गोविन्दम शरणम गच्छामि
2 जून को भाजपा के बनारस कार्यालय में कलराज मिश्र प्रेस से बात कर रहे थे. अचानक वहां अफरा-तफरी मच गयी. चारो ओर कोलाहल गूंजा- गोविन्द जी आये है, गोविन्द जी आये हैं. प्रदेश कार्यालय में मौजूद सारे कार्यकर्ता उनको लेने पहुंचे. आनंद और अफरातफरी के इस माहौल में कलराज मिश्र की प्रेस कांफ्रेस पीछे छूट गयी. गोविन्द जी आये, मिठाई खाई और वापस चले गये. नौ साल बाद गोविन्दाचार्य का इस तरह बनारस भाजपा कार्यालय में प्रवेश न तो अचानक है और न ही अनायस. जो कुछ हुआ है उसके पीछे संघ के कुछ आला नेताओं की मर्जी है जो अब भाजपा के पतन को उत्थान में बदलने की मंशा रखते हैं.
बनारस के भाजपा कार्यालय में कदम रखने से पहले गोविन्दाचार्य सरसंघचालक सहित आरएसएस के कई शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं. इस बारे में पूछे जाने पर गोविन्दाचार्य कहते हैं "अध्ययन अवकाश पर जाने के बाद भी मैं लगातार संघ के संपर्क में रहा हूं. एक वक्त आया था जब मैंने तत्कालीन सह-सरकार्यवाह मदनदास को कह दिया था कि अब मैं संघ का प्रचारक नहीं हूं इसलिए अपने बारे में योजना मैं खुद बनाऊंगा लेकिन मैं जो कुछ करूंगा उसके बारे में संघ नेतृत्व को बताता रहूंगा. और मैंने यही किया है." अपने कार्य को बताने के इसी क्रम में वे लगातार संघ के शीर्ष नेतृत्व से मिलते रहे हैं और चिंतन, पहल और प्रयोग के अपने काम से उन्हें अवगत कराते रहे हैं. पंद्रहवीं लोकसभा के परिणाम आने के बाद भाजपा और संघ दोनों ही जगह गतिविधियां बहुत बढ़ गयी हैं. संघ का आला नेतृत्व लगातार बैठकें कर रहा है और भाजपा के आला नेताओं से भी विचार-विमर्श की प्रक्रिया बहुत तेज हो गयी है. इसी क्रम में संघ के शीर्ष नेतृत्व ने गोविन्दाचार्य से भी मुलाकात की. सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने कटक में गोविन्दाचार्य से मुलाकत की और लंबी बात की. गोविन्दाचार्य का भाजपा के बनारस कार्यालय में नौ साल बाद प्रवेश उसी मुलाकात के बाद हुआ है. 
तो क्या गोविन्दाचार्य के भाजपा में वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गयी है? अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. खुद गोविन्दाचार्य मानते हैं "अब सवाल किसी दल या व्यक्ति विशेष का नहीं है. पंद्रहवीं लोकसभा के नतीजों के बाद बड़ा सवाल देश में गैर-कांग्रेसवाद के खात्मे का है. इस बार चुनाव में भाजपा की सीट और मत प्रतिशत दोनों में कमी आयी है. ऐसे में वक्त का तकाजा है कि हम किसी दल के उत्थान पतन को उस दल की बजाय देश के नजरिये से देखें." पंद्रहवीं लोकसभा नतीजों के बाद देश में गैरकांग्रेसवाद का लगभग सफाया हो चुका है. गैरकांग्रेसवाद का समाजवादी विकल्प तो कमजोर हुआ ही है वामपंथी पार्टियां भी हाशिये पर गयी हैं. चुनाव से पहले प्रकाश कारत जिस गैर-कांग्रेसवाद का ढोल पीट रहे थे परिणाम आते ही वह ढोल बुरी तरह से फट गया. मायावती को सबसे मजबूत धुरी मानकर आगे बढ़ रहे प्रकाश कारत को तब बड़ा झटका लगा जब मायावती ने बिना मांगे कांग्रेस को अपना समर्थन सौंप दिया. दक्षिण में करूणानिधि मजबूत न बने रहते तो जयललिता भी अब तक कांग्रेस के पाले में बैठी नजर आती. मुलायम सिंह यादव की अब अपनी कोई राजनीति बची नहीं है. उनकी जो कुछ राजनीति है वह अमर सिंह के व्यावसायिक दृष्टिकोण के भरोसे है. बिहार में लालू पासवान भी मान चुके हैं कि अब कांग्रेस साथ रहकर ही वे अपना राजनीतिक अस्तित्व बचा सकते हैं. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से विरोध कर तृणमूल कांग्रेस बनानेवाली ममता बनर्जी भी मान चुकी हैं कि प्रदेश में वामपंथी शासन को खत्म करने के लिए भाजपा की बजाय कांग्रेस ज्यादा विश्वसनीय सहयोगी है. इस बार के चुनाव परिणामों के बाद यह बात और मजबूत हुई है.
