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रिश्वत की सीडी भाजपा की मुसीबत

image भाजपा की भारी रणनीतिक चूक साबित हुआ यह सीडीकाण्ड

भाजपा सूत्रों का कहना है कि जब लालकृष्ण आडवाणी को पता चला कि तीन सांसदों को पैसे देकर खरीदने की कोशिश हो रही है तो उन्होंने वैंकेया नायडू से इसका स्टिंग आपरेशन करवाने के लिए कहा. लेकिन बाद में इसकी जिम्मेदारी महासचिव अरुण जेटली को सौंप दी गयी. बात यहीं से गड़बड़ हो गयी है. पार्टी के एक वर्ग का कहना है कि यह काम पार्टी में पूरी तरह से समर्पित लोगों को मिलना चाहिए था.

इसमें संघपृष्ठभूमि वाले चैनल के मालिक, तेजतर्रार सीईओ, चैनलों के स्टार रिपोर्टरों को इस काम में शामिल किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पार्टी के वरिष्ठ नेता जो अंग्रेजियत के शिकार हैं उन्होंने किसी अंग्रेजी पत्रकार या चैनल पर भरोसा करके बड़ी चूक कर दी. अब भाजपा के नेता कह रहे हैं कि स्टिंग आपरेशन के लिए जिस चैनल को चुना गया उसने गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अभियान चलाकर राष्ट्रीय सम्मान हासिल किया था. ऐसे में इस रिश्वतकाण्ड का खुलासा करने के लिए उस चैनल पर विश्वास करना ही अपने साथ विश्वासघात करने जैसा था. इस चैनल ने सीडी तैयार कर ली थी लेकिन इसे भाजपा नेतृत्व को नहीं सौंपा. उस समय चैनल ने दावा किया कि वे उस प्रसारित करने जा रहे हैं. पर ऐन मौके पर उसने सीडी प्रसारित करने की बजाय इसे लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया. पार्टी सूत्रों के ही अनुसार हालांकि इसका खुलासा होने के बाद एक अन्य प्रतिष्ठित चैनल ने अरूण जेटली को फोन करके कहा कि 'अनजान लोगों पर भरोसा करने का नतीजा देख लिया आपने. हमारी अनदेखी करेंगे तो यही होगा.'

वैसे भाजपा के सूत्र कह रहे हैं कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते-करते भाजपा पत्रकारों की भी उपेक्षा का खामियाजा भुगत रही है. अब हालात यह हैं कि इस सीडी के अभाव में यह साबित करना मुश्किल हो गया है कि वास्तव में उसके तीन सांसदों को खरीदने के लिए एक करोड़ रूपये की पेशगी दी गयी थी. इस काण्ड में भाजपा की जो भद्द पिटी है उसके लिए पार्टी के नेता अपने आला नेताओं पर दोष मढ़ रहे हैं.पार्टी नेताओं के मुताबित चूंकि भाजपा के लिए सारे समर्पित पत्रकार हिन्दी चैनलों से जुड़े हुए थे इसलिए उन्हें घास नहीं डाली गयी. खास बात यह है कि हिन्दीभाषी राज्यों की इस पार्टी के आला नेता खुद हिन्दी को नापसंद करते हैं. एक दौर था जब अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में भाषण देकर देश और भाषा का सम्मान बढ़ाया था वहीं विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने विश्वास मत सरीखे अहम मौके पर अपना भाषण अंग्रेजी में ही दिया.

भाजपा नेताओं के इस समय हाथ पैस फूले हुए हैं. खबरें छप रही हैं कि रूपये की गड्डियां इंदौर के एक बैंक से लाई गयी थीं. पार्टी को सफाई देते नहीं बन रहा है. हालांकि शुक्रवार को भाजपा की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को इन सांसदों की ओर से लिखित में रिश्वत देने की शिकायत सौंप दी गयी है. लेकिन अभी भी इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि वास्तव में राशि थी कितनी? मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा है कि तीन करोड़ रूपये की रिश्वत दी गयी जबकि सांसदों का दावा है कि उन्हें एक करोड़ रूपये पहुंचाए गये थे. उधर लखनऊ में एक सपा कार्यकर्ता द्वारा सीडी के अभाव में आरोप लगा देने पर मानहानि का मुकदमा भी दायर हो चुका है. गलत रणनीति और उपेक्षा की नीति के कारण एक बार फिर भाजपा अपने ही बनाये जाल में उलझती जा रही है.

