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कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है भाजपा का डी-4

image भाजपाई डी-4 की चौकड़ी

इन दिनों एक बार फिर भाजपा के भीतर बवाल मचा हुआ है. भाजपा के शीर्ष पर बैठे कुछ नेताओं के खिलाफ संघ के कुछ निष्ठावान नेताओं ने मोर्चा खोलते हुए एक पर्चा सर्कुलेट करना शुरू किया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि दिल्ली में डी-4 नाम का एक ग्रुप सक्रिय है जो सत्ताधारी कांग्रेस के साथ लबर-झबर कर रहा है. यह ग्रुप न केवल नितिन गडकरी को कमजोर करने में लगा है बल्कि गृहमंत्री से भी संपर्क में हैं और कांग्रेस द्वारा भगवा आतंकवाद के मुद्दे पर जो भाजपा को निशाने पर लेने की कोशिश हो रही है उसे भी इस ग्रुप का आशिर्वाद मिला हुआ है.

कांग्रेस की राजनीति हमेशा से ही जवाहरलाल नेहरू के बच्चों के आस पास ही केन्द्रित रही है. कांग्रेस का बड़े से बड़ा नेता अपने आपको नेहरू परिवार के वंशजों की छत्रछाया में सुरक्षित महसूस करता है. सच्ची  बात  यह  है  कि यह अपने लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का संचालन जिस तरह से होता है ,उससे लोकशाही की व्यवस्था कमज़ोर होती है. उस से  भी बड़ा दुर्भाग्य है कि बहुत सारी छोटी पार्टियां भी अपने नेताओं के परिवार की कृपा की आकांक्षी रहने लगी हैं. कांग्रेस में तो ज्यादातर  बड़े नेताओं की दूसरी पीढी लाभ ले रही है. कहीं कहीं तो यह खेल तीसरी पीढी तक पंहुच गया है. अब देखने में आ रहा है कि लालू प्रसाद, एम करूणानिधि, मुलायम सिंह यादव, फारूक अब्दुल्ला, शरद पवार आदि नेता भी अपने परिवार को आगे बढाने में जुट गए हैं. वंशवाद के इस आतंक में संतोष की बात यह है कि वामपंथी पार्टियां और मुख्य विपक्षी दल, भारतीय जनता पार्टी में वंशवाद इतने क्रूर रूप में नहीं है लेकिन बीजेपी में अलग तरीके की सत्ता की राजनीति शुरू हो गयी है. बीजेपी भी छः साल केंद्रीय सत्ता का सुख भोग चुकी है. अब वहां भी सत्ता के कई केंद्र बन चुके हैं. जब राजनाथ सिंह बीजेपी के अध्यक्ष थे तो लालकृष्ण आडवानी के प्रति सहानुभूति रखने वाले नेताओं का एक वर्ग सक्रिय था जिसने राजनाथ सिंह को असफल करने की पूरी कोशिश की थी. उम्मीद की जा रही थी कि राजनाथ सिंह के हटने के बाद यह वर्ग पार्टी के साथ एकजुटता दिखाएगा और नए  अध्यक्ष ,नितिन गडकरी को मज़बूत करने में नागपुर की मदद करेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. 

आडवानी के इर्द गिर्द रहने वाले पार्टी के बड़े नेताओं ने अपने गुट के लिए सभी महत्वपूर्ण पद हथिया लिये हैं. जिन नेताओं ने नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनवाने में अहम भूमिका अदा की थी, वे हाशिये पर आ गए हैं. उनको उम्मीद थी कि राजनाथ सिंह के हटने के बाद उनकी हैसियत बढ़ेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब इन नेताओं ने एक पर्चा सर्कुलेट करना शुरू कर दिया है. जिसमें आरोप लगाया गया है कि दिल्ली में डी-4 नाम का एक ग्रुप सक्रिय है जो सत्ताधारी कांग्रेस के साथ लबर-झबर कर रहा  है. इस पर्चे में आरोप लगाया गया है कि इस ग्रुप के लोग गृह मंत्री से भी संपर्क में हैं और जो भगवा आतंकवाद को निशाने पर लेने की कांग्रेस की कोशिश चल रही है ,उसे इस ग्रुप का आशीर्वाद मिला हुआ है. इस पर्चे में आरोप लगाया गया है कि पिछले एक वर्ष में अडवानी और उनके गुट के बाकी डी-4 के नेता, कांग्रेस के बहुत करीब पंहुच गए हैं. २८ अगस्त के अखबारों में छपी एक खबर के हवाले से इस ग्रुप ने आरोप लगाया है कि आडवाणी की ख़ास कृपापात्र नेता, सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री की भूरि भूरि प्रशंसा की है. वैसे भी दिल्ली के सत्ता के गलियारों में यह चर्चा का विषय है कि सुषमा स्वराज और सोनिया गांधी के बीच अब वह तल्खी  नहीं है जो पहले हुआ करती थी.

