कर्मापा अब नहीं करते चीन का स्यापा
नागपुर। चीन में धीरे-धीरे बढऩे वाली आर्थिक उदारीकरण का सबसे बड़ा लाभ यह हो रहा है कि वहां के लोग दूसरे देशों के लोगों के संपर्क में आ रहे हैं। इससे उनमें प्रजातंात्रिक मूल्यों के प्रति आस्था बढ़ रही है। धीरे-धीरे मनवाधिकार की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। यह कहना है कि तिब्बत धर्म गुरु 17वें कर्माप्पा लामा ग्यालवांग का।
कर्मापा कर्मा काग्यू सेक्ट के तीन कर्मापा में से एक हैं. कर्मापा इन दिनों भारत में तिब्बत से निष्कासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं. कर्मापा द्वारा चीन के बारे इस तरह सकारात्मक बयान देने से दलाई लामा के तिब्बत मुक्ति अभियान को धक्का लग सकता है. तीन कर्मापा में बाकी दो पर चीन समर्थक होने का आरोप हैं. ऐसे में अगर भारत में निर्वासन में रह रहे 17 वें कर्मापा चीन का गुणगान करते हैं तो निश्चित रूप से भारतीय एजंसियों के लिए भी यह खतरे की घण्टी है. जब सत्रहवें कर्मापा भारत आये थे तब भी उनके भारत आने पर सवाल उठाये गये थे और कहा गया था कि वे तिब्बत में चीन की नीतियों के समर्थक हैं. अब प्रत्यक्ष तौर पर अगर कर्मापा चीन को प्रजातांत्रिक होने का गुणगान कर रहे हैं तो जाहिर है तिब्बत के दूसरे सबसे बड़े बौद्ध संप्रदाय कर्मा काग्यू को चीन ने पूरी तरह से प्रभावित कर लिया है जो दलाई लामा के लिए अच्छी खबर नहीं होगी.
कर्मापा नागपुर के तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा कर रहे थे। वे तिब्बती भाषा में बातचीत कर रहे थे। उनके साथ दुभाषिये की जिम्मेदारी रौशनलाल निभा रहे थे। कर्माप्पा ने कहा कि चीन में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के कारण ही वहां धीरे-धीरे प्रजातांत्रिक माहौल तैयार हो रहा है। एक सवाल का जवाब देते हुए कर्माप्पा ने कहा कि भले ही दुनिया के सभी बैद्ध देश तिब्बत की स्वतंत्रता चाहते हों, लेकिन इसके लिए वे चीन पर दवाब नहीं बना सकते हैं। आज चीन दुनिया में तेजी से उभरता हुआ मजबूत देश है। हर देश इसके साथ साकारात्मक संबंध बना कर रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत होगा कि बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा और मेरे कारण भारत और चीन के आपसी संबंधों पर गलत असर पड़ा है। भारत और तिब्बत का संबंध गुरु और शिष्य की तरह है। गंगा, सतलुज मानसरोवर तिब्बत से जुड़ी हैं। यह भारतीय अस्था के प्रतीक है। करीब 7वीं, 8वीं शताब्दी में तिब्बत में बौद्ध धर्म का महायान सिद्धांत गया। तब तिब्बत के तत्कालीन राजाओं ने इन सिद्धांतों को तिब्बती भाषा में अनुवाद कराया। यह करीब 100 बंडल की सामग्री होगी। तिब्बत में अलग-अलग बौद्ध गुरु आए, जिससे सिद्धांतों में अंतर आया। बौद्ध धर्म के सभी धाराओं का मूल दर्शन, भावना और चिंतन एक ही है। कर्माप्पा ने कहा कि वे भारत में अध्ययन और बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए आए हैं। भारत के प्रति पूरी आस्था और श्रद्धा है। इसलिए मेरे भारतीय प्रवास को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहिए।
असली सुख मन से धार्मिक होने में
ईसाई मिशनरियों द्वारा विदर्भ में नवबौद्धों के धर्मांतरण के मुद्दे पर कर्माप्पा ने कहा कि मैं जन्म और प्रकृति से बौद्ध हूं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही बौद्ध परंपरा से जुड़ा हूं। यदि इसी तरह से जुड़ा व्यक्ति धर्मातरण करता है, तो वह पुश्तैनी धर्म से अलग हो जाता है। उसे नये धर्म में सहज कष्टाकारण होगा। भगवान बुद्ध ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति के लिए धर्म उसकी रुचि और आस्था के अनुरूप होना चाहिए। व्यक्ति किसी भी धर्म को अपनाने के लिए स्वतंत्र है। इसलिए धर्मांतरित होने के इच्छुक लोगों को देखना चाहिए कि कौन-सा धर्म उनके अनुरूप है। असली सुख मन से धार्मिक होने में है। मन से धार्मिक हर व्यक्ति समाज और राष्ट्र की सेवा करता है।
अहिंसा का प्रचार कर रहे हैं दलाई लामा
कर्मापा सीधे तौर पर दलाई लामा की अमेरिका यात्रा पर टिप्पणी करने से बचे. चीन के विरोध के बाद भी दलाई लामा के अमेरिका यात्रा पर कर्मापा ने कहा कि अमेरिका के लोग भी शांति चाहते हैं। इसी संदर्भ में धर्मगुरु दलाई लामा अमेरिका गए। तिब्बत ओर अमेरिका का संबंध तिब्बत के गुलामी से पहले का है। कर्मापा ने दलाई लामा की यात्रा को तिब्बत की आजादी से न जोड़ते हुए उसे अहिंसा की यात्रा बताया. उन्होंने कहा कि "दलाई लामा के अमेरिकी यात्रा पर मैं क्या कहूं? मेरी निजी राय यह है कि वे दुनिया भर में अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।"
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तिब्बत से जैसी खबरे छन-छन कर आती है, उसे पढ़ और सुन कर लगता है कि वहां के माहौल पर पूरी तरह से चीन का नियंत्रण है। दलाई लामा के बाद शायद सभी कर्मापा आपस में लड़ जाएं और चीन लाभ मिल जाए।
वैसे भी चीन में जब लोकतांत्रिक मूल्यों का उदय हो रहा है तो इसमें बुराई क्या है। यह एक सकारात्मक बात है और सकारात्मक बात के लिए कर्मापा पर संदेह फिलहाल जायज नहीं लगता है।
कर्मापाओं पर संदेह से पहले केंद्र सरकार को तिब्बत पर अपनी नीति स्पष्ट करना चाहिए। कभी तिब्बत के पक्ष में तो कभी चीन के पक्ष में बोलने की दोहरी नीति ठीक नहीं।
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