किसानों की कीमत पर बचाये गये कारपोरेट
सत्यम घोटाले के मुख्य आरोपी रामलिंगराजू को आखिरकार जमानत मिल गयी है. लेकिन रामलिंगराजू की कंपनी को बचाने के लिए किसानों को कर्ज देने के लिए बनी संस्था ने 100 करोड़ रुपये बिना किसी नियम कानून का पालन किये दे दिये. सरकार के अरबों रूपए बिना किसी कागजी कार्रवाई के रिलीज कर दिए गये, उस पर सवाल कोई और नहीं, उसी संस्था के अपने ऑडिटर उठाए। मामला केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भेजा गया। सतर्कता आयोग अपनी जांच में चेयरमैन को दोषी पाया, लेकिन वह चेयरमैन आज भी अपनी कुर्सी पर काबिज है। जांच रफा-दफा हो गई और सबकुछ सामान्य चल रहा है।
यह मामला राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड के चेयरमैन यू सी सारंगी से जुड़ा है। उनकी कार्यशैली पर केंद्रीय सतर्कता आयोग भी सवाल उठा चुका है, लेकिन सारंगी और उनके मौखिक इशारे पर भारत सरकार के सौ करोड़ रूपए को बाजार में भेजकर करोड़ों की कमाई कर चुके अधिकारी का बाल बांका नहीं हुआ है। 2008 का साल हैदराबाद के सत्यम घोटाले के लिए भी याद किया जाता है। संयोग भी कुछ ऐसा है कि नाबार्ड के इस घोटाले के तार सत्यम से भी जुड़े होने का अंदेशा जताया जा चुका है। चूंकि मामला ही दबा दिया गया, लिहाजा नाबार्ड चेयरमैन की सत्यम से तार जुड़ने की दिशा में जांच ही नहीं हो पाई।
नाबार्ड का काम सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के जरिए कृषि और ग्रामीण विकास कार्यों के लिए ऋण मुहैया कराना। इसके तहत देशभर के सहकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड से पैसे की मांग करते हैं। इसके लिए बाकायदा रिंबर्समेंट के आधार पर किया जाता है। इसके लिए संबंधित बैंक नाबार्ड से धन रिलीज करने के लिए आवेदन देता है। उसके आवेदन पर जांच होती है और रिंबर्समेंट आधार पर धन जारी किया जाता है। कभी भी क्लीन एडवांस नहीं जारी किया जाता। यह विभागीय और वित्तमंत्रालय के दिशा निर्देशों के बिल्कुल खिलाफ है। लेकिन पिछले साल के आखिरी दिनों यानी 15 दिसंबर 2008 को आंध्र प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक ने 100 करोड़ रूपए के क्लीन एडवांस की मांग नाबार्ड के हैदराबाद के क्षेत्रीय कार्यालय से की। ऐसे मामलों की जांच-पड़ताल में कई बार महीनों लग जाते है। लेकिन सिर्फ पंद्रह दिनों बाद यानी 31 दिसंबर को नाबार्ड के हैदराबाद कार्यालय ने हेड ऑफिस को 100 करोड़ रूपए अतिरिक्त रिलीज करने की मांग रखी। दिलचस्प यह है कि यह रकम बिजनेस ट्रांजेक्शन के तहत तुरंत रिलीज कर दी गई। इसे देखकर बैंक के अफसर हैरान थे। क्योंकि एक बार देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने नाबार्ड से ऐसी मांग रखी थी। उसकी साख आंध्र प्रदेश कोऑरेटिव बैंक की तुलना में कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद उसे यह रकम जारी नहीं की गई। क्योंकि यह बैंक के नियमों और वित्त मंत्रालय के दिशा निर्देशों के खिलाफ था। नाबार्ड की स्थापना 1982 में की गई। उसके अब तक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। वैसे भी यह रकम जारी करने के लिए बैंक के चेयरमैन यूसी सारंगी ने टेलीफोन पर ही हैदराबाद कार्यालय को निर्देश जारी कर दिया और आनन-फानन में यह रकम जारी भी कर दी गई।
नियमों के विरूद्ध इस ट्रांजेक्शन को हैदराबाद कार्यालय के आंतरिक ऑडिटर ने ही पकड़ा। ऐसे मामलों में कोऑपरेटिव या ग्रामीण विकास बैंक ड्राल आवेदन नहीं दिया था। उसने क्लीन एडवांस मांगा था। 27 जनवरी 2009 को ऑडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ी। ऑडिटर के ध्यान में आई कि जिस समय यह ट्रांजेक्शन किया गया, उस समय नाबार्ड हैदराबाद के प्रभारी दौरे पर थे। उन्होंने जरूरी पड़ताल करने की भी जहमत नहीं उठाई। बहरहाल यह मामला प्रकाश में आने के बाद यू सी सारंगी के इशारे पर नाबार्ड हेड ऑफिस से इनफोर्समेंट डाइरेक्टरेट के एक जूनियर अधिकारी प्रकाश बख्शी को जांच के लिए 29 जनवरी 2009 को हैदराबाद भेजा। