धरती की लाश पर कोसी सवार
कोसी के कहर को भोपाल गैस कांड या हिरोशिमा-नागासाकी जैसी आपदा कहना थोड़ी जल्दीबाजी है और अतिरंजना भी, पर यह हादसा कोसी को ´बिहार का शोक´ ठहराकर उसे बांधने की दिशा में हुए कामों का परिणाम है, इसमें कोई संदेह नहीं। कोसी ने अभी उस बराज को ध्वस्त नहीं किया है जो उसकी धारा को लंबवत रोकती है या फिर उस प्रस्तावित हाईडैम को नहीं तोड़ा जिसे बनाने की तैयारी में पचास साल पहले बराज व तटबंधों के संजाल खड़ा किए गए थे। नदी ने बस एक हल्की करवट ली है और बराज के उपर नदी के किनारे बने पूर्वी नियंत्रण बांध में आई दरार लगातार चौड़ी होती चली गई है।
इतने में ही समूचा सरकारी और गैर-सरकारी इंतजाम ध्वस्त हो गया। सारी सामाजिक व्यवस्थाएं चरमरा गईं। इस घटना को नमूना मानकर टिहरी बांध या कोसी के बराह क्षेत्र में पचास साल से प्रस्तावित बड़ा बांध से जुड़े खतरे को समझ सकते हैं। यह प्राकृतिक आपदा नहीं है और न ही अचानक आई ऐसी विपत्ति जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सका हो। जिस स्थान पर नियंत्रण बांध टूटा है, बराज के उपर बारहवें किलोमीटर पर उस जगह 1987 से ही पानी का दबाव बना रहा है। ठोकर (स्पर)बनाकर धारा को दूर ठेलकर रखने की कवायद तभी से चलती रही है। इसबार उस ठोकर की मरम्मत करने में लापरवाही भी हुई। (बराज के उपर अभयारण्य होने से आवागमन ऐसे भी सरल नहीं होता) लेकिन बताते हैं कि मरम्मत करने गए इंजीनियरों को नेपाली गांवों के स्थानीय लोगों ने भगा दिया। स्थानीय मजदूरों ने अनाप-शनाप मजदूरी की मांगकर अचानक काम बंद कर दिया। नेपाल सरकार पर सुरक्षा मुहैया नहीं कराने के आरोप लगाए जा रहे है। काठमांडू बराह क्षेत्र में बड़ा बांध बनाने के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काठमांडू में तैनात बिहार सरकार के अधिकारी अवकाष पर थे, इसलिए यह मामला भारतीय दूतावास के जरीए नेपाल सरकार के ध्यान में नहीं लाया जा सका और नेपाल में नई सरकार के गठन की राजनीतिक जोड़तोड़ की व्यस्तता में शायद इस ओर ध्यान देना संभव भी नहीं था।
नियंत्रण बांध के टूटने के इतने सारे कारण बता दिए गए हैं, जिसमें कोसी की धारा में बराज के उपर सिल्ट की मोटी परत जम जाने से धारा की चौड़ाई बढ़ने की प्राकृतिक वास्तविकता को छिपाया जा रहा है। यह आंकड़ा जरूर मिला है कि अभी तटबंध टूटने से बनी नई धारा में करीब सवा लाख क्यूसेक पानी प्रवाहित हो रहा है जबकि बराज वाली पुरानी धारा में मुश्किल से 24 हजार क्यूसेक पानी जा रहा है। प्रवाह में पांच गुना फर्क इसलिए है क्योंकि तटबंध के बाहर की धरती बराज वाली धारा की धरती से काफी ऊंची हो गई है। इसे समझाने के लिए किसी इंजीनियरिंग ज्ञान की जरूरत नहीं कि पानी सदा गहराई की ओर ही प्रवाहित होगा। उसे जबरन ऊंचाई की ओर बहाना अप्राकृतिक, कष्टसाध्य और हानिकारक प्रमाणित होना है। कोसी तटबंधों के भीतर फंसे 380 गांव और उसके सटे बाहर के अनगिनत गांव इसे झेलते रहें हैं। लेकिन इन सारी बातों का समय यह नहीं है। यह समय उन लोगों के लिए मातम मनाने का भी नहीं है जिनकी जानें चली गई हैं, बल्कि उन मनुष्यों और पशुओं की जान बचाने में सहायक होने का है जो नदी के करवट फेरने और विदेषी चाल-चलन के अभ्यस्त होने से घोर विपत्ति में फंसे हैं और प्रषासनिक निकम्मेपन, भ्रष्टाचार व गैर जिम्मेवार राजनेताओं के दांवपेंच को झेलने के लिए अभिशप्त हो गए हैं।

