जरदारी के ज़र और ज़ेवर
जरदारी के राष्ट्रपति बनने में शुरू से ही किसी को संदेह नहीं था, परवेज मुशर्रफ और नवाज शरीफ दोनों ये जानते थे। उन्होंने अपने उम्मीदवार केवल चुनाव की औपचारिकता निभाने के लिए खड़े किए थे और शायद यह बताने के लिए कि हम जरदारी से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन आसिफ जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति की भूमिका का निर्वाह कैसे करेंगे ये देखना दिलचस्प होगा। उनके सामने अनेक विरोधाभास हैं, जिनमें से बिना फिसले सही रास्ते निकालना आसान नहीं है।
गनीमत है कि एक मुिश्कल उन्होंने राष्ट्रपति बनने से पहले ही पार कर ली है। पाकिस्तान पर नजर रखने वाले राजनैतिक पर्यक्षेक यह जानते हैं कि जरदारी मन ही मन परवेज मुशर्रफ का आभार मानते होंगे क्योंकि जब वे पाकिस्तान आए थे तो जितने गंभीर आरोप उन पर लगे थे उनके हिसाब से तो जरदारी को जेल में होना चाहिए था या कम से कम कोर्ट-कचहरियों के चक्कर लगाते हुए दिखाई देना चाहिए था। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह इसलिए कि राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए परवेज मुशर्रफ ने उनके समय अनेक लोगों को आम माफी दिलवाई ताकि देश में चुनाव हो सके। अगर परवेज मुशर्रफ के खिलाफ पाकिस्तानी संसद में महाभियोग नहीं चलाया गया तो उसके पीछे फौज और अमेरिका का दबाव तो था ही जरदारी की भी इस बात में विशेष रूचि नहीं थी कि मुशर्रफ को संसद के सामने अभियुक्त के रूप में खड़ा कर दिया जाए। अगर यह सवाल निपट नहीं गया होता तो अब राष्ट्रपति जरदारी के सामने विकट समस्या के रूप में खड़ा हो जाता।
लेकिन समस्याएं और भी हैं। पाकिस्तान का राष्ट्रपति दुनिया के सबसे शक्तिशाली राज्याध्यक्ष होता है। उसके पास इतने अधिकार हैं कि वे संसद को भंग कर सकता है, सरकार को बर्खास्त कर सकता है, मुख्य न्यायधीश को हटा सकता है और चाहे तो पाकिस्तान के सेनापति को भी निकाल बाहर सकता है। इतने अधिकारों के कारण ही जनरल परवेज मुशर्रफ अमेरिकियों के लिए बहुत मुफीद शासक थे। क्योंकि उन्हें सामान्य लोकतांत्रिक तरीके से पाकिस्तानी सरकार के साथ सौदाबाजी करने या नौकरशाही के जंगल में गुजरने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती थी, क्योंकि राष्ट्रपति ही सबकुछ थे और सारे मामले एक ही जगह निपटाए जा सकते थे। अब जरदारी के सामने यह सवाल है कि क्या राष्ट्रपति के इन सब अधिकारों को कायम रखा जाए या छोड़ दिया जाए। इतने शक्तिशाली शासक होने का लोभ किसी भी राजनीतिक को हो सकता है। लेकिन जिस चुनाव घोषणापत्र के आधार पर वे इतना बड़ा जनसमर्थन प्राप्त कर चुके हैं उसका सबसे बड़ा मुद्दा तो यही है कि राष्ट्रपति के पास इतनी सारे अधिकार नहीं रहने चाहिए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति को संवैधानिक सीमाओं में बांधा जाना चाहिए, ताकि पाकिस्तान में निरंकुश शासन की परंपरा समाप्त हो। जिस बेनजीर के कारण वो चुनाव जीते हैं और पीपुल्स पार्टी के सर्वेसर्वा बन गए हैं उसी बेनजीर ने इस तरह का चार्टर जारी किया था। ऐसे ही चार्टर पर बेनजीर और नवाज शरीफ के बीच समझौता हुआ था। इसलिए जरदारी के लिए राष्ट्रपति के ये सारे अधिकार रखने का मतलब होगा कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर विरोधी स्वर उठेंगे और उनकी सहयोगी पार्टी यानी मुस्लिम लीग नवाज शरीफ खुलकर उनके सामने मैदान में उतर आएगी। इससे पाकिस्तान में शीत युद्ध तो शुरू हो ही जाएगा। वह अचानक हिंसा और मारकाट में बदल जाए यह कोई ताज्जुब की बात नहीं। राजनैतिक मजबूरियों का तकाजा है कि जरदारी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद स्वयं राष्ट्रपति के कुछ आवांछित अधिकारों को त्यागने की पेशकश करे।