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं होने की बात लिखी। इसके बाद आनन-फानन में यू सी सारंगी ने 31 जनवरी 2009 को इस जांच को बंद करने का आदेश दे दिया। अपने आदेश में चेयरमैन यूसी सारंगी ने आंध्र प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक से सिर्फ ढाई प्रतिशत हर्जाने वसूलने का आदेश दिया। हालांकि उनके इस फैसले से नाबार्ड के प्रबंध निदेशक डॉक्टर के जी करमाकर सहमत नहीं थे। यहां यह बता देना जरूरी है कि प्रकाश बख्शी को अव्वल तो सौ करोड़ रूपए के घोटाले की जांच का अधिकार नहीं था। फिर उनका नाम हाउसिंग घोटाले में भी शामिल रहा है। जिससे यू सी सारंगी ने ही उन्हें बचा लिया। यहां यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति पर ही सवाल उठाए हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि यू सी सारंगी की नियुक्ति वैधानिक नहीं है। जिसके खिलाफ भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रखी है। इसके साथ ही सरकार ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को लागू न करने के लिए बंबई हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में अपील कर रखी है। जिस अफसर पर हाईकोर्ट तक सवाल उठा चुका हो और उसके खिलाफ भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रखी हो, उससे साफ है कि उनकी राजनीतिक पहुंच कितनी है।
लेकिन सारंगी द्वारा इस अध्याय को बंद किए जाने के बावजूद मामला थमा नहीं। चूंकि सरकारी विभागों के इन्फोर्समेंट निदेशालय कानूनी तौर पर केंद्रीय सतर्कता आयोग के अधीन हैं, लिहाजा नाबार्ड के मुख्य विजिलेंस अधिकारी ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को नाबार्ड चेयरमैन यूसी सारंगी के खिलाफ 7 मई 2009 को शिकायत भेजी। इस शिकायत में मुख्य विजिलेंस अधिकारी पी एल बेहरा ने चेयरमैन यूसी सारंगी पर आर्थिक घोटाले में शामिल होने की शिकायत भेजी और उनके खिलाफ जांच की सिफारिश की। लेकिन हैरत की बात यह है कि बैंक के एक अहम ओहदेदार की इस शिकायत पर भी केंद्रीय सतर्कता आयोग चुप बैठा रहा। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत थी, आयोग ने उसे ही इस मामले को देखने के लिए आदेश दे दिया। यानी मुलजिम ही खुद जांचकर्ता बन बैठा। सतर्कता आयोग के इस आदेश में भी गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है। प्रथम प्रवक्ता के पास इस मामले के पूरे दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। मजेदार बात यह है कि 21 अक्टूबर 2009 को पी एल बेहरा के खिलाफ चेयरमैन यू सी सारंगी ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को लिखा कि वे चीफ विजिलेंस अधिकारी की भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं, लिहाजा उन्हें उनके पद से हटाया जा रहा है। यानी गड़बड़ियों और घोटालों पर निगाह रखने वाले इस अधिकारी को भी हटा दिया गया, जिसे सतर्कता आयोग ने भी मंजूरी दे दी। जिस पर 11 नवंबर 2009 को मुख्य विजिलेंस अधिकारी के पद से पी एल बेहरा को हटा दिया गया। इसके बाद ये मामला बंद होना ही था।
सबसे अहम तथ्य यह है कि यह पूरी डील सत्यम बेलआउट पैकेज के दौरान हुई। नाबार्ड के अधिकारियों को शक है कि सौ करोड़ की इस रकम का इस्तेमाल सत्यम बेलआउट पैकेज में हुआ है। इस तरह एक महीने तक सौ करोड़ रूपए नियमों के खिलाफ नाबार्ड के हाथों से बाहर रहे। चूंकि मामला संज्ञान में आ गया, लिहाजा यह रकम फौरी तौर पर वापस ले ली गई। लेकिन बैंकिंग के जानकार मानते हैं कि इतनी बड़ी रकम के बदले बाजार से दस-बीस करोड़ एक ही महीने में कमाए जा सकते हैं। यानी शक तो यह है कि सारंगी और उनके चहेते अफसरों ने इसके जरिए करोड़ों की कमाई की। अगर जांच की जाय तो सत्यम से भी सारंगी के सूत्र जुड़ सकते हैं।
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