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ईवीएम मशीनों ने बना दिया विजेता

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मुंबई में 2004 के चुनावों में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी को एक सीट पर सफलता हासिल हुई थी, जबकि कांग्रेस को पांच सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। शिवसेना के मोहन रावले उस समय जब दक्षिण-मध्य मुंबई की सीट से निर्वाचित हुए थे, उस समय इन्हीं विश्लेषकों ने रावले की जीत को सीधे तौर पर शिवसेना की जीत मानने की बजाय तर्क जारी किया था कि निर्दलीय उम्मीदवार अरूण गवली द्वारा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार सचिन अहीर के मतों में विभाजन के चलते रावले जीते। विश्लेषकों के इस तर्क को सच माना जाए और दक्षिण और दक्षिण-मध्य मुंबई के विलय से तैयार हुए नए दक्षिण मुंबई निर्वाचन क्षेत्र पर वर्ष 2009 के चुनावों का विश्लेषण किया जाए।

इस चुनाव में प्रक्रिया प्रारंभ होते ही अरूण गवली ने अपना समर्थन कांग्रेस प्रत्याशी को जारी कर दिया था। अरूण गवली-मिलिंद देवड़ा-सचिन अहीर के वोट एक हो गए। दक्षिण मुंबई में परंपरागत गुजराती और मारवाड़ी वोटों पर भाजपा सेंध लगाती थी। इस बार भाजपा के परंपरागत समर्थक मसलन `परोपकार´ जैसी संस्थाओं ने हिन्दुत्व की बजाय राजस्थानी एका को प्राथमिकता दी। जो संस्थाएं दशकों से शिवसेना-भाजपा से मदद प्राप्त करती रही हैं, उन्हें चुपचाप भाजपा नेताओं ने मिलिंद देवड़ा की तरफ सरक जाने दिया। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जिन बाला नांदगांवकर को 1,57,729 वोट प्राप्त हुए हैं यदि उन वोटों को मोहन रावले (शिवसेना) के वोटों में मिला दिया जाए तो मिलिंद देवड़ा 33,436 वोटों से हार जाते हैं। इसका क्या मतलब है? साफ है कि मिलिंद देवड़ा के समर्थन में कोई जनादेश नहीं है। बाला नांदगांवकर वर्षों तक शिवसेना के नगरसेवक, विधायक और मंत्री रहे।

हमने ईवीएम मशीनों के द्वारा हेरफेर किए जाने की आशंका जताई। उस पर ढेर सारे लोगों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की। कुछ इसे कोरी कल्पना मानते हैं, कुछ हमारी आशंका से सहमत हैं पर जानना चाहते हैं कि क्या ऐसा हो पाना संभव है? चुनावों में सक्रिय कार्यकर्ताओं में अधिकांश हमारी आशंका से सहमत हैं। भारत में हम जिन वोटिंग मशीनों का प्रयोग करते हैं उन्हें डीआरई वोटिंग मशीन कहा जाता है। ब्राजील, नीदरलैंड, वेनेजुएला, अमेरिका और भारत में इन मशीनों का उपयोग किया जाता रहा है। भारत में भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड इन मशीनों का निर्माण करती है। ईवीएम मशीन का सिस्टम दो उपकरणों से चलता है। ये उपकरण 6 वोल्ट की बैटरी से संचालित होता है। वोटिंग इकाई वोटर के हाथ होती है, जबकि कंट्रोल यूनिट निर्वाचन अधिकारी संचालित करता है। दोनों यूनिट एक 5 मीटर लंबे केबल द्वारा जुड़े होते हैं। एक वोटिंग यूनिट में 16 उम्मीदवारों का नाम हो सकता है। एक कंट्रोल यूनिट से 4 वोटर यूनिट जोड़े जा सकते हैं। इस प्रकार एक ईवीएम सिस्टम के तहत अधिकतम 64 उम्मीदवारों का नाम हो सकता है। वोटिंग यूनिट में एक नीला बटन होता है जिसे दबाकर वोटर अपने मनपसंद उम्मीदवार को वोट दे सकता है। कंट्रोल यूनिट में तीन बटन होते हैं। एक बटन से निर्वाचन अधिकारी वोट जारी करता है, दूसरे से कुल वोटों की गणना और तीसरा बटन चुनाव प्रक्रिया समाप्त करता है। मशीन का रिजल्ट बटन छिपा रहता है और सील किया गया होता है। यदि प्रक्रिया पूरी होने का बटन न दबाया गया हो तो परिणाम वाला बटन नहीं दबता। क्या इस प्रक्रिया में हेरफेर संभव नहीं है?

