अनिल को औकात बताने पर आमादा मुकेश
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भारत कारपोरेट वार के दौर में विधिवत प्रवेश कर गया है. अनिल-मुकेश विवाद के लंबे दौर के अंत के बाद एक बार फिर अनिल और मुकेश अंबानी आमने सामने है. लेकिन इस बार मुकेश अंबानी के सामने अनिल अंबानी नहीं बल्कि अनिल अग्रवाल हैं जो कि वेदांता कंपनी समूह के मालिक हैं. मूलत: भारत की पैदाइश अनिल अग्रवाल अनिवासी भारतीय हैं.
लेकिन मुकेश अंबानी भला अनिल अग्रवाल पर क्यों कुपित हो गये? अनिल अग्रवाल के बाक्साइट खनन के लिए प्रस्तावित नियमगिरी पहाड़ियों का प्रस्ताव खारिज हो गया. वेदांता को इससे बड़ा झटका लगा है. हालांकि इसे खारिज होना ही चाहिए था क्योंकि इससे पूरी नियमगिरी पहाड़ी तहस नहस हो जाती और वहां की दो अति संवेदनशील जनजातियां समाप्त हो जातीं. लेकिन क्या कांग्रेस ने दो जनजातियों की रक्षा के लिए 1.7 अरब डालर के प्रोजेक्ट को खारिज कर दिया? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के रहते किसी पूंजीपति के साथ महज आदिवासियों के लिए इतना बड़ा "बलिदान" कदापि संभव नहीं हो सकता था. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने नियमगिरी में जो नाटकीय मंचन किया है उसका निर्देशन और किसी ने नहीं बल्कि मुकेश अंबानी ने किया. साफ साफ क्या हुआ होगा उसके प्रत्यक्षदर्शी तो हम भी नहीं हैं लेकिन पिछले एक सप्ताह की घटनाओं का क्रम आपस में जोड़ें तो एक ऐसा दृश्य सामने उभरता है जिसमें वेदांता समूह के प्रोजेक्ट को खारिज करना, अनिल अग्रवाल को चोट पहुंचाना और कांग्रेस द्वारा इसका श्रेय राहुल गांधी को देना महज संयोग भर नहीं है.
वेदांता समूह द्वारा प्रस्तावित नियमगिरी खनन साइट को लेकर विवाद शुरू से ही चल रहा है. कई पर्यावरण समूह और आदिवासी समूह इस प्रोजेक्ट को हटाने के लिए प्रयासरत थे. लेकिन उनकी भला कौन सुनता. मामला राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के बीच क्लिंयरेन्स पर लटका हुआ था. वेदान्ता समूह के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की बदौलत अनिल अग्रवाल भी कुलांचे भर रहे थे लेकिन नियमगिरी प्रोजेक्ट के खारिज होने की खबर के साथ ही लंदन स्टाक एक्सचेंज में वेदांता रिसोर्सेज के शेयर में 7 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ गयी. अनिल अग्रवाल की कंपनी की शेयर कीमतों में ही कमी नहीं आयी. मामला बिगड़ा उस दिन जिस िदन यह खबर आयी कि अगर अनिल अग्रवाल केयर्न इंडिया का अधिग्रहण कर लेते हैं तो वे देश में मुकेश अंबानी से ज्यादा अमीर हो जाएंगे. यह खबर आयी 22 अगस्त को कि आयल और गैस के क्षेत्र में कार्यरत कंपनी केयर्न इंडिया का अधिग्रहण पूरा होते ही अनिल अग्रवाल देश के सबसे अमीर व्यक्ति हो जाएंगे. उनकी पारिवारिक पूंजी 1,67,000 करोड़ से अधिक हो जाएगी जो कि मुकेश अंबानी की रिलायंस में हिस्सेदारी पूंजी 1,45,275 करोड़ रुपये से अधिक होगी. मुकेश अंबानी को भला यह कैसे बर्दाश्त हो सकता था कि देश में उनसे बड़ा दूसरा अमीर पैदा हो जाए. इसलिए उन्होंने कांग्रेस में अपने संपर्कों का उपयोग शुरू करके अनिल अग्रवाल को ध्वस्त करने की कार्यवाही को अंजाम देना शुरू कर दिया. वेदांत समूह के प्रोजेक्ट को खारिज करवा देना उसकी शुरूआत थी क्योंकि उसके बाद जो वेदांता समूह केयर्न का अधिग्रहण करने जा रही थी वही कमजोर हो जाती, और हुआ भी वही.
