शौरी को साफ करने में जुटे आडवाणी
संघ की मंशा पर भले ही अपेक्षाकृत युवा नितिन गडकरी को भाजपा की कमान मिल गई हो, और आडवाणी को नेता प्रतिपक्ष से हटाकर पार्श्व में ढकेलने का प्रयास चल रहा हो, पर आडवाणी तो आडवाणी हैं। उन्होंने टीम गडकरी में अपने चहेतों को स्थान दिलवा ही दिया, भले ही वे रीढ विहीन क्यों न हों। इस आपरेशन से फारिग होने के बाद अब आडवाणी के निशाने पर संपादक से राजनेता बने अरूण शौरी पूरी तरह आ चुके हैं। आडवाणी और उनके समर्थको ने अब शौरी को राज्य सभा के रास्ते संसद में प्रवेश के रास्ते बंद करने की कवायद आरंभ कर दी है।
टीम गडकरी के नए नवेले प्रवक्ता बने पांचजन्य के संपादक तरूण विजय और राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी के बीच अंतरंगता किसी से छिपी नहीं है। एक ओर तरूण विजय ने खुलकर आडवाणी को बेक किया था, तो आडवाणी ने भी तरूण विजय के संक्रमण काल में उनका पूरा साथ दिया। जब पांचजन्य के संपादक के तौर पर काम करते हुए तरूण विजय पर घोटालों के आरोप लगे थे, तब तत्कालीन संघ प्रमुख सुदर्शन ने उन्हें वहां से चलता कर दिया था। आडवाणी ने उस वक्त अपना याराना निभाते हुए तरूण विजय को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट का निदेशक बनवा दिया।
आडवाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे चाहते थे कि संजय जोशी टीम गडकरी का हिस्सा न बन पाएं सो उन्होंने वह कर भी दिखाया। संजय जोशी के नाम के आते ही उनकी एक कथित सीडी की बात जोर शोर से पार्टी के अंदर उछाल दी गई। इसी तरह शौरी से नाराज आडवाणी अब चाहते हैं कि शौरी के स्थान पर तरूण विजय को राज्य सभा के रास्ते भेजा जाए। आडवाणी भले ही तरूण विजय को उपकृत करना चाह रहे हों पर संघ और भाजपा के आला नेताओं के पास तरूण विजय के घपले घोटालों का कच्चे चिट्ठे का पुलिंदा पहुंचाया जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जब आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की तारीफ में मल्हार गाया था, तब भारतीय जनता पार्टी में संजय जोशी और अरूण शौरी ही थे, जिन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया था। बताते हैं तभी से आडवाणी ने ठान लिया था कि माकूल वक्त आने पर राजनैतिक परिदृश्य से दोनों ही नेताओं को मिटा दिया जाएगा। लगता है अब आडवाणी की हसरत पूरी होने का समय आ गया है, यही कारण है कि टीम गडकरी में संजय जोशी और अरूण शौरी दोनों ही को स्थान नहीं मिल सका है।
उधर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रहीं हैं, उनके अनुसार अरूण शौरी इन दिनों कांग्रेस से नजदीकी बढाने के मार्ग खोजने में लगे हुए हैं। बताते हैं चूंकि शौरी को आभास हो चुका है कि उन्हें अब भाजपा द्वारा राज्यसभा में नहीं भेजा जा सकता इसीलिए वे नई संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के मैनेजर शौरी के मामले में दो धडों में बट गए हैं, एक शोरी को कांग्रेस में लाने का हिमायती है, ताकि भाजपा पर वार आसानी से किया जा सके, वहीं दूसरे का मानना है कि कल तक कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसने वाले शोरी को आखिर किस आधार पर कांग्रेस में लाया जाए। इसी बीच कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी को यह समझाने का प्रयास भी जोर शौर से जारी है कि ये वही अरूण शोरी हैं, जिन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफोर्स के मुद्दे को जबर्दस्त हवा दी थी और राजीव गांधी को मुंह की खानी पडी थी।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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भारतेंदू हरिश्चंद्र ने बहुत पहले अंधेर नगरी चौपट राजा मे लिखा था-
बकरी गऊ एक करि जाना
वेश्या जोरू एक समाना
दूसरी तथ्य एक और है। अरूण शौरी शायद ही कांग्रेस में जाए। हालांकि वे सारे लोग कांग्रेस में शामिल हो गए है जो कभी राजीव गांधी के खिलाफ थे। इसमें वीपी सिंह के बेटे अजय सिंह भी शामिल है। यूपी की राजनीति में वीपी सिंह के नजदीक रहे सारे लोग धीरे-धीरे कांग्रेस में आ रहे है। हो सकता है अरुण शौरी भी आ जाए। पर अरुण शौरी कांग्रेस की मदद कर पाएंगे। कांग्रेस अभी तक भाजपा को जितना नुकसान पहुंचाना चाहती है पहुंचा चुकी है। जहां तक बात है अरूण शौरी की अगर वे कांग्रेस में गए तो उनकी स्थिति वो नहीं रहेगी जो फिलहाल भाजपा में है। कांग्रेस में थोड़ी जलील की राजनीति भी करनी होगी। कांग्रेस में कई चैनलों के बाद ही आप सोनिया गांधी तक पहुंच पाएंगे। फिर वहां की आतंरिक राजनीति इतनी खतरनाक है कि अरूण शौरी वो सारा कुछ गवां सकते है जो आजतक उन्होंने अपनी पत्रकारिता या राजनीति में हासिल किया है।
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