अहिंसा की वर्णमाला
अहिंसा शब्द नकारात्मक है. अहिंसा का साधक तत्व है समतायोग. यह समतायोग अथवा साम्ययोग धर्म का मूल तत्व है. प्रकृति की दृष्टि से विचार करने पर इस सच्चाई को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए कि हिंसा प्राणी के जीवनशैली के साथ जुड़ी हुई है. अहिंसा मानवीय चेतना का सर्वो्त्तम विकास है. उस विकास के लिए हिंसा के दो रूपों पर विचार किया गया है. एक अनिवार्य हिंसा और दो, वार्य हिंसा.
जीवन में अनिवार्य कोटि की हिंसा तो है ही. प्रमादजनित हिंसा, कलह, संघर्ष तथा युद्ध और शस्त्र निर्माण के लिए होनेवाली हिंसा वार्य हिंसा है. शांति के लिए जरूरी है कि हम वार्य हिंसा को रोकने के उपाय खोजें. वार्य हिंसा के मूल कारण है- पदार्थ के प्रति आकर्षण, प्रभुसत्ता स्थापित करने की मानसिकता, सबसे बड़ा बनने की महत्वाकांक्षा, सुविधावादी और अमीरी का दृष्टिकोण, क्रोध और अहंकार का आवेश. इसका परिष्कार किये बिना शांति की संस्कृति का सपना, सपना ही रहता है. हिंसा के स्थान पर अहिंसा, अशांति के स्थान पर शांति की स्थापना के लिए द्विआयामी प्रयत्न करने जरूरी हैं. एक ओर परिस्थिति बदलने का प्रयास, दूसरी ओर अंतःकरण में विद्यमान हिंसा और अशांति के मूल कारण के परिष्कार का प्रयत्न.
भगवान महावीर के द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत का प्राणतत्व है संयम. भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत का प्राणतत्व है करूणा. गीता के अहिंसा सिद्धांत का प्राणत्तव है अनाशक्ति. महाप्रभु ईसा ने मैत्री के सिद्धांत को बहुत प्रतिष्ठित किया है. मोहम्मद साहब ने भाईचारे की प्रतिष्ठा की. महावीर की अहिंसा के आधार पर महाव्रती और व्रती समाज की संरचना हुई जिसने मानवीय एकता का दृढ़ता के साथ प्रतिपादन किया. सांप्रदायिक मतभेदों में अनेकांत के द्वारा समन्वय स्थापित किया. व्रती समाज गृहस्थ वर्ग था. उसने अनावश्यक और आक्रामक हिंसा का परित्याग किया. बुद्ध की करूणा के आधार पर जातिवाद की दृढ़ता के साथ प्रतिवाद किया. अनाशक्ति की साधना के लिए हजारों-हजार व्यक्तियों ने अपना समर्पण किया. सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, हृदय परिवर्तन और साध्य साधन शुद्धि के बिना महात्मा गांधी के अहिंसा की व्याख्या नहीं की जा सकती. अहिंसा की व्यापकता अनेक सिद्धांत सूत्रों और उनके व्यावहारिक प्रयोगों में देखी जा सकती है.
वर्तमान में हिंसा की समस्या अधिक जटिल हो गयी है. अहिंसा के सिद्धांत व्यावहारिक प्रयोग काफी महत्वपूर्ण हैं. सभी धर्म मनीषियों ने उनके महत्व का प्रतिपादन किया है फिर भी हिंसा अधिक प्रभावी हो रही है. इसका एक प्रमुख हेतु है अहिंसा के व्यावहारिक प्रयोगों का प्रशिक्षण नहीं हो रहा है. हिंसक उपकरणों के लिए जितने प्रशिक्षण की व्यवस्था है उसके अल्पांश में भी अहिंसा के प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है. उसके बिना अहिंसा को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता. हिंसा का मूल कारण वृत्तियां हैं. भाव हैं. उनका परिष्कार किये बिना अहिंसा को जीवंत नहीं बनाया जा सकता. संघर्ष और पारस्परिक कलह का इतिहास बहुत पुराना है. समय-समय पर संघर्ष की परिस्थितियां बदली हैं, कारण बदले हैं लेकिन मूल कारण नहीं बदला है. परिस्थिति की एक चिंगारी वृत्ति को उत्तेजित कर देती है और उत्तेजित वृत्ति परिस्थिति को और जटिल बना देती है. ऐसे में यह सवाल भी सरल नहीं है कि पहले कौन बदले? परिस्थिति बदले या अंतरवृत्ति बदले. परिस्थिति के बदलने में बाधा है अंतर की वृत्ति और अंदर की वृत्ति बदलने में परिस्थियां बाधा दिखाई देती हैं. इस चक्कर को कैसे तोड़ा जाए? आज जितने भी प्रयोग हो रहे हैं उनमें से कोई भी अहिंसक शक्ति के रूप में विश्व मानस को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं. शिक्षा के साथ अहिंसा के प्रशिक्षण को जोड़े बिना उसे विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता.
हिंसक अस्त्र शस्त्रों की संहारक शक्ति बढ़ाने मात्र से हिंसा सफल नहीं होती. उसकी सफलता हिंसक के मन में क्रूरता पैदा करने पर निर्भर है. युद्ध संघर्ष, आतंकवाद और उग्रवाद को क्रूरता से अलग करके नहीं देखा जा सकता. अहिंसा की सफलता के लिए मनुष्य के मन में मैत्री, करूणा, प्राणी जगत की एकता की अनुभूति उत्पन्न करना जरूरी है. यह कार्य प्रशिक्षण और प्रयोग के द्वारा संभव है. इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रयोग नहीं हो रहा है. केवल हिंसा के निमित्तों से बचने के प्रयोग किये जा रहे हैं. अहिंसा के प्रशिक्षण की प्रक्रिया उभयात्मक होनी चाहिए. उसमें सिद्धांत और प्रयोग दोनों का संतुलन होना चाहिए. सिंद्धांत के द्वारा मस्तिष्क का एक भाग प्रभावित होता है. प्रयोग के द्वारा मस्तिष्क का दूसरा भाग प्रभावित होता है. वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करने पर निष्कर्ष सामने आता है कि दिमाग का सिद्धांतग्राही भाग अहिंसा से प्रभावित है. उसका दूसरा भाग जो अहिंसा को आत्मसात कर सकता है, प्रभावित नहीं है. इसलिए अहिंसा के क्षेत्र में किये जानेवाले प्रयोग व्यापक नहीं बन रहे हैं.
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prakash chandalia
editor-Rashtriya Mahanagar
mahanagarindia@gmail.com
yug vaisa ka vaisa hai, to kaisa yugpurush???
Dharmik jagat ke glamour...chamak upar-upar...nice ki kaun jane???
cahen to yah prashn karen unase....
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