नीदरलैंड और अमेरिका में एक ग्रुप सक्रिय है जिसका नाम है-`विज वर्टुवेन स्टेनकंप्यूटर नीट (हम कंप्यूटर वोटिंग मशीन पर भरोसा नहीं करते) इस ग्रुप ने एक नहीं अनेक प्रकार से सिद्ध किया है कि ईवीएम के हार्डवेयर को `टैंपर´ किया जा सकता है। `मैंन इन मिडल अटैक टेक्निक´ से मशीन के उपयोग करने वाले और सेंट्रल मैकेनिजम के बीच हार्डवेयर डालकर व्यापक हेरफेर किया जा सकता है। कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रुस श्नीयर ने भी तमाम प्रयोग कर सिद्ध किया है कि ईवीएम में ऐसे `सॉफ्टवेयर´ बैठाए जा सकते हैं जिससे मनचाहा परिणाम प्राप्त किया जा सके। उन्होंने सुझाव दिया है कि वोटिंग मशीन के `सोर्स कोड´ को जब तक निरीक्षण के लिए सार्वजनिक नहीं किया जाता तब तक उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ब्रिटेन में `ओपन राइट्स ग्रुप´ नामक संस्था ने वहां बाकायदा अभियान चला रखा है कि जब तक ईवीएम को सबके सामने टेस्ट करने, योग्य ऑडिट प्रक्रिया से गुजारने और सिस्टम की प्रोसेस डिवाइस सार्वजनिक नहीं की जाती तब तक यह मशीन अविश्वसनीय मानी जाएगी। इस ईवीएम के माध्यम से चुनावी जालसाजी बड़े पैमाने पर की जा सकती हैं।

अमेरिका सहित कई देशों में ईवीएम में `फ्रॉड´ किए जाने के मामले सामने आ चुके हैं। अमेरिका के 2004 के राष्ट्रपति चुनावों की प्रक्रिया के दौरान 4 नवंबर 2003 की विर्जीनिया की फेयरफैक्स काउंटी के तमाम मतदाताओं ने शिकायत की थी कि वे जिस उम्मीदवार को वोट दे रहे थे उसका संकेतक कुछ देर बाद बंद हो जाता था। उसी चुनाव के दौरान 30 अप्रैल 2004 को कैलिफोर्निया के स्टेट सेक्रेटरी केविन शेली ने ईवीएम उपकरण आपूर्तिकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था। बाद में आपूर्तिकर्ता डायबोल्ड इलेक्शन सिस्टम को इस मुकदमे में समझौता कर 26 लाख डॉलर का हर्जाना भरना पड़ा।

