पाक से पहली लड़ाई में परास्त
मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पहले दौर का जो कूटनीतिक युद्ध शुरू हुआ था, उसमें भारत लगभग हार गया है. सामरिक भूमि में पाकिस्तान कहां ठहरता है यह तो बाद की बात है लेकिन आज की कूटनीतिक परिस्थितियों में पाकिस्तान अपने नौसिखिए नेताओं के भरोसे भी भारत पर हावी दिखाई देता है. यह भारत के राजनेताओं की ही नहीं बल्कि यहां के कूटनीतिज्ञों की भयावह हार है. मुंबई हमले से पहले खुफिया एजंसियों की नाकामयाबी सामने आयी थी तो हमले के बाद भारत का कूटनीतिक वर्ग पाकिस्तान के सामने बुरी तरह परास्त हो गया है.
मुंबई पर आतंकी हमले से चार-पांच दिन पहले ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने प्रेस से बात करते हुए कहा था कि किसी भी परिस्थिति में वे भारत पर पहले परमाणु हमला नहीं करेंगे. अचानक इतनी बड़ी बात कहने का वह कोई मौका नहीं था. छोटी खबरें बनी और बात रफा-दफा हो गयी. लेकिन उसके थोड़े ही दिनों बाद मुंबई पर आतंकी हमला हो जाता है. तब भी हमने उस बयान को याद करने की कोशिश नहीं की कि जरदारी के इस बयान के मायने क्या हैं? क्या जरदारी को पता था कि दहशतगर्द भारत में ऐसा कुछ बड़ा हादसा करनेवाले हैं जिसके परिणामस्वरूप युद्ध भड़क सकता है? अगर ऐसा नहीं था तो उन्होंने परमाणु हमले जैसे संवेदनशील मसले पर अचानक ही अपनी राय क्यों रखी थी? २३ दिसंबर को पाकिस्तान के सेना प्रमुख कियानी जरदारी से मिले थे. उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति पर जोर डाला कि वे अपना वह बयान वापस ले लें कि किसी भी परिस्थिति में वे भारत पर पहले परमाणु हमला नहीं करेंगे. उसकी बजाय पाकिस्तान भारत के खिलाफ जो नयी परमाणु नीति घोषित करे वह यह कि ऐसा वे सिर्फ प्रतिरक्षा में करेंगे. यानी, पाकिस्तान को अगर ऐसा लगता है कि उसे भारत से किसी प्रकार का खतरा है तो वह भारत पर परमाणु हमला कर सकता है और ऐसा वह सिर्फ अपनी रक्षा में करेगा.
मुंबई हमले के बाद पहले दौर के कूटनीतिक युद्ध में मजबूत पक्ष रखने के बावजूद भारत परास्त होता दिख रहा है जबकि दोषी होकर भी पाकिस्तान विजेता बन गया है. इतिहास देख लीजिए अभी तक यही होता आया है कि भारत कूटनीतिक स्तर पर हमेशा पाकिस्तान से परास्त हो जाता है. क्या ऐसे में नये सिरे से पाकिस्तान नीति पर पुनर्विचार करने का वक्त नहीं आ गया है?अब आपको जरदारी और पाकिस्तान में लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति समझ में आ जानी चाहिए कि आज भी लोकतांत्रिक सरकार वहां सेना और आईएसआई की कठपुतली मात्र है. अगर जरदारी ने यह कहा कि मुंबई पर जो आतंकी हमला हुआ वह "स्टेटलेस एक्टरों" का काम है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं था. लेकिन भारत के कूटनीतिज्ञों ने पाकिस्तान के प्रति अपनी पुरानी सोच को ही जारी रखा और मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान सरकार को इसके लिए दोषी कहना शुरू कर दिया. जाहिर सी बात है यह भारत के कूटनीतिज्ञों और मीडिया की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक थी. इसका असर यह हुआ कि पाकिस्तान में सेना, सरकार और आतंकी समूह एक हो गये जो कि हकीकत में अभी तक एक दूसरे से लड़ रहे थे. सेना और आईएसआई का कोई अनौपचारिक गठजोड़ है जो सरकार के परे एक स्वतंत्र सरकार की तरह काम करता है. क्योंकि पाकिस्तान में अधिकांश आतंकी संगठनों को आईएसआई का संरक्षण प्राप्त है इसलिए यह सेना आईएसआई और आतंकियों का त्रिकोण बन जाता है. यह त्रिकोण एक तरफ है