रामदेव की गंगा रक्षा
जेपी इंडस्ट्रीज रामदेव के योगग्राम में पैसा लगाता है और गंगा रक्षा का दावा करनेवाले बाबा रामदेव गंगा रक्षा के पांच सूत्रीय मांगों में गंगा एक्सप्रेस हाईवे का जिक्र करना भी भूल जाते हैं. इससे गंगा रक्षा मंच और उद्योगपतियों के अन्तर्सम्बन्धों से हकीकत खुद बखुद सामने आ गई है। वैसे भी गंगा में जो भी उतरेगा उसे कपड़े उतारने पडेंगे। और कपड़े उतरेंगे को बहुत कुछ दिखेगा। दामन पर लगे दाग गंगा बाद में धोएगी पहले तो वह सार्वजनिक होगा। वही बाबा रामदेव के साथ हो रहा है।
योग आसनों और प्राणायाम का बाजारु संस्करण उतार कर दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए योग गुरु बाबा रामदेव की निगाह गंगा और उसके पानी पर है। बाबा अब गंगा का कचरा साफ करने उतरे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बाबा के योग-प्राणायाम से ठीक हुए लाखों बीमार अब उनके भक्त हैं। उनके ही दम पर बाबा राजनीति की शुद्धता की भी बात करते हैं। गंगा के निर्मलीकरण का अभियान उनकी राजनीति का ही हिस्सा दिखाइ दे रहा है। अगर यह उनकी राजनीति है तो उसमें वह सफल हैं। क्योंकि विहिप के प्रभुत्व वाले गंगा रक्षा मंच के बैनर तले केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री श्रीप्रकाश जयसवाल भी आए और उन्होंने बाबा को प्रधानमन्त्री से मिलने का समय भी दिलाया। जहां तक श्रीप्रकाश जयसवाल का गंगा की शुद्धता के लिए चिन्तित होने का प्रश्न है तो चुनावी साल में वह स्वाभाविक था। लेकिन बाबा का सारा क्रिया कलाप उनके तथाकथित राजनैतिक शुद्धतावाद से परे था।पहली बात। बाबा ने गंगा रक्षा मंच के बैनर तले एक हस्ताक्षर अभियान चला रखा है। हस्ताक्षर अभियान गंगा के सवाल पर केन्द्रीय एवं सम्बन्धित राज्य सरकारों के समक्ष प्रस्तुत मांग पत्र के समर्थन में है। मांग क्या है, इस पर गौर फरमाने की जरूरत है। एक- गंगा को राष्ट्रीय नदी / राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए। दो- केन्द्रीय स्तर उच्चाधिकार सम्पन्न गंगा संरक्षण प्राधिकरण गठित किया जाए। तीन- प्रदूषित जल को निर्धारित मानकों के अनुरूप शोधित करने की व्यवस्था सुनिश्चित हो। चार- गन्दे नालों, कल-कारखानों के प्रदूषित जल एवं लावारिस पशुओं के शव आदि को गंगा जी में डालना संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए। पांच- टिहरी बांध परियोजना के जो लाभ निर्धारित किए गए थे उनकी उपलब्धि के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार एक श्वेत पत्र जारी करे।
मांगपत्र की पहली मांग को छोड दिया जाए तो क्या ऐसा नहीं लगता कि यह मांग पत्र राजनीति के सौदागरों और उद्योगपतियों ने बनाया है। मांग दो पर आइए। गंगा संरक्षण प्राधिकरण गठित होगा तो क्या होगा? सिवाय इसके कि विहिप और बाबा के कुछ चेले प्राधिकरण में नामित हो जाएंगे। देष में कितनी ही परियोजनाओं पर न जाने कितने ही प्राधिकरण बने हैं, उनका क्या हाल है? यह देश की जनता से छिपा नहीं है। मांग तीन पर आइए, प्रदूषित जल को मानकों के अनुरुप षोधन की बात है। क्या होगा? यही न कि गंगा किनारे कुछ सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट और लग जाएंगे। कौन लगाएगा। कोई उद्योगपति, शायद विहिप और बाबा से जुडा हुआ। मांग पांच क्या है? श्वेत पत्र जारी करने की बात। श्वेत पत्र से क्या होगा?

