें 100 से भी ज्यादा उन प्रथाओं को सूचीबद्ध किया गया है जो राज्य भर में दलितों के खिलाफ संचालित हैं। मामला चाहे मंदिरों में प्रवेश करके पूजा-अर्चना का हो या फिर चाय की दुकानों में चाय पीने का- यह रिपोर्ट कई अहम बातों को प्रकट करती है।
जैसा कि रिपोर्ट कहती है कि गुजरात के गांवों में धार्मिक आधार पर 97 प्रतिशत से भी ज्यादा भेदभाव बरता जाता है। दलितों के साथ बरती जाने वाली भेदभाव की ऐसी प्रथाओं से राज्य का सरकारी तंत्र भी अछूता नहीं है। इस आधार पर रिपोर्ट कहती है कि राज्य की सरकारी सेवाओं जैसे स्कूल, अस्पताल या बसों में दलितों के साथ 50 प्रतिशत से भी ज्यादा भेदभाव बरता जाता है। यह रिपार्ट छूआछूत के एक अलग रुप को भी उजागर करते हुए कहती है कि यहां दलितों के भीतर की विभिन्न उप-जातियों में भी भेदभाव विद्यमान है। इस सर्वेक्षण रिपोर्ट को लेकर अब सभी सरकारी एंजेसियों से चर्चा करने की योजना है।
अगस्त 2009 को नवसर्जन ने यह खुलासा भी किया था कि गुजरात में मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा अभी भी बदसूरत जारी है। तब कई दलित बच्चों ने सार्वजनिक तौर पर यह कहा था कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों द्वारा उनसे शौचालय धुलवाने का काम करवाया जाता है। इस तरह से उनके साथ पढ़ाई में भी भेदभाव किया जाता है। तब ऐसी स्थितियों के खिलाफ नवसर्जन ने राज्यभर से करीब 1500 बच्चों को लेकर अहमदाबाद में एक रैली निकाली थी। नवसर्जन के संस्थापक मार्टिन मेकवान कहते हैं कि ‘‘यहां के गांवों से निकले तथ्य, आकड़ों और घटनाओं से जो चित्र उभरा है वो राज्य व्यवस्था की नाकामी दर्शाता है। वो न्यायपालिका और नौकरशाही की असफलता भी दर्शाता है। इन स्थितियों का असर सरकार की उन विकास योजनाओं पर भी पड़ता है जिनसे समाज का एक बहुत बड़ा तबका छूटा हुआ है।’’
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मुझे लगता है बीते 10 सालों में गुजरात से पलायन करने वाले मुस्लिम और दलित परिवारों के पलायन को लेकर शोध और अध्ययन करवाया जाये. सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.
सामाजिक कल्याण की बहुत सी योजनाएं से तो राज्य ने अपने हाथ खीच ही लिए हैं, मगर सेंटर की जो परियोजनाएं हैं भी तो उनका सही तरीके से पालन नहीं हो पा रहा है.ऐसा हर योजना से जुड़े तथ्यों और आकड़ों से जाहिर होता है. चाहे तो चेक कर लें.नहीं तो हम बताते हैं....
भारत के अन्य राज्यों की ही तरह गुजरात में भी 2 फरवरी 2006 से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून लागू हुआ और पांच माह की अवधि में ही वहां विकास के रंगीन पर्दे के पीछे छिपी गरीब मजदूरों के शोषण की कहानी सामने आने लगी। यहां व्यापक रूप से मजदूरों को रोजगार गारण्टी कानून और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के उल्लंघन के कारण शोषण का सामना करना पड़ा। साबरकांठा जिले के बलिसाना गांव में 700 मजदूरों ने 14 फरवरी से 18 दिन तक हाड़तोड़ मजदूरी की। राज्य में रोजगार गारण्टी कानून के अन्तगत काम करने वाले मजदूरों को यह आश्वासन दिया गया था कि उन्हें 35 रूपये रोज मजदूरी मिलेगी किन्तु जब मई के अंतिम सप्ताह में अलग-अलग कार्य स्थलों पर भुगतान किये गये तब मजदूर अचंभित रह गये क्योंकि उन्हें केवल चार से सात रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी जा रही थी। इतना ही नहीं व्यापक स्तर पर रोजगार कानून के सबसे अहम् प्रावधानों (जैसे सात से पन्द्रह दिन के भीतर अनिवार्य रूप से मजदूरी का भुगतान, महिलाओं को समान मजदूरी, बच्चों के लिये झूलाघर और मजदूरों के काम की सही माप करना) का हर कदम पर उल्लंघन किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये कानून