एटमी समझौते के गुप्त सिपहसालार
परमाणु समझौते को एनएसजी तक मंजूर करवाने में नौकरशाही की बड़ी अहम भूमिका रही है. कल एक टीवी चैनल से बात करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने कहा कि अब वे राहत की सांस ले रहे हैं. जाहिर है एटमी करार के तकनीकि पहलुओं पर लालू और अमर सिंह सरीखे नेताओं के भरोसे कुछ हो भी नहीं सकता था. राहत की सांस लेनेवालों में केवल नारायणन ही नहीं बल्कि कुछ और नौकरशाह भी हैं. जिन्होंने इस विवादास्पद और अमरीकी यूरोपीय व्यापारिक हितों को साधनेवाले समझौतों को अंजाम दिलवाया.
एनएसजी में भारत के मसौदे को मंजूर किये जाने के दो स्पष्ट परिणाम होंगे. पहला, भारत एनपीटी और सीटीबीटी का हस्ताक्षरी न होने के बावजूद न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप का सदस्य हो गया जिसे एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है. अमेिरका में नोम चोमस्की जैसे विद्वानों ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का जो विरोध किया था उसका आधार यही था कि किसी ऐसे देश को अमेरिका एनएसजी में कैसे शामिल कर सकता है जो दुनिया की इन दो महत्वपूर्ण संधियों से बाहर है. पूरी भारतीय नौकरशाही और परमाणु समझौते के पक्षधर लोगों के पास यही एक सबसे मजबूत तर्क था कि अमेरिका भारत को कितना महत्व दे रहा है ऐसे में भारत को हर हाल में असैनिक परमाणु समझौते को लागू कर देना चाहिए. जब परमाणु समझौते के मुद्दे पर बहुमत पाकर प्रधानमंत्री संसद से बाहर निकलकर पत्रकारों से बात कर रहे थे उनके पीछे और कोई नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन खड़े थे. संदेश साफ था. यह नौकरशाही का परमाणु समझौता है. हमारी नौकरशाही अमेरिका और यूरोप के कितने प्रभाव में है यह बताने की जरूरत नहीं है.
लेकिन सवाल केवल अमेरिका और यूरोप के प्रभाव का ही नहीं है. अब भारतीय राजनीतिज्ञ और नौकरशाही अपने देश के व्यावसायिक घरानों के लाबियिस्ट के तौर पर व्यवहार करते हैं. परमाणु समझौता पूरी तरह से व्यावसायिक घरानों के लिए किया गया है जो आगे बिजली के बड़े संयत्र लगायेंगे. पिछले पखवाड़े ही खबर आयी कि रिलायंस के दोनों धड़े परमाणु बिजली घर लगाने की तैयारियां कर रहे हैं. मुकेश अंबानी फ्रांस की कंपनी से बात कर रहे हैं तो अनिल अंबानी चीन की टरबाईन बनानेवाली कंपनी के साथ समझौते की कोशिश कर रहे हैं. इन दो पूंजीपतियों के अलावा अडनी समूह भी सक्रिय है और वह परमाणु बिजलीघर बनाते समय निकलनेवाले संभावित ठेकों के लिए लाबिंग कर रही है. जाहिर है हमारे नौकरशाह अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर भारत के पूंजीपतियों के प्रतिनिधि बनने में ज्यादा गौरव अनुभव करते हैं. भले ही इसके लिए इंसानियत और पर्यावरण का गला घोंट देना पड़े.
