बंगाल में सियासी सुनामी से आतंकित हैं वामपंथी
परिवर्तन की सुनामी से ग्रसित पश्चिम बंगाल में वामपंथियों को कुछ ही दिनों में एक और बड़े तूफ़ान से मुखातिब होना है. यह तूफ़ान सुनामी से भी बड़ा हो सकता है और वामपंथियों के गढ़ को उखाड़ कर फेंक सकता है. इसी खौफ से घबराये सत्तारूढ़ मोर्चे के आला नेताओं की नींद हराम है.
बंगाल में इसी जून महीने में निचले निकायों के चुनाव होने हैं. इनमे कोलकाता नगर निगम सहित कई म्युनिसिपल्टी शामिल हैं. अगले साल विधानसभा चुनाव न होता तो कोई भी पार्टी इसे आरपार की भावना से न देखती. तीन दशकों में यह पहला मौका है जब वाम खेमे को तम्बू हिलता दिख रहा है. रायटर्स बिल्डिंग की दहलीज से चंद कदम दूर खडी ममता बनर्जी ने बंगाल में सत्ता बदलने का जो फार्मेट तैयार कर रखा है, उसमे इन चुनावों को काफी महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है.
ममता जानती हैं कि गठबंधन की राजनीति के कारण २००५ की तरह वे सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं उतार पाएंगी, इसीलिए उन्होंने पहले चरण में १०० फीसद जीत की सम्भावना वाले इलाकों की शिनाख्त कर ली है. कांग्रेस के साथ सीटों के सौदे के दौरान होने वाली तकरार को भांपते हुए ममता ने कांग्रेस की प्रायरिटी वाली कुछ सीटें छोड़ने का भी मन बना रखा है. हालांकि वे जानती हैं कि स्थानीय कांग्रेसियों के दबाव के कारण उन्हें कुछ सीटें छोडनी पड़ सकती हैं. पर विधानसभा में लम्बे फायदे को नजर में रखते हुए ममता निचले निकायों में पूरी चतुराई के साथ सौदेबाजी करेंगी.
बंगाल की जनता को पिछले एक साल में रेल सेवा के माध्यम से एक पर एक उपहार देती जा रही ममता वोट बैंक में सेंधमारी का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं. इसका ताजा उदाहरण मटूआ महासंघ का डेढ़ करोड़ मतदाताओं का विशाल वोटबैंक है, जो लगाताल वामपंथियों के कब्जे में रहने के बाद पहली बार पूरी तरह ममता बनर्जी की झोली में आ गया है। इस समाज ने ममता बनर्जी को अपना मुख्य संरक्षक तक बना डाला है। मटुआ समाज बंगाल में दलितों का विशाल समुदाय है, जिसके अनुयायी राज्य के 74 विधानसभा क्षेत्रों में फैले हुए हैं। महासंघ पर ममता की पकड़ का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों जब मुख्य सेविका (जिनका आदेश पूरे समाज के लिए अध्यादेश से कम नहीं होता) ममता बनर्जी के साथ बैठक कर रही थीं, उसी समय वहां पहुंचे एक कद्दावर वामपंथी नेता को उल्टे पांव वहां से खिसकना पड़ा था। नेताजी शायद उन दोनों की बैठक के भाव ताडऩे गए थे, पर बेचारे को बाद में सफाई देनी पड़ी कि उन्हें ममता बनर्जी के आने की जानकारी नहीं थी। इसी से समझा जा सकता है कि मटूआ महासंघ वामपंथियों को आने वाले चुनाव में किस कदर कंगाल करने पर आमादा है।
यही हाल वामपंथियों के दुलारे रहे अल्पसंख्यक मतदाताओं का है। जिन मुसलमानो के वोटबैंक को वामपंथियों ने मनमाफिक इस्तेमाल किया, वे भी अब पूरी तरह रूठ चुके हैं। आलम यह कि उन्हें मनाने की गरज से मुख्यमंत्री को सरकारी नौकरी में 10 फीसद आरक्षण का लॉलीपाप दिखाना पड़ता है। पर मुसलमान समझ चुके हैं कि मुख्यमंत्री का यह दांव चलने वाला नहीं है। धर्म के आधार पर सरकारी नौकरी का प्रस्ताव पहले ही आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर रखा है, जाहिर है बंगाल में भी इसका यही हाल होता दीख रहा है।
बहरहाल, बंगाल का मौजूदा सियासी माहौल वामपंथियों के लिए सुखद नहीं है। सियासी सुनामी की आशंका से ग्रसित माकपाई नेतृत्व अगले चुनाव में बुद्धदेव भट्टाचार्य को कप्तान बतौर पेश करने पर भी दुबारा गौर कर रहा है। जिन जिलों में निचले निकाय के चुनाव होने हैं, वहां ममता बनर्जी की सभा कराने की होड़ लगी हुयी है, जबकि वामपंथी खेमे में मुख्यमंत्री जिलों से सभाओं के बुलावे को तरस रहे हैं।
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ममता माओवादियों के साथ, वामपंथी भरभरा रहे है और भाजपा झारखंड में नक्सली समर्थक शीबू सोरेन को समर्थन दे रही है। नक्सलियों के समर्थन से जीतकर आए कई जेएमएम के विधायक भाजपा के सहयोग से मजे ले रहे है। लोगों को बेवकूफ बनाते है। ममता का माओवाद प्रेम पर आपको परेशानी है, सता के लिए भाजपा के माओवाद प्रेम पर आप चुप है। यह दोगलापन क्यों।
गुस्सा सेहत के लिए खराब होता है. :-)
are yaar apne apko gar patrkar kehte ho to, kuch to sharm karo,
writing, comment sab kuch kitna ghrinit aur biased hota hai aapka..........
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