नीदरलैंड में 30 अक्टूबर 2006 को डच गृहमंत्री ने वोटिंग मशीनों में `फ्रॉड´ होने का मामला पकड़कर मशीन बनाने वाली कंपनी एसडीयू एनवी का लाइसेंस रद्द कर दिया था। अमेरिका में 2006 के आम चुनावों में पाया गया कि हॉलीवुड, मियामी में मतदाताओं ने तीन वोट डेमोक्रेट उम्मीदवार को दिए थे जो रिपब्लिकन उम्मीदवार के खाते में दर्ज हो गया था। फिनलैंड की सुप्रीम कोर्ट के सामने ईवीएम मशीनों में धोखाधड़ी का मामला आया तो वहां कोर्ट को म्युनिसिपैलिटी के इलेक्शन रद्द करने पड़े थे। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ईवीएम बनाने वाली प्रीमियर इलेक्शन सॉल्यूशंस और एक्यू वोट-टीएसएक्स की मशीनों का अध्ययन किया था। उस अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तरह की मशीनों में वोट चुराने वाले सॉफ्टवेयर डालने में एक मिनट से भी कम समय लगेगा।

भारत में राजनीतिक दल और चुनावों में पारदर्शिता की बातें करने वाले पता नहीं क्या इतना विश्वास किए बैठे हैं? पश्चिमी देशों में तो ईवीएम के माध्यम से चुनावों में फर्जीवाड़ा किए जाने के मामलों पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं। सन् 2006 में `मैन ऑफ द इयर´ नामक फिल्म बनी थी, उसमें रॉबिन विलियम्स ने मुख्य भूमिका अदा की थी। विलियम्स अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में एक `सॉफ्टवेयर एरर´ के चलते चुनाव जीत जाता है। सन् 2007 में मार्क कॉगिन्स ने `रन ऑफ´ नामक एक उपन्यास लिखा है। यह उपन्यास सैन फ्रांसिस्को के मेयर चुनावों के बारे में है। उपन्यास में एक चीनी महिला व्यवसायी सॉफ्टवेयर के माध्यम से चुनाव परिणाम बदलवाती है। तमाम लोगों का मानना है कि उक्त उपन्यास 2003 के सैन फ्रांसिस्को के मेयर चुनावों के आधार पर लिखा गया है। `एचबीओ´ चैनल पर 2006 में एक डाक्यूमेंट्री दिखाई थी `हैकिंग डेमोक्रेसी´। इस डॉक्यूमेंट्रीय में सन् 2000 और 2004 के अमेरिकी चुनावों में ईवीएम मशीनों के माध्यम से किए गए फर्जीवाड़े का फिल्मांकन किया गया था। 2008 में भी इस विषय पर `अनकाउंटेड´ नामक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनी थी।

कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रूस श्नीयर ने तो ईवीएम के माध्यम से फर्जीवाड़े पर कई लेख लिखे हैं। ईवीएम की गड़बड़ियों के संदर्भ में उन्होंने अमेरिकी चुनाव के कई उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। मसलन- 1. 2003 में फेयरफैक्स काउंटी विर्जीनिया में ईवीएम के प्रोग्रामिंग एरर के चलते एक उम्मीदवार के खाते से 100 वोट कम हो गए थे। 2. आइवोआ की बून काउंटी में 2003 के म्युनिसिपल चुनाव में कुल 1,40,000 वोट ईवीएम ने दर्ज किए। जबकि उस काउंटी में कुल 50,000 मतदाता ही मौजूद थे। 3. सन् 2001 में कैलिफानिZया में सैन बर्नर्डिनो काउंटी में 33 केंद्रों पर वोट ही नहीं पड़े। गलती ईवीएम की प्रोग्रामिंग में थी। 4. सन् 2000 में फ्लोरिडा की वोलुसिया काउंटी में अल-गोर को अंतिम गणना में 16022 निगेटिव वोट पड़ गए थे। यह पूरी तरह ईवीएम का कमाल था।

पश्चिमी देशों का मतदाता भारत के मतदाता की तुलना में अधिक जागरूक और शिक्षित है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग के मामले में भी उनका ज्ञान भारतीयों से बेहतर है। बावजूद इसके पश्चिम का मतदाता ईवीएम की बजाय `बैलेट पेपर´ पर विश्वास करता है। जिस देश में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को तमाम विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद दागी छवि को नजरअंदाज कर बैठाया जाए वहां निर्वाचन प्रक्रिया में हेराफेरी होना आसान है। ईवीएम मशीनों का निर्माण आयुध इकाई भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसिल) में होता है। क्या ईवीएम की प्रोग्रामिंग भी यहीं संस्थान करते हैं? उनके हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आपूर्तिकर्ता कौन है? इन मशीनों में उम्मीदवारों की सूची `प्रोग्राम´ करने का ठेका किसे मिला था?