अफसोस तो इसका है कि देश के कुछ प्रमुख समाचार माध्यमों में समय की नजाकत की पूरी अनदेखी कर नियंत्रण बांध की मरम्मत करने और धारा को फिर पुरानी राह बहाने की चर्चा छेड़ दी गई है। इसके लिए हेलिकॉप्टरों से सिमेंट की सिल्लियां डालने और लोहे की जाली से उन्हें बांधने के पुख्ता इंतजाम करने के रोमांचक सपने परोसे जा रहे है। बाढ़ में फंसे अपने रिपोर्टरों की आपबीती छापने की मजबूरी के बावजूद इन अखबारों में अभी तक यह खबर नहीं आई कि सरकार अभी तक इस प्रलय से बचाए गए लोगों को आश्रय देने के लिए तीन मेगा शिविर बनाने की बात ही कर रही है। दो सप्ताह गुजर गए हैं और 2530 लाख लोगों के इस प्रलय के प्रकोप में पड़े होने का आंकड़ा सामने है। अभी डेढ़-दो लाख लोगों को बचाकर सुरक्षित जगहों पर ले जाना शेष है। जिन पांच लाख लोगों को बचाने का दावा किया जा रहा है, उन्हें कैसी जगहों पर किन इंतजामों के साथ रखा गया है। इसका उत्तर किसी से मांगने की जरूरत नहीं क्योंकि महज दो-पौने दो सौ राहत शिविर खोलने का आंकड़ा सामने है और जिन्हें बिहार सरकार के कामकाज का थोड़ा ज्ञान है उनके सामने यह साफ है कि शिविरों का यह आंकड़ा उन जगहों के बारे में है जहां बैठकर सरकारी अधिकारी व कर्मचारी राहत सामग्री का बंटवारा करते हैं। बचाव कार्यों की हकीकत भी यही है कि आपदाग्रस्त क्षेत्र में संचालित नावों का आंकड़ा डेढ़ हजार को पार नहीं कर पाया है। इसमें सेना, राज्य सरकार और गैर सरकारी स्तर पर संचालित सभी नावें शामिल हैं। हेलिकॉप्टरों की संख्या जरूर दो से बढ़ते-बढ़ते पंद्रह पहुंच गई है। लेकिन कोसी क्षेत्र में आज भी सबेरे कोहरा छाया रहता है और दोपहर बाद धूल भरी आंधिया चलती हैं। हेलिकॉपटर की कौन कहे, नावें भी शाम में जल्दी ही बंद हो जाती हैं। स्थानीय नाविक भले मौसम से संघर्ष करने के अभ्यस्त होते हैं, पर सेना के जवान इसका साहस नहीं कर सकते। और स्थानीय लोगों के देशी ज्ञान को बराज व तटबंधो ने कोसी को बांधने के साथ ही निर्वासन दे दिया था। फिर भी हठी कोसी की तरह उसके बालू में जितने हठी लोग बचे रह गए हैं, उनके अथक प्रयास ही काम आ रहें हैं। सर्वषक्तिमान सरकार और बड़बोले गैर-सरकारी प्रयास तामझाम के इंतजाम पड़े रह गये हैं। कहने की जरूरत नहीं कि महज एक तटबंध टूटने से समूची सरकार असहाय हो गई है और उसके नियंता भयभीत शिकारी की तरह असहाय लोगों का हक मारने में बर्बरता के साथ जुट गए हैं।
राहत और बचाव कार्यों की हकीकत बताने कथाकार गौरीनाथ अपनी जान बचाकर दिल्ली आ गए हैं। जिलाधिकारी से लेकर अंचलाधिकारी तक नावों की व्यवस्था के लिए दौड़ लगा चुके गौरीनाथ के पास आफत में पड़े लोगों को बचाने के बदले धन वसूली में लगे जवानों और दबंगों की कथाएं हैं। अर्थात जितनी नावें पहुंची है, दबंगो के कब्जे में है और लूटपाट तथा वर्षों में एकत्र कमाई का आखिरी कतरा भी गंवाने की मजबूरी उत्पन्न कर रही हैं। कोसी के दूसरे तट पर स्थित फूलपरास के लोगों ने एक नाव लेकर पीड़ित क्षेत्र में पहुंचने का साहस दिखाया, तो राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतिष मिश्र की ओर से फोन करके उनपर यह दबाव डाला गया कि उनके गांव बलुआ बाजार में फंसे अमुक-अमुक