पार्टी में इस बात पर भी चर्चा है कि सुषमा स्वराज की राजीव गांधी की समाधि पर मौजूदगी अकारण नहीं थी. इसके पहले कभी भी कोई बी जे पी नेता सार्वजनिक रूप से राजीव गांधी को श्रद्धा सुमन चढाने  नहीं गया था. आर एस एस के करीबी  माने जाने  वाले मध्य प्रदेश के कुछ नेताओं का आरोप है कि सुषमा और सोनिया के बीच कम हो रही दूरियां किन्ही व्यक्तिगत कारणों से नहीं हैं. उनका आरोप है कि यह वास्तव में डी-4  की भावी रणनीति का आभास मात्र है. इस सन्दर्भ में परमाणु ज़िम्मेदारी  बिल को पास कराने में बी जे पी और कांग्रेस की दोस्ती किसी को भी नज़र आ जायेगी. सब जानते हैं कि पार्टी की संसदीय शाखा पर  डी-4 का ही क़ब्ज़ा है. यह डी-4  और कांग्रेस में बढ़ती दोस्ती का अहम सबूत है.

राजनीति के जानकार बताते हैं कि अडवानी और डी-4  के लोग आर एस एस की ओर से भारी चुनौती का सामना कर रहे हैं. डी-4  के नेताओं में किसी की भी ज़मीनी राजनीति में कोई हैसियत नहीं है. इनका कोई भी नेता अपने राज्य में कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता. इनमें से सभी सेफ सीट की तलाश में रहते हैं या फिर राज्यसभा के रास्ते संसद पंहुचते हैं. उनकी असली ताकत तिकड़म की राजनीति है .उन्हें दिल्ली दरबार की हर चालाकी मालूम है और वे इसी के बल पर आर एस एस को भी धता बता देने की क्षमता रखते हैं. इनके खिलाफ दबी ज़ुबान से ही सही, विरोध के सुर उभर रहे हैं. आरोप लगाया गया है कि यह लोग राजनीति में इतने दक्ष है कि आर एस एस के मोहन भागवत तक इनके सामने असहाय हो जाते हैं. नागपुर की कमान संभालने के बाद भागवत ने डी-4 पर हमला तो किया लेकिन बात को उसके अंजाम तक नहीं पंहुचाया. नतीजा यह हुआ कि इस ग्रुप  के लोग घायल तो हो गए लेकिन बच गए. और दुनिया जानती है ई कि जब विषधर घायल हो जाता है तो वह चुपके से बदला लेता है. आजकल मोहन भागवत का वही समय चल रहा है.
 
डी-4  की कोशिश है कि आर एस एस पर सरकार की तरफ से  हो रहे हमलों के निशाने में लाया जाए जिसके बाद डी-4 का पलड़ा भारी हो जाएगा और वह अपनी शर्तों पर आर एस एस को बचाने की कोशिश करेगा. बीजेपी की यह दुर्दशा देश के हित में है.लेकिन सत्ता के लोभ में बी जे पी में आये लोग परेशान हैं. बीजेपी का आम कार्यकर्ता भी परेशान है कि अपने खून पसीने से उसने जिस पार्टी को बनाया था उसका सारा फायदा डी-4 वाले उठा रहे हैं. लेकिन पार्टी के नेतृत्व पर क़ब्ज़ा जमाये वे लोग खुश हैं जो नितिन गडकरी के विरोधी  हैं और उस वक़्त का इंतजार कर रहे हैं जब अपनी बेलगाम ज़बान के चलते नितिन गडकरी कोई ऐसी गलती कर देगें जब उन्हें  बचा पाना असंभव हो जाएगा और उन्हें भी बंगारू लक्ष्मण की तरह विदा कर दिया जाएगा.

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prashant mehrishi on 06 September, 2010 22:18;47
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शेष नारायण जी आजकल आप harry potter पढ़ रहे हैं क्या ?
मेरा बेटा जिस दिन उसे पढता है बिलकुल ऐसी ही बे सर पैर की कहानिया बनाता है .अपनी दादी जी को डी 4 कहता है और घर के देसी पालतू कुत्ते मोती को M S 6 .
भाई अच्छी पुस्तके बाजार मैं हैं एक मैं पढ़ रहा हूँ " भूख का असली चेहरा " देवेन्द्रशर्मा
आप भी पढो और इस तिलस्मी दुनिया से निकलो .
RSS को समझने के लिए एक जीवन भी कम पड़ता है दुसरे जनम मैं समझ आती है vo भी गहरे पानी मैं उतर कर .किनारे पे baith कर नहीं . ८५ वर्षो की तपस्या है कोई राजनेतिक ताकत नहीं .
jab चाहे कम ज्यादा ho jaye . kabhi param pujya mohan जी bhagvat को साक्षात् सुनो ,इस प्रकार लिखना अपने आप छोड़ doge .
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सोनिया गांधी से सुषमा के मधुर संबंध on 07 September, 2010 10:32;37
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"विपक्ष की नेता के तौर पर स्वराज खुद को लोकतंत्र के सजग प्रहरी की भूमिका में देखती हैं। कभी बेल्लारी में सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ चुकीं सुषमा को यह स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं है कि आज उनके संबंध सोनिया गांधी से सौहार्दपूर्ण हैं। वह मानती हैं कि सोनिया से उनकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है।"

एजेसियां, 6 सितंबर 2010
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image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
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