और दूसरी ओर है तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार जिसका कोई आधार ही नहीं है. अफगानिस्तान के बाद अमेरिका जिस तरह से पाकिस्तान पर अपना शिकंजा कस रहा है उसमें उसकी रणनीति साफ है. वह लोकतांत्रिक सरकार के जरिए पाकिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. क्योंकि कोई नासमझ व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि पाकिस्तान में आईएसआई, सेना और आतंकी संगठन एक ही प्रकार की सोच के अलग-अलग नाम है जिनका आधार भारत और गैर इस्लामिक विरोध है. अमेरिका भी इस बात को समझता है इसलिए उसकी रणनीति ज्यादा कारगर है कि उसने लोकतांत्रिक सरकार का उपयोग करके सेना, आईएसआई और आतंकी संगठनों को एक दूसरे के खिलाफ कर दिया था. जिस सेना और आईएसआई ने आतंकी संगठनों को जन्म दिया था वही नार्थ वेस्ट फ्रंटियर पर उनके खिलाफ लड़ रहे थे. क्या हो भारत की कूटनीति? भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर पाकिस्तान की जमीन पर आतंकवाद को समाप्त करने के लिए लंबी अवधि के उपाय करे. अगर भारत चाहता है कि वह नित्यप्रति के युद्ध से बचे तो वह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को मजबूत करने के उपायों पर काम करे. पाकिस्तानी सेना से लड़ने की बजाय हमें इस बारे में लंबी अवधि के उपाय करने होंगे कि पाकिस्तानी सेना कैसे वहां की लोकतांत्रिक सरकारों के अधीन रहे. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान वह पाकिस्तान नहीं है जब वहां १९७१ की पराजय के बाद भारत के खिलाफ लड़ने के लिए आतंकवाद की पौध तैयार की जा रही थी. आज का पाकिस्तान वह पाकिस्तान है जहां आतंक की ऐसी विषबेल तैयार हुई है जो पाकिस्तान का ही गला घोंट रही है. इस विषबेल को काटने में हमें पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार की मदद करनी चाहिए. हमें यह तय करना होगा कि हमें पाकिस्तान से लड़ना है या पाकिस्तान की कट्टरपंथी ताकतों से जो कि पाकिस्तानी आवाम के लिए भी सिरदर्द बने हुए हैं.
लेकिन मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत की कूटनीतिक मूर्खताओं के कारण भारत ने उन तीनों शक्तियों को एक साथ आने का मौका दे दिया है. तालिबान के पाकिस्तान प्रमुख बैतुल्लाह थोड़े दिनों पहले तक "इंशाअल्लाह पेशावर और अन्य शहरों पर कब्जा कर लेगें" के वीडियो टेप जारी कर रहे थे. लेिकन २४ दिसंबर को तालिबान के इस आतंकी मुखिया का बयान आया कि भारत से युद्ध होता है तो वह पाकिस्तानी सेना के साथ अपने आत्मघाती हमलावरों को मैदान में उतारेगा. तालिबान ही नहीं, पहले तो लश्कर-ए-तैयबा ने इस बात से ही इंकार किया कि वह मुंबई हमलों में शामिल है लेकिन थोड़े ही दिनों बाद लश्कर के प्रमुख हाफिज सईद ने बयान दे दिया कि भारत के खिलाफ युद्ध में वह पाकिस्तान की सेना के साथ मिलकर मैदान में जंग लड़ेगा. यानी जो आतंकी और पाकिस्तानी सेना आपस में लड़ रहे थे वे सब एकजुट होकर भारत के खिलाफ लड़ने की बात करने लगे. इसका फौरी तौर पर परिणाम यह हुआ कि नार्थ वेस्ट फ्रंण्टियर पर अमेरिकी फौजों के साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना आतंकियों के खिलाफ जो अभियान चला रही थी उसे रोक दिया गया. अगर खबरों पर यकीन करें तो पाकिस्तानी सेना का रूख अब भारतीय सीमा की ओर है. इसका पाकिस्तानी प्रशासन और आतंकवादियों को दोहरा फायदा होगा. सेना को अपने प्रिय आतंकियों के खिलाफ मजबूरी में चलाये जा रहे अभियान को रोकने का बहाना मिल जाएगा और आतंकियों को फिर से संगठित होने का मौका.