सवाल उठता है कि मंच ने, बाबा ने गंगा के अविरल बहाव की बात क्यों नहीं की? क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो भागीरथी पर, गंगा पर बनने वाले बांधों का निर्माण रोकना पडेगा । टिहरी बांधको तोडकर गंगा की धारा को मुक्त करना पडेगा। टिहरी बांध किसने बनाया जे पी इण्डस्ट्रीज ने। जिसके पास गंगा एक्प्रेस हाइवे का भी ठेका है इसलिए मांगपत्र में गंगा एक्सप्रेस हाइवे से सम्बन्धित कोइ बात नहीं है। सवाल है कि क्या गंगा रक्षा मंच और बाबा रामदेव गंगा एक्सप्रेसवे को गंगा के लिए खतरा नहीं मानते। अब अगर लोग गंगा रक्षा मंच और बाबा रामदेव की नीयत पर सवाल न करें तो क्या करें? गोविन्दाचार्य ने तो 17 जून को ही मंच की विश्वसनीयता पर सन्देह व्यक्त कर दिया था, मंच वालों के सामने ही। और खुद को मंच से अलग कर लिया था। लेकिन अब तो लोग भी सन्देह कर रहे हैं।
दूसरी बात- मंच की विश्वसनीयता और बाबा की नीयत पर सन्देह पर और भी कारण हैं। 17 जून को जिस गंगा रक्षा मंच का निर्माण किया गया और जिसका ढिंढोरा पीटा गया वह तो आठ साल पुराना है। और इन्हीं बाबा रामदेव का बनाया हुआ है। बाबा रामदेव ने 12 फरवरी सन् 2000 को गंगा रक्षा मंच पता दादूबाग कनखल, हरिद्वार, फोन नं तत्कालीन 414107, 410008 के लेटर पैड पर प्रधानमन्त्री को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी, प्रयाग में गंगा के सवाल पर आन्दोलनरत कुछ सन्तों की गिरफ्तारी के विरोध में था। चिट्ठी में मातृ सदन, हरिद्वार के हवाले से चेतावनी दी गई थी कि उनकी बात नहीं सुनी गई तो मातृ सदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानन्द प्राण त्याग देंगे। पत्र में नीचे बतौर संयोजक स्वामी रामदेव और सहसंयोजक स्वामी संविदानन्द के हस्ताक्षर थे । तब क्या हुआ मालूम नहीं लेकिन अब फिर से गंगा रक्षा मंच बनाने का ढोंग क्यो ?
तीसरी बात- अब तो सन्देह यहां तक पहुंच गया है कि बाबा रामदेव सचमुच गंगा को बचाना चाहते हैं या गंगा के बहाने निशाना कहीं और है। इसका जवाब भी हरिद्वार से ही मिलता है। तारीखों पर ध्यान दीजिए। हरिद्वार में औद्योगिक क्षेत्र में 9 जून को बाबा रामदेव के योगग्राम का शिलान्यास हुआ और 17 जून को गंगा रक्षा मंच का गठन। शिलान्यास करने वाले थे उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री बी सी खण्डूरी। शिलान्यास पट्ट पर खण्डूरी के अलावा जे पी इण्डस्ट्रीज के मालिक जे पी गौड़, हीरो होण्डा कम्पनी के चेयरमैन वी एन मुंजाल और हरियाणा के प्रमुख उद्योगपति मित्रसेन आर्य का नाम है। साफ जाहिर है कि शिलान्यास पट पर इनका नाम फोकट में तो नहीं होगा. क्योंकि ये न तो कोई समाजसेवी हैं न ही कोई बडे पदवीधारी। क्या यह सवाल नहीं उठता कि बाबा अब खुद यह बताएं की इन उद्योगपतियों की योगग्राम के निर्माण में क्या भूमिका है? अगर जेपी गौड़ से पैसा लेकर योगग्राम बनता है तो फिर भला गंगा रक्षा मंच जे पी इंडस्ट्रीज के टिहरी बांध और एक्सप्रेस हाइवे के खिलाफ मोर्चा क्यों खोलेगा?