सवाल यह है कि क्या गोविन्दाचार्य भाजपा के अगले अध्यक्ष बनने जा रहे हैं? फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता है. संघ नेतृत्व इस प्रयास में है कि भाजपा पर पकड़ रखने के लिए अब तक की परंपरागत रणनीति में बदलाव किया जाए. अभी तक संघ अपने प्रचारक भाजपा को देता रहा है जिसका परिणाम अच्छा नहीं आया है. अब नयी रणनीति बनाने की कवायद चल रही है. फिलहाल जो संकेत हैं वो यह कि अगले अध्यक्ष के निर्वाचन के पहले भाजपा को गुटविहीन करके संगठित किया जाए. भाजपा के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए विचारधारा की पटरी पर गाड़ी को वापस लाया जाए और एक उदार हिन्दूवादी राजनीति का विकल्प देश के सामने प्रस्तुत किया जाए. गोविन्दाचार्य इस पूरी प्रक्रिया में शामिल होते दिखाई तो देते हैं लेकिन अभी भी उनकी स्पष्ट भूमिका निर्धारित होना बाकी है.चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस जिस तरह से व्यवहार कर रही है उसका साफ संकेत है कि वे एक बार फिर सत्ता के स्थाई दावेदार हो चुके हैं. कांग्रेस के समर्थक पत्रकार भी मानते हैं कि देश में छोटे दलों का अस्तित्व खत्म हो रहा है और उस खाली जगह को कांग्रेस ही भरेगी. इसके पीछे का तर्क साफ है. कांग्रेस के ही मतदाताओं ने नयी-नयी पार्टियों को जगह दी थी अब कांग्रेस उनसे वह जगह वापस ले रही है. ऐसे में सिर्फ समाजवादी आंदोलन से निकले लोग, वामपंथी या फिर भाजपा ही असली गैर-कांग्रेसवाद के वाहक नजर आते हैं. छोटे दलों के दलदल से मुक्ति पाने के लिए ही इस विचार को भी मौका मिल गया था कि अगर परिस्थितियां बहुत जटिल हो जाएं तो देश के दो शीर्ष दलों भाजपा और कांग्रेस को मिलकर सरकार बनानी चाहिए. हालांकि यह बहुत अव्यावहारिक और लोकतांत्रिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करनेवाला विचार है फिर भी छोटे दलों के मोलतोल की राजनीति से मुक्ति पाने के लिए इस विचार को भी सामने रखा गया था. खुद गोविन्दाचार्य भी यह बात बोल चुके हैं. लेकिन जब उनसे गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति पर सवाल करिए तो वे कहते हैं "आज की बड़ी जरूरत वही है. और जब हम गैर-कांग्रेसवाद की बात करें तो इस बात का ध्यान रखें कि गैर-कांग्रेसवाद का मतलब सिर्फ उनके नेता के सामने अपना नेता प्रोजेक्ट कर देना ही गैर-कांग्रेसवाद नहीं होगा. हम भाजपा को भगवा कांग्रेस बनाकर कांग्रेस का विकल्प नहीं खड़ा कर सकते." गोविन्दाचार्य मानते हैं कि जनसंघ के बाद भाजपा के रूप में जो राजनीतिक प्रयोग हुआ उसके मूल में यही है कि हम आलाकमान की शैली में ही कांग्रेस का विकल्प खड़ा कर सकते हैं. यह प्रयोग कुछ साल की सरकार तो दे सकता है लेकिन देश की राजनीति में स्थाई विकल्प खड़ा नहीं कर सकता. भाजपा का उत्थान और पतन इस बात का सीधा प्रमाण है.
असल में संघ के नेताओं की भाजपा पर कोई खास पकड़ नहीं रही है. भाजपा के पास अटल और आडवाणी जैसे विशाल व्यक्तित्व थे इसलिए उसने यह मान लिया था कि विचारधारा की राजनीति एक धीमी प्रक्रिया है और इतना लंबा इंतजार करना संभव नहीं है. लेकिन इस रास्ते बहुत लंबा चलना संभव नहीं है यह भी अब साफ हो गया है. ऐसे में आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को एक बार फिर अपने पूरे राजनीतिक प्रयोग पर पुनर्विचार करने की सूझ रही है. तो क्या भाजपा को भंग करके नयी राजनीतिक ईकाई बनायी जाएगी? गोविन्दाचार्य कहते हैं "जनता पार्टी से जनसंघ और वहां से भाजपा की यात्रा में सकारात्मक हिन्दुत्व की राजनीति वहां पहुंच गयी है जहां एक बार फिर नये प्रयोग करने की करने की जरूरत है जिसमें पहले की गयी गलतियों को ठीक किया जाए. आंतरिक गुटबाजी करने की बजाय वाह्य दलबंदी करनी होगी ताकि देश की जनता को गैर कांग्रेसवाद का स्थाई विकल्प मिल सके. संघ एक बार फिर अगर गोविन्दाचार्य को वापसी का संदेश दे रहा है तो इसके पीछे का बड़ा मकसद यही है.
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सब से ज्यादा शुभ यह है कि कांग्रस और भाजपा में ध्रुवीकरण हो , दो राष्ट्रिय ध्रुव हों ,और भविष्य में आम सहमति हो कि राष्ट्रिय हित क्या हों जो सर्वोपरि हों और बाध्यकारी भी .कामन एजेंडा .
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