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संजय बेंगाणी on 27 May, 2009 02:12;38
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मशीनों में गड़बड़ी का शक बहुत खतरनाक है. गड़बड़ करना मुश्किल नहीं, इसलिए आयोग को शंका का समाधान करना चाहिए.
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Tyagi on 27 May, 2009 02:46;43
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प्रश्न तो अपने सही उठाया परन्तु इस प्रशन को जयललित या मायावती या फिर बीजेपी को उठाना चाहिय. दूसरा हमे एक बात जो समझ नहीं आती की सारी मीडिया इसको लोकतंत्र की जीत कैसे बता सकती है जबकि सरदार मनमोहन सिंह इस से डरते हैं.
रही आयोगों की बात तो जो सर्कार आज तक नेता जी या मुखर्जी या दीन दयाल जी या शास्त्री जी की मृत्यु का पता नहीं लगा पाए वो यंहा पर आयोग बिठा कर क्या कर लेगी . यहाँ तो भाई राजीव गाँधी और इन्द्र गाँधी का ही केस चलेगा और उन्ही के हत्यारे दण्डित किया जायेंगे. बाकि तो कुते बिल्ली ही हैं.
इसलिय भाड़ में गई आपकी चुनाव मशीन . कुछ बिगड़ सकते हो तो बिगाड़ लो जब -
अपनी मनपसंद का राष्ट्रपति बना सकती है
जब अपनी पसंद का चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकती है.
खुद (बिना चुनावो के) प्रधानमंत्री थोप सकती है. और अंधी मीडिया इसे लोकतंत्र की जीत बताती है.
खुद इटली से आकर बिना भाषा समझे देश की सर्वशक्तिमान पदाधिकारी बन सकती है.
तो इसे में चुनाव मशीन ठीक हो या गलत क्या फरक पड़ता है.
हम तो एक काल कोठरी में रहेते हैं और दुःख इस बात का हैं की इसे सब सोने का महल कहेते हैं.
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RAJKUMAR SINGH on 27 May, 2009 05:04;12
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प्रेम शुक्ल जी मैं भी राजनीती का विनम्र विद्यार्थी हूँ . और इस विषय पे जो सूचना दी है आपने उससे वाकिफ हूँ , सहमत नहीं हूँ .
मैंने भी उपरोक्त सन्दर्भों से खुद को अच्छी तरह वाकिफ किया है और २००० के अमेरिकी चुनाव में eleक्ट्रानिक्स उद्योग दोनों ने बहुत ही गहराई से विवेचन भी किया और बहस भी हुयी . उससे भी वाकिफ हूँ .




आपके मशीन की खामी के समर्थन में और भी तथ्य हैं पर उनका विवरण जरूरी नहीं , आपने काफी कुछ कह दिया है .
हाँ इन संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता


नियुक्त किया गया .खास कर जिन नविन चावला को जिस तरह से नियुक्त किया गया .

लेकिन मुंबई के सान्दर्भ में इबारतें दीवार पे लिखी साफ़ दिखाई देती हैं . बता दूं की मैं भी जन्मजात मुम्बईकर हूँ और 'संयुक्त

महाराष्ट्र समिति ' और उसके आन्दोलन से , अब तक
मुंबई की राजनीती समझने का मौका पाया है और वह भी जमीनी सच्चाई से .

