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गांधी जी ने कहा था- करेंगे या मरेंगे

image 9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने लिखा था- करेंगे या मरेंगे

9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने क्या कहा था? 'करो या मरो' या फिर 'करेंगे या मरेंगे'. 'करो या मरो' और करेंगे या मरेंगे में केवल भाषा का ही नहीं भाव का भी फर्क है. 9 अगस्त की सुबह पांच बजे अपनी गिरफ्तारी से ठीक पहले देश के नाम दिये गये संदेश के नीचे गांधी जी ने हाथ से हिन्दी में लिखा था- करेंगे या मरेंगे. गांधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र कहते हैं "लेकिन 1942 से लेकर आज तक हम करेंगे या मरेंगे को करो या मरो जैसा आदेशात्मक और कठोर अनुवाद चलाते आ रहे हैं."

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दो भाषण दिये थे. ये दोनों भाषण हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में थे. गांधी जी के इन दो भाषणों का संपूर्ण गांधी वांग्मय में संकलन हुआ उसमें गांधी जी के हिन्दी वाले अंश को भी अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया गया. हालांकि यह भाषण कलकत्ता के गुप्तचर विभाग के उप महानिरीक्षक कार्यालय में उपलब्ध दस्तावेजों से लिया गया है फिर भी भाषण की मूल प्रतिलिपि कहीं मौजूद नहीं है. जो कुछ मौजूद है वह है 9 अगस्त का गांधी जी द्वारा हाथ से लिखा गया वह नोट जो अंग्रेजी में था लेकिन उसके नीचे हाथ से हिन्दी में लिखा है- करेंगे या मरेगें.

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी द्वारा दिये गये भाषण का अंश-vishesh01.jpg

पिछले 20 वर्षों से हम यही सीखने की कोशिश करते आये हैं कि हमारे समर्थकों की संख्या बहुत कम हो और लोग हमारी हंसी उड़ाये, तब भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. हमने अपने विश्वासों पर दृढ़ रहना सीखा है- यह मानते हुए कि हमारे विश्वास ठीक हैं............कांग्रेस को अपने फैसले मनवाने के लिए नैतिक अधिकार के सिवाय कोई अधिकार नहीं है. कांग्रेस का विश्वास है कि सच्चा लोकतंत्र अहिंसा से ही स्थापित हो सकता है. विश्व संघ की इमारत अहिंसा की नींव पर ही खड़ी की जा सकती है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में हिंसा का त्याग करना सर्वथा जरूरी है.

अगर यह सच है तो हिन्दू मुस्लिम सवाल भी हिंसा के द्वारा हल नहीं किया जा सकता. अगर हिन्दू मुसलमानों पर अत्याचार करें तो वे किस मुंह से विश्व संघ की बात कर सकते हैं? इसी कारण मैं अंग्रेज और अमेरिकी राजनीतिज्ञों की भांति हिंसा के द्वारा विश्व शांति की स्थापना की संभावना में विश्वास नहीं रखता..............एक सजीव वस्तु के टुकड़े करने की मांग करना उसकी जान मांगना है. यह तो लड़ाई की ललकार है. कांग्रेस ऐसी लड़ाई में शामिल नहीं हो सकती जिसमें भाई भाई को मारे. हो सकता है डॉ मुंजे और श्री सावरकर की तरह तलवार के सिद्धांत को माननेवाले हिन्दू मुसलमानों को अपने अधीन रखना चाहें. मैं उस वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता.

9 अगस्त 1942 को अपनी गिरफ्तारी से पूर्व सुबह पांच बजे गांधी जी ने एक छोटा सा नोट लिखा था जिसमें उन्होंने हिन्दी में हाथ से लिखा था- करेंगे या मरेंगे. नोट इस प्रकार है- "हर व्यक्ति को इस बात की खुली छूट है कि वह अहिंसा पर आचरण करते हुए अपना पूरा जोर लगाए. हड़तालों और दूसरे अहिंसक तरीकों से पूरा गतिरोध (पैदा कर दीजिए). सत्याग्रहियों को मरने के लिए न कि जीवित रहने के लिए, घरों से निकलना होगा. उन्हें मौत की तलाश में फिरना चाहिए और मौत का सामना करना चाहिए. जब लोग मरने के लिए घर से निकलेंगे तभी कौम बचेगी. करेंगे या मरेंगे."