लेकिन मुकेश अंबानी यहीं पर रुके हों ऐसा नहीं है. नियमगिरी प्रोजेक्ट के खारिज होने के बाद मुकेश अंबानी की ओर से अगला दांव चला गया कि वेदांता समूह और केयर्न का समझौता न हो सके. केयर्न में अनिल अग्रवाल की रुचि इसलिए है क्योंकि वह तेल और गैस उत्खनन करनेवाली कंपनी है. केयर्न इंडिया को उसी केजी बेसिन में तेल और गैस का एक भंडार मिला है जहां मुकेश अंबानी पहले से ही विराजमान हैं. अगर केयर्न इंडिया का अधिग्रहण अनिल अग्रवाल कर लेते हैं तो तेल और गैस की यह नयी खोज अनिल अग्रवाल के हिस्से में आ जाएगी. यानी केजी बेसिन में मुकेश के साथ अनिल अग्रवाल भी मौजूद हो जाएंगे. यह भला मुकेश अंबानी को कैसे बर्दाश्त हो सकता था? मुकेश अंबानी ने अपने संपर्कों का उपयोग करके न केवल अनिल अग्रवाल को ध्वस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी बल्कि पेट्रोलियम मंत्रालय के विश्वस्त अधिकारियों के जरिए केयर्न इंडिया के राजस्थान के आयल ब्लाक पर भी धावा बोल दिया. राष्ट्रहित की दुहाई देते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने केयर्न इंडिया के कारोबार को समेटने की तैयारी शुरू कर दी है. पेट्रोलियम मंत्रालय तर्क दे रहा है कि कनाडा की इस कंपनी का एक कार्यालय हांगकांग में भी है इसलिए यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चीनी खतरे का संकेत हो सकता है, इसलिए हो सकता है कि पेट्रोलियम मंत्रालय केयर्न इंिडया के काम काज को समेटने के लिए कह दे. लेकिन हकीकत क्या है? मुकेश अंबानी के चचा मुरली देवड़ा इस समय पेट्रोलियम मंत्री हैं और वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनके भतीजे के लिए कभी कोई प्रतिद्वंदी खड़ा हो. केयर्न पर मुकेश अंबानी की नजरें कभी टेड़ी नहीं होती अगर वह केजी बेसिन में न घुसता या फिर अनिल अग्रवाल उसे खरीदकर देश के सबसे बड़े उद्योगपति बनने की पहल न करते.
एक अनिल को औकात में लाने के बाद अब मुकेश अंबानी दूसरे अनिल को औकात में लाने की योजना पर लगे हैं. उस अनिल के साथ तो हो सकता है मुकेश अंबानी ने थोड़ी रियायत भी कर दी हो लेकिन इस अनिल अग्रवाल के साथ मुकेश अंबानी कोई रियायत करेंगे ऐसा लगता नहीं है. इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि अनिल अग्रवाल भाजपा शासन में ताकतवर थे और उन्होने सरकारी कंपनी बाल्को को औने पौने दाम में खरीद लिया था लेकिन अब कांग्रेस का शासन है जिस पर सिर्फ मुकेश अंबानी का राज चलता है. अनिल अग्रवाल के लिए कांग्रेस में अपने लिए लॉबिंग कर पाना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि शायद ही कोई कांग्रेसी नेता हो मुकेश अंबानी के खिलाफ जाकर अनिल अग्रवाल के लिए लॉबिंग करेगा. देखना सिर्फ यह होगा कि अनिल अग्रवाल की औकात बताने मुकेश अंबानी को कितना समय लगता है.
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