लोगों को पहले बचाया जाए। वह व्यक्ति उन स्वयं सेवकों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है जो सरकारी हैसियत के व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए बदनाम बिहारी सत्ताधीशों के ऐसे खानदान से आता है जिसकी सारी संपन्नता कोषी को बांधने की महायोजना से निकलकर आई है। वह प्रक्रिया जारी है। इस बलूआ बाजार में अगर खाद्य पदार्थों के तीन सौ पैंसठ पैकट गिराए गए तो पड़ोस के गांवों को पैंसठ भी शायद ही नसीब हो पाए है।
इस हादसे की सीख को स्वीकार करते हुए सरकारी कामकाज के तौर तरीकों में कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे। विज्ञान का अवैज्ञानिक प्रयोग कर महज कुछ लोगों के हाथों में सारे संसाधन समेट देने की बेवकूफी को छोड़कर प्रकृति के स्वभाव को समझने, समाज के ज्ञान को बढ़ाने और संघर्ष क्षमता को शक्तिषाली बनाने के इंतजाम करने होंगे। कोषी की जिन बाइस धाराओं को अवरूद्ध कर एक धारा में प्रवाहित करने की कोशिश नाकाम हो गई है, उन सभी धाराओं को जीवित और विकसित करते हुए जनजीवन की स्वाभाविकता को पुर्नस्थापित करने के विकल्प पर सोचना होगा। यह सारा काम इन 25 या 30 लाख लोगों के पुर्नवास के साथ-साथ होना है। एक अनिवार्य काम इन इलाकों में नावों की संख्या बढ़ाना और उनको ठीक से रखने के लिए जल क्षेत्रों का प्रावधान करना होगा ताकि भविष्य में लोग अपना बचाव अपने प्रयासों से अधिक बेहतर ढंग से कर सकें।
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नेपाल मे भारत द्वारा तटबन्ध के मरम्मत मे अडचन एवम असहयोग भी प्रमुख कारक रहा है तराई की इस त्रासदी के लिए । नेपाल मे तटबन्धो मे पत्थरो को बांधने वाले गैबिन वायर (तार) तक चुरा लिए गए थे । नेपाल सरकार तटबन्धो की सुरक्षा के प्रति गम्भीर नही थी । तटबन्ध के टुटने के कई कारणो मे पत्थरो को बांधने वाले तारो की चोरी भी प्रमुख कारण है ।
जो भी हो, कोशी के इस कहर से सब को सबक लेना जरुरी है । भारत और नेपाल के बीच जल सन्धि को मजबुत किया जाना चाहिए । जल संशाधनो के विकास मे अविश्वास के वातावरण को समाप्त किया जाना चाहिए । नेपाल के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने बिना सोचे समझे कोशी नदी के सम्झौते को एतिहासिक भुल तक कह डाला, एसे बयानो से अविश्वास बढेगा यो दोनो देशो के लिए प्रत्युपादक है ।
काठमांडौ मे भारत के राजदुत हर महिने नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलते थे, लेकिन कोशी के तटबन्ध की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता मे नही होती थी । वे तो महारानी सोनिया को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को ईस बात के लिए मनाते है की हिन्दु राष्ट्र समाप्त कर धर्म निर्पेक्ष बनाया जाए नेपाल को । नेपाल मे भारत के राजनयिको को राजनैतिक गतिविधियो की बजाए जन सरोकार के विषयों मे अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।
एक सवाल ये भी उठता है कि बंधी हुई कोसी बिहार के लिए अच्छी है या आज़ाद? इस पर भी विचार किए जाने की जरूरत है और उसी हिसाब से कदम उठाया जाना चाहिए
Your down to earth reporting created very clear clarification situated at Koshi region.
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