ऐसे गुप्त सिपहसालारों में पहला नाम विदेश सचिव रहे श्याम शरण का है जिन्होंने अपने कार्यकाल में इस करार की नींव रखी थी। वे अब विदेशी मामलों में प्रधानमंत्री के विशेष दूत हैं। पिछले दो महीने से श्याम शरण लगातार हवाई जहाज में है और 45 देशों की राजधानियां घूम कर भारतीय पक्ष समझाते रहे हैं। 1970 बैच के आईएफएस अधिकारी नेपाल, इंडोनेशिया, म्यामांर और मॉरीशस में भारत के राजदूत और उच्चायुक्त रह चुके हैं।
दूसरा नाम अनिल काकोडकर का है। वे जाने माने नाभिकीय वैज्ञानिक हैं और भारत के पहले परमाणु विस्फोट, जो 18 मई 1974 को पोखरण में हुआ था, उस टीम में भी वे थे। इसके बाद मई 1998 में पोखरण में ही हुए पांच परमाणु परीक्षणों की निगरानी भी उन्होंने की थी। फिलहाल श्री काकोडकर भारतीय आणुविक उर्जा आयोग के अध्यक्ष और आणविक उर्जा विभाग के सचिव है। वे भाभा परमाणु शोध केंद्र के निदेशक भी रह चुके हैं। काकोडकर ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के साथ हुई बातचीत में भारतीय दल का नेतृत्व किया था।
इसके बाद भारत के सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन का नाम आता है। वे प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र माने जाते हैं और गुप्तचर ब्यूरो के प्रमुख रह चुके हैं। इस एटमी करार मामले पर श्री नारायणन प्रधानमंत्री के अलावा केंद्रीय मंत्रिमंडल और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के मुख्य सलाहकार रहे हैं। वियना में जब कई देश दादागीरी दिखा रहे थे तो एम के नारायणन ने उन्हें ठीक से समझा दिया था कि इससे भारत का कम और उनका ज्यादा नुकसान होगा।
वर्तमान विदेश सचिव शिवशंकर मेनन की भूमिका भी इस मामले में महत्वपूर्ण रही हैं। चीन और इजराईल में भारत के राजदूत रह चुके श्री मेनन दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में पढ़ाई कर चुके है लेकिन यहां यह भी याद दिलाना होगा कि वे आणविक उर्जा विभाग के सलाहकार भी रह चुके है। संयोग से वे भारत के पहले विदेश सचिव के पी एस मेनन के पोते हैं और इसी नाम के दूसरे अधिकारी और चीन में भारत के राजदूत रह चुके के पी एस मेनन जूनियर के भतीजे हैं। उनके पिता पी एन मेनन भी विदेश सेवा में थे।
इस पूरे मामले में सबसे सक्रिय भूमिका निभाने वाले अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन रातों को जाग कर दस्तावेजों में जरूरी फेरबदल और संदेश पहुंचाने के काम किए हैं और देर रात तक अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ मिल कर बैठके की। ये वही रोनेन हैं जिन्होंने परमाणु करार का विरोध कर रहे राजनीतिज्ञों और पत्रकारों को हेडलेस चिकन कहा था. इस पर बवाल मचा जरूर लेकिन कुछ हुआ नहीं क्योंकि उनकी अमेरिका में राजदूत के तौर पर नियुक्ति करवाने में प्रणव मुखर्जी का बहुत योगदान था. कई मौकों पर वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच संदेशवाहक भी बने हैं। सेन 1986 से 1991 तक प्रधानमंत्री कार्यालय में रक्षा, विज्ञान और तकनीक के सलाहकार भी रह चुके है।
इस सूची में आखिरी और सबसे चौकाने वाला नाम सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त एस जयशंकर का है। वे पहले जब करार पर बातचीत चल रही थी तब विदेश मंत्रालय में अमेरिका के प्रभारी हुआ करते थे। श्याम शरण के विश्वासपात्र श्री जयशंकर ने वाशिंगटन की पांच महीनों में 11 यात्राएं की और हर यात्रा में एक लाइन में अमेरिका को समझा दिया कि भारत उस करार से कतई अलग नहीं होने वाला है जो हो चुका है लेकिन करार से जुड़ी को बंदिश भारत स्वीकार नहीं करेगा।
हां, ऐसे अमेरिका परस्त माहौल में रक्षा मंत्री ए के एंटनी सरीखे कुछ नेता जरूर उम्मीद बंधाते हैं जो लोकप्रियतावादी और इतिहास मेंंदर्ज होने वाले काम करने की जल्दी में नहीं हैं। वे आज वाशिंगटन पहुंच गए और रक्षा मंत्री की हैसियत से यह उनकी पहली अमेरिका यात्रा है। जाने के पहले ही उन्होंने कह दिया कि वे किसी भी समझौते पर दस्तखत करने नहीं जा रहे है और उनकी यात्रा सिर्फ इस बात के लिए है कि वे अमेरिका को इस बात के लिए बाध्य करें कि वह अपनी सेना की गतिविधियों की निगरानी भारतीय विशेषज्ञ दल को करने दें।
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