(विवेक सक्सेना जनसत्ता के विशेष संवाददाता हैं.)

चैनल की जिम्मेदारी है कि वह जनता को टेप दिखाए

प्रशांत भूषण (वरिष्ठ अधिवक्ता और कानूनविद)प्रशांत भूषण

जब टीवी चैनल ने स्वीकार कर लिया है कि उसके पास इससे जुड़ी हुई सीडी है तो इसे पुख्ता सबूत मानकर जांच के लिए तुरंत कदम उठाया जा सकता है. इस मामले में यह भी साफ हो गया है कि पैसे का लालच सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए था या गैरहाजिर रहने के लिए। यह न केवल `प्रीवेंषन ऑफ करप्षन` एक्ट के तहत रिश्वत देने का अपराध है बल्कि सदन के विषेशाधिकारों का उल्लंघन भी है। कुछ समय पहले ही कई सांसदों को बर्खास्त किया गया था, जब विषेशाधिकार समिति ने जांच के बाद पाया कि सांसदों ने प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत ली है. जाहिर तौर पर वोट के लिए या गैरहाजिर रहने कि लिए रिश्वत लेना तो विषेशाधिकार का और भी बड़ा उल्लंघन है।

इसलिए `प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट` के तहत इसकी आपराधिक जांच की जानी चाहिए, साथ ही सदन की विषेशाधिकार समिति द्वारा भी जांच होनी चाहिए। जांच केवल तीन सांसदों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, जो स्टिंग ऑपरेशन का हिस्सा थे, जिन्होंने पार्टी की `व्हिप´ के बावजूद क्रास वोटिंग की उनको भी जांच के दायरे में रखना चाहिए. साथ ही उनकी भी जांच होनी चाहिए जिन्होंने रिश्वत दी। मामले में शामिल सभी `अभियुक्तों` को सामने लाया जाना चाहिए और जवाब मांगा जाना चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन का टेप भी पूरी पारदर्शिता के साथ जनता को दिखाया जाना चाहिए, कैमरे से जो कुछ रिकॉर्ड किया गया वह जानने का जनता को पूरा हक है। जहां कहीं भी चैनलों को लगता है कि सबूत अनिर्णायक हैं, ऐसे में स्टिंग आपरेशन के पीछे की कहानी भी विष्लेशण के साथ प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस टीवी चैनल ने यह आपरेशन किया उसने इसे प्रसारित नहीं किया.

एक पत्रकार द्वारा स्वयं का दमन

योगेन्द्र यादव (राजनीतिक विश्लेषक)

योगेन्द्र यादवऐसा लगता है कि सीएनएन-आईबीएन ने मीडिया की नैतिकता का उल्लंघन किया है, क्योंकि चैनल ने मिलते ही उस टेप का प्रसारण नहीं किया, कुछ खास कारणों के चलते ऐसा नहीं किया गया, बाद में राजदीप सरदेसाई ने प्रसारण में वह सब बताया था और प्रेस-विज्ञप्ति में भी दोहराया था कि फुटेज वैरीफाई नहीं किया गया था और उन्हें उन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि के बारे में गहराई से जांच करने की जरूरत थी। यह एक पत्रकार के लिए स्वयं के ही `दमन´ जैसा ही है, अगर ऐसे में कोई भी उनकी जगह होता तो साथियों से टेप की गुणवत्ता जांचने के लिए कहता और हर वो आदमी जो उसमें दिखाई दे रहा है, उसे पहचानने के लिए कहता, साथ ही इस खेल में राजनीतिक नेताओं के साथ उनके संबंधों की भी जांच करता, फिर कुछ कानूनी सलाह लेकर ही, सब कहानी जनता के सामने रखता।

