इस्लामिक जेहाद का फसाद
पिछले कुछ वर्षों में विश्वस्तर पर वामपंथी भी पूँजीवाद के प्रतीक अमेरिका के विरुद्ध अपनी लडाई में जिहादवादी इस्लामवादी आतंकवादियों को अपना सहयोगी मान कर चल रहे है यही तथ्य भारत में नक्सलियों और माओवादियों के साथ भी है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि भारत में व्यवस्था परिवर्तन का आन्दोलन चलाने वाले भी जाने अनजाने जेहादवादियों के तर्कों का समर्थन करते दिखते हैं।
भारत जिहाद नामी इस्लामी आतंकवाद से पिछले दो दशक से लड रहा है परंतु इसका वैश्विक स्वरूप विश्व के समक्ष 11 सितम्बर 2001 के साथ आया। जिन दिनों भारत इस्लामी आतंकवाद से लड रहा था उन दिनों अमेरिका सहित पश्चिमी विश्व के लोग भारत में कश्मीर केन्द्रित आतंकवाद को स्वतंत्रता की लडाई मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। लेकिन क्या भारत ने कभी अपने देश में चल रहे आतंकवाद को परिभाषित कर उससे लड्ने की कोई रणनीति अपनाई? कभी नहीं? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो इस समस्या को वैश्विक परिदृश्य में कभी देखने का प्रयास नहीं हुआ और दूसरा इस आतंकवाद के विचारधारागत पक्ष पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। भारत में आतंकवाद के लिये सदैव पडोसी देश को दोषी ठहरा कर हमारे नेता अपने दायित्व से बचते रहे और तो और आतंकवाद के इस्लामी पक्ष की सदैव अवहेलना की गयी और मुस्लिम वोटबैंक के डर से इसे चर्चा में ही नहीं आने दिया गया।
भारत ने जिहाद प्रेरित इस इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के तीन अवसर गँवाये हैं। पहली बार जब 1989 में इस्लाम के नाम पर पकिस्तान के सहयोग से कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भगा दिया गया तो भी इस समस्या के पीछे छुपी इस्लामी मानसिकता को नहीं देखा गया। यह वह अवसर था जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के द्वारा हिन्दुओं के पलायन को रोककर जिहाद को कश्मीर में ही दबाया जा सकता था। वह अवसर था जब पाकिस्तान के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर जिहाद के इस भयावह स्वरूप से भारत को बचाया जा सकता था। इसके बाद दूसरा अवसर हमने 1993 में गँवाया जब जिहाद प्रेरित इस्लामी आतंकवाद कश्मीर की सीमाओं से बाहर मुम्बई पहुँचा। इस अवसर पर भी इस घटना को बाबरी ढाँचे को गिराने की प्रतिक्रिया मानकर चलना बडी भूल थी और यही वह भूल है जिसका फल आज भारत भोग रहा है। तीसरा अवसर 13 दिसम्बर 2001 का था जब संसद पर आक्रमण के बाद भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। यह अंतिम अवसर था जब भारत में देशी मुसलमानों को आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता था। इस समय तक भारत में आतंकवाद का स्रोत पाकिस्तान के इस्लामी संगठन और खुफिया एजेंसी हुआ करते थे और भारत के मुसलमान केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को सहायता उपलब्ध कराते थे। इसके बाद जितने भी आतंकवादी आक्रमण भारत पर हुए उसमें भारत के जिहादी संगठन लिप्त हैं।
अल कायदा का जेहाद कुछ सिद्धांतों को लेकर चल रहा था और उसमें एक प्रमुख सिद्धांत था मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा। उनके जेहाद का कारण विश्व में शरियत और कुरान के आधार पर एक नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना और मुस्लिम उत्पीडन का बदला लेना। इस विचारधारा ने समस्त विश्व के मुसलमानों को बडी तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया और एक दशक में अल कायदा का जिहादवाद अनेक विचारधाराओं के समाधान के रूप में देखा जाने लगा और खिलाफत संस्था के पुनर्जीवित होने का स्वप्न सभी देखने लगे। अल कायदा के विकास को इस सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है कि वह विश्व भर के मुसलमानों के एक बडे वर्ग के लिये अनेक समस्याओं के समाधान के रूप में जिहाद को प्रस्तुत करता है।
आज प्रश्न यह है कि इस जिहाद से मुक्ति कैसे मिले? भारत में यह समस्या अत्यंत जटिल है क्योंकि भारत में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों की कटुता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और इस बात की आशंका है कि जिहाद की वर्तमान अवधारणा धार्मिक विभाजन को अधिक प्रेरित कर सकती है। जिहाद से लड्ने के लिये राज्य स्तर पर और सामाजिक स्तर पर रणनीति बनानी पडेगी। यह काम किसी भी प्रकार तुष्टीकरण से सम्भव नहीं है और इसका एकमात्र उपाय व्यापक जनजागरण है। व्यापक स्तर पर इस्लाम पर बहस हो। इस्लाम और इस्लामी आतंकवाद के आपसी सम्बन्धों पर बह्स से बचने के स्थान पर इस विषय पर बह्स की जाये और मुसलमानों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने को बाध्य किया जाये। यदि मुसलमान आतंकवाद के साथ नहीं हैं तो पुलिस को अपना काम करने दें और जांच में या आतंकवादियों के पक़डे जाने पर मुस्लिम उत्पीडन का रोना बन्द करें। आज देश में प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विकास रोकने क दायित्व मुसलमानों पर है हिन्दुओं पर नहीं। यदि क़ुरान आतंकवाद की आज्ञा नहीं देता और देश के मुसलमान जिहाद से सहानुभूति नहीं रखते तो उन्हें इसे सिद्ध करना होगा अपने आचरण से। अन्यथा इस समस्या को धार्मिक संघर्ष का रूप लेने से कोई नहीं रोक सकता।
(अमिताभ त्रिपाठी वेब पत्रकार हैं और लोकमंच नाम से साईट चलाते हैं.amitabhtri@gmail.com)
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