इतना ही नहीं, सवाल यह भी है कि बाबा रामदेव इन उद्योगपतियों के काले कारनामों को छिपाने की कोषिष तो नहीं कर रहे? बताते चलें कि उत्तराखण्ड की पिछली सरकार में हीरो होण्डा, एवरेडी, सोमानी फोम्स और वी आइ पी इण्डस्ट्रीज को फैक्टरी लगाने की अनुमति नहीं मिली। क्योंकि इन कम्पनियों का खतरनाक रासायनिक कचरा सीधे गंगा में गिरने वाला था। इन कम्पनियों को प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र न देनेवाले अधिकारी वी एस नेगी को सरकार ने स्थानान्तरित कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के वाद संख्या 6023/2006 से सारी बातें साफ हो जाती हैं। स्थानान्तरण के खिलाफ उत्तराखण्ड उच्चन्यायालय में वाद दाखिल किया। फैसला नेगी के पक्ष में हुआ और राज्य सरकार हार गई। फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। जहां मुकदमा चल रहा है। अब मुकदमें में अपने आर्थिक हितों का हवाला देकर राज्य सरकार के साथ ये कम्पनियां भी खडीं हैं। शायद यही वजह है कि देश के जाने माने वकील सोली सोराबजी और फाली एस नरीमन समय समय पर राज्य सरकार के पक्ष में खडे होते हैं।
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<b>सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥</b>
शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
<a>(हिन्दुस्तानी एकेडेमी)</a>
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मांग पत्र की पांच मांगों में पहली मांग-" गंगा को राष्ट्रीय नदी / राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए। " इसे आप भी जायज मानते..दूसरी, तीसरी और पांचवी मांग की बारीकियों की आपने बखूबी बखिया उधेड़ी। लेकिन...चौथी की तो चर्चा ही नहीं हुई...(जो मेरी नज़रों में सबसे जायज मांग) "गन्दे नालों, कल-कारखानों के प्रदूषित जल एवं लावारिस पशुओं के शव आदि को गंगा जी में डालना संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए।" शायद इसका विष्लेषण करने पर जेपी इंडस्ट्रीज की पक्षधरता का सवाल अधूरा सा लगता...
क्या अपने को प्रगतिशील घोषित करने के लिए संतो का अपमान जरूरी है
दूसरी बात. बाबा रामदेव कहीं से दूध के धुले हुए व्यक्ति नहीं है. आप लोग उनके बारे में जितना जानते हैं उतने से अपनी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जिसे आप या सामान्य व्यक्ति नहीं जानता.
तीसरी बात. हमने जो कुछ प्रकाशित किया है वह तथ्यों पर आधारित है. कोई छानबीन करना चाहे तो कर सकता है.
वैसे हमारी तरफ से अभी इस बारे में बहुत कुछ आना शेष है.
दुर्भाग्य से जिन मदारियों को पेट फुलाने-पिचकाने से ज्यादा कुछ नहीं आता वे ही आज सबसे बड़े योगी बन बैठे हैं. रामदेव जिन आसनों का अभ्यास कराते हैं वे सब बिहार स्कूल आफ योग द्वारा विकसित किये गये हैं. ये सब शरीर खोलने के लिए बिहार स्कूल आफ योग ने आज से तीस साल पहले विकसित किया था.
लोग यह समझते हैं कि रामदेव पतंजलि के आसनों का अभ्यास करा रहे हैं. पतंजलि ने सिर्फ एक बार आसन का जिक्र किया है और वह यह कि स्थिर सुखम् आसनम्. यानी जिस अवस्था में आपको सुख मिले वही आपका आसन है. बाकी तो समय-समय पर ऋषियों और साधकों ने आसन समूह विकसित किये हैं.
ऐसे आसनचोर रामदेव को योगगुरू कैसें मान लें? अगर मेरी बातों का प्रमाण चाहिए बिहार स्कूल आफ योग द्वारा सत्तर के दशक में प्रकाशित पुस्तक आसान, प्राणायम, मुद्रा और बंध देख लें.
कुछ लोग ऐसे ही होते है, जिन्हे दूसरे के काम में दोष निकालने की आदत ही होती है, अपने छोटे से लाभ के लिये वे बड़े होने वाले समुदायिक लाभ को तिलांजली दे जाते है। ऐसी ही कुछ मंशा आपकी लग रही है।
कुछ लोग ऐसे ही होते है, जिन्हे दूसरे के काम में दोष निकालने की आदत ही होती है, अपने छोटे से लाभ के लिये वे बड़े होने वाले समुदायिक लाभ को तिलांजली दे जाते है। ऐसी ही कुछ मंशा आपकी लग रही है।
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