मैं आपसे सच कहता हूं कि मेरे लिए यह जिंदगी और मौत का सवाल है. अगर हम हिन्दू और मुसलमान ऐसी दिली एकता स्थापित करना चाहते हैं जिसमें किसी के मन में कहीं कोई दुराव न हो तो हमें पहले इस साम्राज्य की बेड़ियों से आजाद होने के लिए मिलकर कोशिश करनी होगी. अगर अंततः भारत के ही एक हिस्से को पाकिस्तान बनना है तो मुसलमानों को भारत की आजादी में शामिल होने में क्या ऐतराज हो सकता है? इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानों को चाहिए कि वे पहले भारत की आजादी की लड़ाई में इकट्ठे हो जाएं. इसलिए मैं कहता हूं कि अगर हो सके तो आजादी फौरन दे दी जाए- आज रात को ही. कल पौ फटने से पहले ही. अब आजादी के लिए सांप्रदायिक एकता स्थापित होने तक इंतजार नहीं किया जा सकता........और यह मत भूलिएगा कि कांग्रेस जिस आजादी के लिए लड़ रही है वह सिर्फ कांग्रेसियों के लिए ही नहीं होगी बल्कि वह सभी भारत के 40 करोड़ लोगों के लिए होगी. कांग्रेसजनों को सदा जनता के विनीत सेवक बनकर रहना चाहिए.

इस देश में करोड़ो मुसलमान हिन्दुओं के वंशज हैं. उनका वतन भारत के सिवाय दूसरा कोई कैसे हो सकता है? कुछ वर्ष हुए मेरा बड़ा लड़का मुसलमान बन गया. उसकी मातृभूमि क्या होगी? पोरबंदर या पंजाब? मैं मुसलमानों से पूछता हूं कि अगर हिन्दुस्तान आपका वतन नहीं है तो आप किस मुल्क के है? आप मेरे बेटे को किस अलग वतन में रखेंगे जिसने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया है. मेरे बेटे ने अपने दोस्तों को लिखा था कि मुझे उसके मुसलमान बन जाने से ज्यादा उसके शराब पीने से दुख है. क्या नेक मुसलमान होने के नाते आप यह गवारा कर सकते हैं कि वह मुसलमान बनने के बाद भी शराब पीये? शराब पी पी कर वह आवारा और लुच्चा हो गया है. अगर आप उसे फिर से इंसान बना दें तो उसका धर्म बदलना उपयोगी रहेगा.

मुस्लिम लीग और अंग्रेजों द्वारा विरोध किये जाने के कारण इस बार हमें अपने संघर्ष के सिलसिले में बहुत ज्यादा कुर्बानियां करनी पड़ेगीं. आपने सर फ्रेडरिक पकल का गुप्त परिपत्र देखा है. उन्होंने आत्मघाती तरीका अख्तियार किया है. परिपत्र में बरसात में मेंढ़क की भांति पैदा होनेवाली संस्थाओं को खुल्लम-खुल्ला शह दी गयी है कि वे मिलकर कांग्रेस का विरोध करें. इसका मतलब है कि हमें ऐसे साम्राज्य से निपटना है जो सदा टेढ़ी चाल चलता है. हमारा रास्ता सीधा है, जिस पर हम आंखे मूंदकर भी चल सकते हैं. यह सत्याग्रह की खूबी है. सत्याग्रह में धोखे, झूठ और जालसाजी को किसी प्रकार की जगह नहीं है. मैं ऐसी स्थिति में चुपचाप बैठा हुआ देखता नहीं रह सकता. मैं पूरे देश में घूमा हूं और लोगों से उस हद तक एक हो गया जिस हद तक किसी आदमी के लिए ऐसा करना संभव है. मैंने देखा कि वे मुझ पर विश्वास करते हैं और अब मैं झूठ और हिंसा पर खड़े इस साम्राज्यवाद का मुकाबला करने में उनके विश्वास का उपयोग करना चाहता हूं.

साम्राज्य ने चाहे कितनी ही लंबी तैयारी क्यों न कर रखी हो हमें उसके शिकंजे से निकलना है. यह कैसे हो सकता है कि मैं इस महत्वपूर्ण घड़ी में चुप बैठा रहूं और सही रास्ता न दिखाऊं? यह एक छोटा सा मंत्र आपको देता हूं. आप इसे अपने हृदय पटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्वांस के साथ उसका जाप करिए. वह मंत्र है- करेंगे या मरेंगे. या तो हम भारत को आजाद करेंगे या फिर आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे.(सौजन्यः गांधीमार्ग)

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Anunad on 09 August, 2008 17:11;32
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धन्यवाद! पढ़कर बहुत शकुन मिला। कितना कठिन दौर था वह!
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