का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि मजदूरों को दी जाने वाली न्यूनतम मजदूरी 60 रूपये प्रतिदिन से कम नहीं होगी परन्तु राज्य सरकार ने यहां भी तुगलकी रवैया अख्तियार किया और मजदूरों के कानूनी हक छीने। ऐसे में पहले मजदूरों ने कानून और राजय की योजना के प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत स्तर अपने हकों की मांग की परन्तु जल्दी ही वे समझ गये कि संगठित हुये बिना उन्हें अधिकार नहीं मिल पायेंगे। तब इन जिलों में मजदूरों ने आपस में चर्चा करना शुरू की। अंतत: गोधरा में लगभग साढ़े पांच हजार मजदूर इकट्ठा हुये और यहां राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना मजदूर यूनियन का निर्माण हुआ।
मूलत: रोजगार गारण्टी कानून के सार्थक क्रियान्वयन के लिये ईमानदार राजनैतिक प्रतिबध्दता होना एक जरूरी शर्त है। यह शर्त समाज में बेरोजगारी की परिस्थितियों में बदलाव लाने में क्या भूमिका निभा सकती है इसे मध्यपदेश और गुजरात का तुलनात्म्क विश्लेषण करके महसूस किया जा सकता है। मध्यप्रदेश की ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में 18 जिलों के 43 लाख परिवार शामिल हैं और इन सभी परिवारों का पंजीयन भी हो चुका है और रोजगार कार्ड भी जारी किये जा चुके हैं। यहां प्रयास कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं प्रदेश में 18 लाख से ज्यादा मजदूरों को 61.37 रूपये की दर पर मजदूरी तो मिल ही रही है साथ ही 20 हजार से ज्यादा सड़कों, तालाबों और अन्य सामुदायिक संरचनाओं का काम पूरा हो चुका है। राज्य में पलायन में 40 प्रतिशत की कमी आई है और खुले बाजार में होने वाला शोषण भी कम हुआ है। परन्तु वहीं दूसरी ओर गुजरात में रोजगार योजना के छह जिलों में बसे लगभग 70 लाख परिवारों में से केवल सवा सात लाख परिवारों का ही पंजीयन हो पाया है और इनमें से भी कुछ को ही रोजगार कार्ड जारी किये गये हैं। राज्य में अब तक योजना के सम्बन्ध में पुख्ता दिषा निर्देश जारी नहीं हुये हैं न ही सम्बन्धित अधिकारियों- जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम हुये हैं।
1)नवसजृन ट्रस्ट, दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला राज्य का सबसे बडे संगठन है, ने गुजरात के 5462 गांवों में दलितों के साथ साम्प्रदायिक, जातिगत, धार्मिक जीवन, खानपान और अस्पृश्यता पर आधारित बिन्दु शामिल किये गये हैं।
2) नवसजृन ट्रस्ट के 106 कार्यकर्ताओं ने इसे तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों के आवासीय स्थलों, पेयजल कुओं, उपासना स्थलों का पृथक्करण और स्कूलों में बैठने की अलग व्यवस्था पूरे गुजरात के गांवों में लगभग समान रूप से देखी जा सकती है।
बहुत सही लिखा है. गुजरात में ऐसा ही है. वैसे यह एक संस्था का अध्ययन है. इस से सम्बन्ध नहीं मगर बताया जा रहा है कुछ संस्थाएं गुजरात में नकस्लवादियों को मदद पहुँचाने के काम में भी लगी हुई है. स6स्थाएं है अच्छे-बूरे हर तरह के काम करती है. इसने सही काम किया है.
शेष भारत से छूआछूत खत्म हो गई जानकर प्रसंनता हो रही है. चलो 60 साल लगे मगर गुजरात को छोड़ सब जगह अब सही है.
गुजरात, मेहसाणा जिले में दलितों को अपमानित करने वाली एक किताब स्कूलों में बांटी गई थी-‘वार्ता से विचार प्रोजेक्ट’ के तहत. पेज नंबर 289 पर छपी एक कहानी में एक-दो बार नहीं, पूरे आठ बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो यहां लिख भी नहीं सकते. जब इस पर लोगों ने आपत्ति प्रकट की तो किताब वापस लेने के बजाय शिक्षा विभाग ने चंद पन्ने फाड़कर उन्हीं किताबों को बच्चों तक वापस पहुंचा दिया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
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