न्यायधीशों के मामले पर पहले ही आसिफ जरदारी पर उंगलियां उठने लगी हैं। नवाज शरीफ और जरदारी के बीच समझौता इसी मुद्दे पर टूट गया। नवाज शरीफ का कहना है कि मैं सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहता, लेकिन जिन सिद्धांतों पर मेरी पार्टी ने सहयोग करने का वायदा किया था उन सिद्धांतों से भी दगा नहीं कर सकता। इसका राजनैतिक अर्थ यही होता है कि फिलहाल सरकार को गिराने का कोई इरादा नहीं क्योंकि गिराने के लिए प्र्याप्त सांसद उपलब्ध नहीं है, लेकिन अगर कोई संकट पैदा हो जाता है तो उससे पीपुल्स पार्टी की सरकार को मुक्ति दिलाने का भी कोई वायदा मैं नहीं कर सकता। इसलिए जरदारी को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा, क्योंकि किसी भी कारण अगर वे राजनैतिक संकट में फंस गए तो अचानक दोस्तों की कमी पड़ जाएगी। इन तात्कालिक मुद्दों के अतिरिक्त सवाल यह है कि जब सरकार भी पीपुल्स पार्टी की हो और राष्ट्रपति भी उसी पार्टी का चुन लिया गया हो तो सेना एवं आईएसआई पर कौन नियंत्रण रखेगा। कानून के हिसाब से तो सेना और आईएसआई दोनों राष्ट्रपति के आदेश पर काम करते हैं और राष्ट्रपति के विरूद्ध नहीं जा सकते। जब तक सैनिक शासक होते थे तब तक यह रिश्ते आसान थे क्योंकि तकनीकी रूप से भी और व्यवहारिक रूप से भी राष्ट्रपति वर्दीधारी प्रधान सेनापति ही हुआ करता था।
आसिफ जरदारी के पास न तो फौजी वर्दी है और न अनुभव। इसलिए यह सवाल उठेगा ही कि क्या आईएसआई को असैनिक लोकतांत्रिक सरकार के सामने जवाबदेह बनाया जाएगा कि नहीं। काबुल में भारतीय दूतावास पर बम धमाके के पीछे आईएसआई का हाथ बताया जाता है। यह केवल भारत सरकार का आरोप नहीं है, अफगानिस्तान सरकार का भी है। इस घटना के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी ने हल्की सी यह कोिशश जरूर की थी कि आईएसआई को सेना से हटाकर प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ जोड़ दिया जाए, लेकिन इस विचार को उन्हें तुरंत छोड़ देना पड़ा क्योंकि सेना ने इसका विरोध तो किया ही अपने त्याग पत्र देने के बाद भी जनरल मुशर्रफ ने आईएसआई को बदनाम करने और उसकी ताकत को घटाने के लिए राजनीतिकों की निंदा करते हुए इसे पाकिस्तान को खतरे में डालने की कोिशश बताया। भारत में प्रमुख खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनीलिसिस विंग प्रधानमंत्री कार्यालय का एक हिस्सा होता है। लेकिन पाकिस्तान में वह सेना की एक शाखा है। जरदारी के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वे सेना और लोकतांत्रिक सरकार के बीच एक वैज्ञानिक और व्यवहारिक रिश्ता स्थापित करें, क्योंकि रिश्तों के अभाव में पाकिस्तान उस आतंकवादी दौर से नहीं निकल सकता जिसकी वजह से वह परेशान है। साथ ही इसका असर अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों पर भी स्वाभाविक है। खतरा इस बात का भी है कि सेना और लोकतांत्रिक सरकार में टकराव की नौबत आ जाए।
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कौल साहब को एक लाइन और जोड़ देनी चाहिए थी कि पाकिस्तान में जो कोई भी शीर्ष पद पर बैठता है वो बाद में दुम दबाकर अपने देश को छोड़कर भागता है या फिर मार दिया जाता है। अब जरदारी साहब को कुछ ऐसा काम करना चाहिए ताकि इस मिथ्या को भूल दिया जाए तभी पाकिस्तान का भला भी होगा और आतंकवाद भी खत्म होगा।
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