कार्यकर्ता की हैसियत से कई चुनाओं में इसी तरह का हिस्सा लिया और मेरा ख्याल है की बाहर रह कर भी चुनाओं के समय संयोग से मैं मुम्बई में रहा .जब फ़र्नान्डिस अपना पहला चुनाव (म्योनिस्पलिती का) लड़े , तब मैंने उनके पोस्टर लगाये एक कार्यकर्ता की हैसियत से .

जो आंकड़े हैं उन्हें देखें ध्यान से बात साफ हो जायेगी . मैं नहीं समझता की ऐसी कोई बात है या शंका की गुंजाईश है मुंबई के नतीजों में .

सच्चाई तो यह है की दो सालों में मराठी आतंकवाद ने जो भय निर्माण किया , उसके चलते गैर मराठी वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रस के पक्छ में हुआ और सेना भाजपा के वोट बिखरे . नतीजे कुछ भी चौकाने वाले नहीं थे , और वह सही वोटों को दर्शाते हैं .
यहाँ तक की पिछले सालों से जों मुस्लिम वोट सपा को जाते थे वे भी मुस्लिम रन निति के तहत कांग्रस को गए . गैर मराठी वोटों का ध्रुवीकरण भी कांग्रेस के पक्छ में गया जों शिव सेना भाजपा युति के खिलाफ इसलिए गया की इन्होने बातूनी सहानुभूति के अलावा , वह भी झूठी , उत्तरभारतीयों के लिए कुछ भी नहीं किया उस भय की हालत में . गैर मराठियों के लिए जों घृणा सेना और मनसे सहित 'मराठी मानुस' ने समय समय पे पिछले कई दशकों से दिखाई और जिस तरह से भाजपा सहित , मनसे kee खुली गुंडागर्दी के खिलाफ कुछ नहीं किया ,वह 'शालीन' मराठी मन सहित युति के खिलाफ गया .

दुर्भाग्य से कांग्रस जों इस कुकर्म की सब से बड़ी जिम्मेदार थी और भीतर से वह भी इस गुंडागर्दी की
सहयोगी थी (क्यूंकि उसे शेष महाराष्ट्र में मराठी मन के साथ दिखना था ) वह फायदा ले गयी .यह भी ध्यान में आया होगा की इतना कम वोट मुंबई में शायद ही किसी चुनाव में पड़ा हो , दशकों से .
कृपाशंकर सिंह ने अर्ध सत्य कहा की यह उत्तर भारतीयों का 'बदला' था . सच तो यह है की यह बहुजन 'मुम्बईकर' का फैसला था जों ऐसी घ्रिनापरक राजनीती से नफ़रत करता है और ज्यादा ' गैर मराठी ' है . वरना आतंकवाद के खिलाफ वह भाजपा के साथ खडा होता , भले ही वह सेना के साथ
ही क्यूं न खडी होती . ऐसा पहले हो भी चुका है .
यिस आतंरिक आतंकवाद को उसने बाह्य आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक पाया , या कांग्रेस और युति दोनों की भूमिका से उदास रहा .

और सच्चाई यह है की युति भी देर से समझ पाई इसे , तब तक तो बहुत ही देर हो चुकी थी .

तो यह मशीन नहीं 'मन' का मामला है .
मुम्बईकर के 'मन' का .


आगे मुंबई में और भी बुरे दिन हैं युति के लिए . भले बैलट पेपर से ही या चाहे जिस तरीके से चुनाव हों . क्यों की अब मुद्दा यह है की मुंबई किस की है ?

मुम्बईकर की या शिवाजी के पवित्र झंडे के नीचे दुकान खोले 'गुंडों ' की !

मुझे खुद मुम्बईकर के निर्णय से दुःख हुआ है पर मुंबई के पास चारा ही क्या था ?

जय हिंद !
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abhishek on 27 May, 2009 21:56;46
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EVM main gadbadi ho sakti hai.
MP ke mandla main ek polling booth per ek EVM main sare vote bjp ko ja rahe the .
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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