नरेगा का पैसा अधिकारियों का विकास
राजीव गांधी गलत थे जो उन्होंने यह कहा कि विकास के लिए ऊपर से जो पैसा आता है उसका १०पैसा ही नीचे पहुंचता है. उड़ीसा के अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि रूपये में दस पैसा नहीं बल्कि २५ पैसा नीचे पहुंचता है. आज राजीव गांधी जिन्दा होते और अपनी ही पार्टी की महत्वाकांक्षी परियोजना नरेगा के तहत पैसे की बंदरबाद देखते तो निश्चित रूप से वे अपना जुमला ठीक करते. लेकिन रूकिये, एक दिक्कत है.
यह जो २५ पैसा नीचे तक जा रहा है वह तथाकथित विकास का पैसा नहीं है. यह सीधे तौर पर ग्रामीण लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए खोजा गया जादुई फार्मूले का पैसा है. यह उस महान विचार से निकला पैसा है जो कहता है कि ग्रामीण इलाकों में अगर रोजगार हो तो शहर की ओर पलायन कम होगा और ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत किया जा सकेगा. लेकिन जब इस महान विचार पर अमल की बारी आयी तो सूखे के दिनों में बुन्देलखण्ड में सड़कें खुदवाने का काम सबसे ज्यादा किया गया. अपनी ही खेत में 'विकास' का हल चलाने के लिए भी पैसा दिया गया. कागज पूरा किया गया. बही-खाते बनाये गये और जितना पैसा लोगों को बांटा गया उसका तीन गुना अपने पास रख अधिकारियों ने अपना विकास सुनिश्चित कर लिया.
यह बहस किनारे रख दें कि नरेगा से जिस गांव के इन्फ्रास्ट्रकर को विकसित करने की बात की जा रही है उसे उसकी जरूरत है भी या नहीं. हम मान लेते हैं कि नरेगा गांव में नयी बयार लेकर पहुंचा है. लेकिन इस बयार में क्या कुछ गुल खिल रहे हैं इसे तो जानना ही चाहिए. सीईएफएस पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर अध्ययन करनेवाली संस्था है. इसने आज से कोई साल भर पहले उड़ीसा में नरेगा के पैसे के गोलमाल का अध्ययन किया था. उसने पाया था कि यहां बड़े पैमाने पर धांधली हुई है. कोई पांच सौ करोड़ का घपला हुआ है. १७ अगस्त २००७ को रिपोर्ट जारी हुई. राज्य में हल्ला मचा. केन्द्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कहा कि इसकी जांच करो. (यही मंत्रालय नरेगा का संचालन करता है.) राज्य सरकार ने जांच कराने का फैसला किया. कमेटी बनी. आरएन दास की अध्यक्षता में इस कमेटी में आठ आईएएस शामिल किये गये. ये सभी राज्य के विभिन्न विभागों से जुड़े हुए थे. इस जांच कमेटी की रिपोर्ट आयी. जांच कमेटी ने कहा कि कहीं कोई घपला नहीं हुआ है. सब व्यवस्था चाक चौबंद है. रिपोर्ट में कहा गया "जो काम हुआ है उसमें कहीं कोई गड़बड़ नहीं है. सभी रिकार्ड ठीक तरह से दर्ज किये गये हैं और जिन्होंने काम किया है उन्हें उचित दर पर पैसा दिया गया है. काम की गुणवत्ता भी बहुत उच्च स्तर की है." बात खत्म हो गयी. नरेगा और विकास दोनों की अपने तरीके से काम करते रहे.
