बंद को लेकर बिखरा रहा विपक्ष
लखनऊ। सोमवार को मंहगाई के मुद्दे को लेकर जहां विरोध का तरीका बेशक बसपा और केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अलावा समूचे विपक्ष का बंदी का था, परंतु इसके बावजूद भी विचारों में समानता होने के बाद भी एकजुटता का अभाव देखा गया। बंदी अभूतपूर्व रही इसे सभी दल स्वीकार रहे हैं, परंतु इसके लिए पीठ अपनी ही थपथपाते देखे गए।
प्रदेश में भाजपा के दिग्गज बंदी के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बधाईयां दे रहे हैं तो समाजवादी पार्टी के प्रमुख समूचे प्रदेश में बंदी के लिए सपाईयों का शाबासी दे रहे हैं। बकौल सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव बंदी अभूतपूर्व रही और हमारे सरकार में न होने के बावजूद हमारे कार्यकर्ताओं ने अपनी ताकत दिखाई। वह साफ कहते हैं कि भाजपा सहित अन्य दलों की बंदी कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि इनकी कई प्रांतों में अपनी सरकारें है और सरकार में रहते हुए यदि बंद कामयाब हो जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए, परंतु हमने सत्ता में न रहने के बावजूद और राज्य सरकार की लाठियां खाने के बावजूद प्रदेश सहित महाराष्ट्र में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।
यह सही है कि भारत बंद काफी मायने में कामयाब रहा, परंतु केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए राहत की यह बात रही कि बंदी के बावजूद जिस प्रकार से बंद समर्थकों में आपसी एकजुटता का अभाव रहा उससे केंद्र के सामने चिंता की बात नहीं रह जाती। यदि ऐसे में विपक्ष एकजुट हो जाता तो यकीनन ही आने वाले दिनों में शुरू होने जा रहे मानसून सत्र में सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं। अब जबकि बंदी के लिए सभी दलों में श्रेय लेने के लिए होड़ मची हुई है तो यकीनन ही केंद्र को घेर पाना आसान नहीं होगा। मंहगाई के विरोध में विपक्ष की लामबंदी को बसपा पहले ही झटका दे चुकी थी। मंहगाई का विरोध बसपा भी कर रही है, परंतु बसपा ने बंदी में सहयोग न देकर अपने लिए दूसरा तरीका चुना क्योंकि यदि बसपा भी बंद में सहयोगी हो जाती तो केंद्र के लिए परेशानियां खड़ी होना लाजिमी था।
मुलायम सिंह का कहना है कि प्रदेश की मायावती सरकार ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रदेश में बंदी का असफल करने की हरसंभव कोशिशें भी कीं, परंतु बंदी का मुद्दा चूंकि आमजन की आवाज बन चुका था तो ऐसे में कामयाब तो होना ही था, परंतु जिस प्रकार से प्रदेश सरकार ने प्रदर्शनकारियों के समक्ष दिक्कतें खड़ी की वह केंद्र सरकार के लिए राहत भरा ही रहा। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने साफ कहा कि राज्य सरकार ने लखनऊ में सपा प्रदर्शनकारियों पर खौलते पानी की बौछारें छोड़ीं, प्रदेश के कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं को तितर बितर करने के लिए लाठी चार्ज भी किया इससे साफ है कि मंहगाई को रोकने के प्रति प्रदेश सरकार भी गंभीर नहीं हैं। जिस प्रकार से सरकार के इशारे पर लखनऊ में ही सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव एवं नेता विरोधी दल शिवपाल सिंह यादव को गिरफ्तार कर यह साबित कर दिया कि बसपा भी मंहगाई वृद्धि की समर्थक हैं। जबकि हमारी सरकार के दौरान जब वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और चिदंबरम ने हमें वैट लगाने के लिए समझाया और नहीं माने तो उन्होंने केंद्र से मिलने वाली सहायता को रोक देने तक की धमकी दी थी, परंतु हम जानते थे कि वैट लगते ही साढ़े तीन फीसदी टैक्स की मार आमजनों का सहनी पड़ेगी मगर इसके प्रतिकूल बसपा की मायावती सरकार ने सत्ता में आते ही व्यापारियों व आमजनों पर वैट थोप दिया।
भारत बंदी को अभूतपूर्व करार देते हुए सपा मुखिया ने कहा कि आमजन मंहगाई से इस कदर त्रस्त थे उन्होंने बंदी को पूरा समर्थन दिया। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हम जहां-जहां गए तमाम कोशिशों के बावजूद हमारे कमांडोज को भोजन तक नहीं मिल सका। यही कारण है कि हम यहां इटावा रूके ताकि अपने कमांडोज को घर से खाना मंगाकर खिला पाते। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकारों ने मंहगाई का बोझ जनता पर डाल दिया, परंतु उन कालाबाजारियों और जमाखोरों के विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जिनके चलते मंहगाई बेलगाम हो रही है। निम्न और मध्यम वर्ग का किसान पिस रहा है। किसानों ने अरहर की दाल को 25 रूपये प्रति किलो बेचा इसके बाद मजदूरी, सफाई सहित अन्य पांच रूपये के खर्चे जोड़कर इसे तीस तथा अधिक से अधिक 45 रूपये बिकनी थी, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
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दिनेश जी, लेख एकतरफा हो गया है. इसमें बीजेपी सहित अन्य दलों के बड़े नेताओं के वक्तव्य होने चाहिए the. खैर , नेताजी कब तक कोंग्रेस की दोस्ती करते रहेंगे. पहले वे यह निश्चित करें की उनका दुश्मन-१ है कौन? और मित्र -१ है कौन? उनका वोटर और आम जनता उनके लिए क्या स्थान रखती है. बेनी, बब्बर , अमर, जयाप्रदा, आजम और रामशरण व् जनेश्वर के बाद पारिवारिक विवादों में फंसी समाजवादी पार्टी का यह अंतिम दौर न साबित हो जाये. कोंगेस फिर से साम्राज्यवादी हो रही.
भाजपा जिसे देश सबसे बड़ा धोखा मान लिया है अपनी भूमिका निभा चुकी है. दूसरी तरफ मायावती कोंग्रेस की सहयोगी बन कर बंद को असफल बनाने में लगी थी अपनी खाल बचाने में लगी थी. इन स्थितिओं में कांग्रेस विरोधी राजनीति के असली कर्णधारों में से एक मुलायम का कांग्रेस समर्थन में लग जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्हें अब अपने स्वरुप और वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए अपने तरीके से पुनः जुटना पड़ेगा.पर अपनी आदतों और sangathan की क्षमताओं को भी बढ़ाना होगा.
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