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि पाकिस्तान कोई देश नहीं बल्कि एक मानसिकता है जिसकी बुनियाद भारत विरोध पर टिकी है. इस्लामिक कट्टरता इसका मुख्य आधार है. सीमा के दोनों ओर के आम लोगों की बात छोड़ दीजिए लेकिन प्रशासनिक स्तर पर पाकिस्तान आज भी सिर्फ भारत विरोध पर ही अपनी सारी कमियों को छिपाये हुए है. फिर भी जब पाकिस्तान के सामने भारत को दुश्मन के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है तो वहां की सारी बुरी ताकतें एक हो जाती हैं जिसमें आतंकी ही नहीं सेना और आईएसआई भी शामिल है. जाहिर है इन तीनों को मिला दीजिए तो यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है. फिर इस ताकत के सामने किसी लोकतांत्रिक सरकार का कठपुतली से ज्यादा कोई मतलब नहीं है. फिर भी दुनिया में पाकिस्तान का रिप्रेजेन्टेशन ये ताकतें नहीं बल्कि पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार ही करती है. भारत की लोकतांत्रिक सरकार और यहां के कूटनीतिज्ञों के सामने यह स्वर्णिम अवसर था कि विकट परिस्थिति होने के बावजूद हम पाकिस्तान सरकार के साथ मिलकर कोई संयुक्त अभियान शुरू करते. संयुक्त जांच दल बनाने की बात तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति कर ही रहे थे हम उसमें थोड़ा यह भी जोड़ देते कि यह संयुक्त जांच दल संयुक्त रूप से आतंकियों के खिलाफ अभियान भी चलाएगा. अगर भारत के कूटनीतिज्ञों ने यह रूख किया होता तो इसके कई फायदे होते. सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान में आतंकियों और सेना की एकजुटता नहीं हो पाती. पाकिस्तान में घुसकर न केवल हम जांच करते बल्कि एक लंबी योजना बनाकर उन तत्वों को समाप्त करने की कोशिश करते जिससे भारत ही नहीं पाकिस्तान की आम अवाम भी परेशान है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इस्लामाबाद में संसद में खड़े होकर बयान दिया था कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन गरीबी है जिससे हमें लड़ना होगा. दुर्भाग्य से पाकिस्तान के इस खुले प्रस्ताव के बाद भी भारत के कूटनीतिज्ञों ने युद्ध की आहट देना शुरू कर दिया जबकि दोनों ही देश जानते हैं कि आज की परिस्थितियों में युद्ध संभव नहीं है, और किसी भी परिस्थिति में युद्ध होना भी नहीं चाहिए.
युद्ध हमेशा अंतिम हथियार होता है और इसे हमेशा अंत में ही इस्तेमाल करना चाहिए. भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के साथ कोई ऐसा साझा कार्यक्रम बनाए ताकि पाकिस्तान के अंदर जाकर हम पाकिस्तान को उसके असली दुश्मनों से लड़ने में मदद कर सकें. मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान सरकार ने खुद इस बात का आग्रह किया था. लेकिन हमारी कूटनीतिक चूक ने हमारे हाथ से यह मौका गंवा दिया है. अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान आधे मन से ही सही आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा था. हम इस मौके का उपयोग नहीं कर पाये. बेहतर हो कि हम पाकिस्तान से युद्ध लड़ने जैसी मूर्खतापूर्ण बातों से अलग हटकर उन उपायों पर लंबी योजना बनाएं ताकि पाकिस्तान की सरजमीं से आतंकवाद खत्म हो जिसका शिकार न केवल भारत है बल्कि खुद पाकिस्तान है. फिलहाल भारत का जो रवैया है उसने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को भी उन आतंकवादियों के साथ जाने पर मजबूर कर दिया है जिसके खिलाफ महीना भर पहले तक वह कार्रवाई कर रहा था.
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