कोई साल भर बाद एनआईआरडी (राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान) की भी एक सामाजिक जांच रिपोर्ट आ गयी है. यह रिपोर्ट कहती है कि उड़ीसा के अति पिछड़े कालाहांडी, मलकानगिरी, कोरापुट क्योंझर और धेनकनाल में ७५ से ८० फीसदी भुगतान फर्जी है. पूरे राज्य का औसत निकालें तो यह आंकड़ा अकेले साल २००७ में ५८ फीसदी फर्जी भुगतान किया गया. एनआईआरडी की रिपोर्ट कहती है कि "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य के इन अति पिछड़े जिलों में भी नरेगा खरा नहीं उतर पाया. कालाहाण्डी, बोलान्गीर, कोरापुट, मलकानगिरी, नौरंगपुर और नौपाड़ा जिलों में तो केवल २६ प्रतिशत पैसा ही लोगों को मिल सका है." बाकी पैसा कहां गया? क्योंकि अधिकारी तो पहले ही जांच में कह चुके थे कि मामला चकाचक है और सारा पैसा बड़ी 'ईमानदारी' से गरीब लोगों में काम के बदले बांटा जा रहा है, और कमाल है कि काम की गुणवत्ता भी बहुत ऊंचे दर्जे की है. अब सीईएफएस के लोग कह रहे हैं कि इन आईएएस अधिकारियों ने इतना बड़ा झूठ क्यों बोला? अगर केन्द्र सरकार का एक विभाग कह रहा है कि घपला हआ है तो राज्य के उन आठ आईएएस अधिकारियों ने कैसे कह दिया कि सब ठीक है.
सीईएफएस का कहना है कि उन आठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच होनी चाहिए कि आखिर उन्होंने खुली आंखों से दिखनेवाले भ्रष्टाचार को भी क्यों नजर-अंदाज किया? संस्था का आरोप है कि इन अधिकारियों ने अपनी झूठीं रिपोर्ट से लाखों गरीब लोगों के पेट पर लात मारा है बल्कि व्यवस्था के ही एक हिस्से ग्रामीण विकास मंत्रालय से भी झूठ बोला है. संस्था के निदेशक परशुराम राय कहते हैं "अगर ५०० करोड़ रूपये के इस घोटाले में ये आठ आईएएस अधिकारी सीधे लाभार्थी नहीं है तो फिर उन्होंने उस घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिश क्यों की?" वे आगे बताते हैं कि कालाहांडी और मलकानगिरी के इस इलाके में गरीबी, नक्सलवाद, प्रशासन और भ्रष्टाचार का ऐसा चौखंभा तैयार हो गया है जो एक दूसरे के लिए पोषक का काम करते हैं. िनश्चित रूप से इसमें गरीब ही सबके लिए निवाला बनता है.
वैसे भी हमारे देश में आईएएस अधिकारी होना फायदे का सौदा है. उसका लालन-पालन और पोषण कुछ ऐसा होता है कि वह हर प्रकार के भ्रष्टाचार के मूल में होता है लेकिन उसका नाम कहीं नहीं आता. उड़ीसा में भी यही हुआ है. अगर कागज की अंतिम प्रमाण हैं तो आईएएस अधिकारी कागजों के साथ खेलना सबसे बेहतर जानता है. संस्था के लोग मांग कर रहे हैं इन आठ आईएएस अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त किया जाए क्योंकि इन्होंने गरीबों के हक का पैसा अपने विकास के लिए इस्तेमाल कर लिया. फिलहाल तो उड़ीसा सरकार और दूसरे संकटों में उलझी हुई है इसलिए उससे यह उम्मीद करना कि वह नरेगा जैसे छोटे-मोटे मामले में कोई खास रूचि लेगी, ठीक नहीं लगता. इधर संस्थावाले केन्द्र में सबको चिट्ठी भेजकर दुहाई दे रहे हैं कि इस महाभ्रष्टाचार पर तुरंत ध्यान दिया जाए और गरीबों का पैसा मारनेवाले प्रशासनिक वर्ग से सख्ती से निपटा जाए. पता नहीं, शायद कोई सुन ही ले.
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मेडीकल तथा इंशुरेंस की सुविदा अवश्य होनी चाहिये।
फन्ड एच आर ए की सुविदा होनी चाहिऐ जो उनके भविष्य के लिऐ लाभ प्रद होगा ।
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