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कानून के कटघरे में मोदी, आगे क्या होगा?

image जाकिया जाफरी के एफआईआर पर जारी हुआ है मोदी को समन

विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा नरेन्द्र मोदी को सम्मन जारी किये जाने के बाद अहमदाबाद में भाजपा के अंदर ही राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं. 21 मार्च को जब नरेन्द्र मोदी कानून के कटघरे में खड़े होंगे तो उनसे क्या सवाल पूछा जाएगा, इसे लेकर राजनीतिक दलों में अपने अपने स्तर पर अपनी अपनी चर्चाएं हैं. लेकिन एसआईटी में जिस तरह से मोदी विरोधियों ने मोदी के खिलाफ बयान दर्ज करवाया है उससे मोदी की मुश्किलें और बढ़ गयी हैं.

2002 में गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्गा सोसायटी में चरपमंथियों ने 69 लोगों की हत्या कर दी थी. मरनेवालों में कांग्रेस के सांसद एहसान जाफरी भी शामिल थे. एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने ही एफआईआर दर्ज करवाया था जिस पर संज्ञान लेते हुए विशेष जांच दल ने नरेन्द्र मोदी को सम्मन जारी किया है. विस्फोट से बात करते हुए जाकिया जाफरी ने कहा है कि "जब दंगाईयों ने गुलबर्ग सोसायटी पर हमला किया तो मेरे पति ने पुलिस कमिश्नर से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक सब जगह फोन किया लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया और न ही समय रहते कोई कार्रवाई की गयी." घटना के चार साल बाद जाकिया और उनके बेटे तनवीर जाफरी ने इस उम्मीद में एफआईआर दाखिल किया कि उन्हें न्याय मिलेगा.

अब सवाल यह है कि क्या एसआईटी के सम्मन से खुद नरेन्द्र मोदी को कोई फर्क पड़ता है? अहमदाबाद में सरकार से जुड़े सूत्र कहते हैं कि हर प्रकार की कानूनी पड़ताल के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस घटनाक्रम से नरेन्द्र मोदी और मजबूत होकर उभरेंगे. भले ही एसआईटी के सम्मन पर मीडिया में हाईप दिया गया हो लेकिन हकीकत यह है कि कानूनी रूप से मुख्यमंत्री के ऊपर सीधे कोई आरोप निर्धारित नहीं होता है. इन लोगों का तर्क है कि जाफरी और उनकी ओर से जो गवाह एसआईटी के सामने आये हैं उन्होंने माना है कि उन्होंने दिल्ली भी फोन किया था. तो क्या दिल्ली सरकार को भी दोषी मान लिया जाएगा? इन कानूनविदों का कहना है कि कोई भी राजनीतिक हेड ऐसे दंगाग्रस्त परिस्थिति का दोषी नहीं ठहाराय जा सकता. ऐसी परिस्थिति में स्थानीय पुलिस और शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारी तो निर्धारित होती है लेकिन किसी राज्य के मुखिया को सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है. हालांकि जनसंघर्ष मोर्चा के वरिष्ठ वकील मुकुंद सिन्हा इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं. वे कहते हैं कि अगर एसआईटी गुलबर्ग सोसायटी से जुड़े सवाल मुख्यमंत्री से पूछती है तो उनके सामने मुश्किल तो पैदा होगी. ज्ञात हो कि कुछ दिन पहले एक गवाह ने एसआईटी से कहा था कि मोदी का नार्को टेस्ट करवाया जाना चाहिए.

कानूनविदों की इस राय से भले ही मोदी निश्चिंत हो जाएं लेकिन उनके अपने ही विरोधी अपरोक्ष रूप से राज्य के प्रमुख को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. पूर्व मंत्री सुरेश मेहता और गोवर्धन झड़पिया ने अपनी गवाही में कहा है कि जिस वक्त दंगे हुए थे उस वक्त गृहमंत्रालय का प्रभार भी नरेन्द्र मोदी के ही पास था. मोदी के लिए परेशानी का एक कारण यह भी है कि उस वक्त जो मोदी के करीबी विधायक थे वे आज विरोधी हैं इसलिए एसाईटी के सामने वे खुलकर को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं. अब राज्य के प्रमुख और राजनीतिक व्यक्तित्व होने के नाते हो सकता है प्रत्यक्ष तौर पर उनकी जिम्मेदारी न ठहराई जाए लेकिन पार्टी के अंदर ही मोदी विरोधी उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे. जहां एक ओर मोदी विरोधी मुखर हैं वहीं आश्चर्यजनक रूप से राज्य कांग्रेस इस पूरे मामले में पूरी तरह से मौन धारण किये हुए है. बहरहाल मोदी के एसआईटी के सामने जाने से एसआईटी की जांच का एक अहम पड़ाव जरूर पूरा हो जाएगा लेकिन जिन 62 लोगों की दंगों में जांच होनी है उसमें से अभी आठ या दस लोगों के भूमिका की ही जांच हो सकी है. अगर इसी गति से जांच होती रही तो दोषियों तक पहुंच पाना बहुत लंबा और थकाऊ प्रक्रिया होगी जो राज्य के लोगों को न्याय न मिल पाने के लिए निराश जरूर करेगी.

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Jeet Bhargava on 14 March, 2010 00:13;52
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इस देश में जब तक अपने पक्ष में इन्साफ नहीं हो, तब तक सारी सेकुलर जमात बवाल करती है. मीडिया. मानवाधिकार आदि प्रपंचो के सहारे अब न्यायपालिका को भी अपने हक़ में प्रभावित करने की चाले चली जाती हैं. अब तक तो न्यायपालिका वोटबैंक और तुष्टिकरण जैसे नासूरों से दूर थी लेकिन लगातार दबाव के चलते वह भी कथित सेकुलर मीडिया, बुद्धिजीवियों (?) की राह पर जाकर राष्ट्रविरोधी हो जाए तो कोइ शंका नहीं है.मीडिया पर तो पहले से ही वामपंथी और सेकुलर अपनी कुण्डली जमाये हुए हैं. और उन्होंने भारतीय मीडिया को किस गर्त में पहुँचाया है, उससे सब वाकिफ हैं. अब न्यायपालिका का सेकुलारिकरण क्या गुल खिलाएगा?
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psudo on 14 March, 2010 10:33;23
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Another piece of Shit by shitty secular media
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प्रभु नाथ पाठक on 14 March, 2010 17:29;31
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मोदी के बेवकूफ साथी
यह बेचारे मोदी के दफ्तर वाले फर्जी नाम से क्यों कमेन्ट करते हैं . बेवक़ूफ़ हैं बेचारे
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bharat on 23 September, 2010 21:38;13
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आपने बिलकुल ठीक कहा प्रभुनाथ जी, बहुत ही अच्छी दूर दृिट है आपकी।
मजा आगया।
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image उषा चांदना अहमदाबाद में रहनेवाली उषा चांदना पिछले 16 सालों से पत्रकारिता कर रही हैं. विभिन्न अखबारों में स्वतंत्र लेखन के साथ विस्फोट.कॉम के लिए नियमित लेखन.
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