मुझे मालूम है कि सीएनएन-आईबीएन की विषेश जांच टीम कुछ भी दिखाने से पहले कुछ हफ्तों तक इसकी जांच करती है। यह भी गौर करने लायक है कि चैनल ने सबूतों को दबाया नहीं। जैसे ही आडवाणी जी ने टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन के बारे में बताया, उसके एक घंटे के भीतर ही किसी और भारतीय सरकारी अधिकारी को नहीं बल्कि स्पीकर को टेप सौंप दिया गया। अगर हमें लगे कि मामला कुछ भिन्न किस्म का है, तब पूरी तरह आश्वस्त होकर ही हमें इसे सार्वजनिक करना चाहिए। पारदर्शिता का मतलब यह नहीं है कि सबूत हाथ में आते ही उसे प्रसारित कर दिया जाए। मुझे यकीन है कि अगर जांच पूरी करने दी जाती तब यह संसद में नोटों के थैलों से भी ज्यादा वजनी होती।

(योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से बातचीत मीनाक्षी अरोड़ा)  

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देवेन्द्र on 27 July, 2008 21:07;03
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सीएनएन-आईबीएन ने वाकई नैतिकता का उल्लंघन किया है. इस अनैतिक काम से सीएनएन-आईबीएन की विश्वसनीयता घटी है.
राजदीप सरदेसाई अब राजदीप बेअसर देसाई हो चुके है.
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हकीकत यह है on 27 July, 2008 21:30;26
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इस स्टिंग आपरेशन में स्पाई कैमरा यूज किया गया था. और इसे जो संचालित कर रहा था वह गैर अनुभवी आदमी निकला. विजुअल में चेहरा ही नहीं आया. विजुअल में अमर सिंह के घर में घुसते हुए कुछ लोग दिखते जरूर हैं लेकिन वे कौन हैं इसका अंदाज नहीं लगता. अब बताओ भाई राजदीप क्या दिखाएंगे?

यह भी जान लो कि राजदीप ने यह सब अपने बूते पर किया इसलिए राघव बहल भी उनसे नाराज हैं. राजदीप तो दोनों तरफ से फंस गये हैं. यह तो आशुतोष और राजदीप ने मिलकर तय किया कि जब कुछ है ही तो सीडी स्पीकर को सौंपना ही खबर बना देते हैं. उन लोगों ने वही किया.
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सतह पर दिखाई दे रही बातें पहली ही नजर में कह रही हैं कि सीडी इस मामले में भाजपा की सबसे कमजोर कडी है । सीडी अभी स्‍पीकर के पास है लेकिन नोट कर लीजिए, उसमें अमरसिंह, अहमद पटेल की शकलें कहीं नजर नहीं आएंगी । नजर आएगी तो उस अादमी की शकल जिसने अशोक अर्गल के बंगले पर नोट दिए होंगे और इस आदमी को अमरसिंह और अहमद पटेल से जोडने हर कोशिश बचकानी साबित हो जाएगी । अन्तिम निष्‍कर्ष यही निकलेगा कि यह सब भाजपा का नाटक था । यह आशंका इस बात से भी बलवती होती है कि भाजपा इस सीडी को उजागर करने की मांग भी केवल खानापूर्ति के लिए कर रही है ।
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Nitin Kant Chaturvedi on 27 July, 2008 21:40;05
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CD jesi bhi thi use dikhaya jana tha, isse IBN ki vishvasniyata bani rahti. CD na dikhakar IBN ne darshako ka bharosa khoya he.
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राकेश on 27 July, 2008 21:42;15
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राजदीप की करनी गलत है। एकदम अनैतिक काम।
पत्रकार का काम खबर दिखाना होता है बनाना नहीं और राजदीप शुरू से ही खबरें बनाने में उस्ताद आदमी है।
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Rajendra Joshi on 27 July, 2008 23:28;55
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राजदीप सर देसाई ने कुछ भी गलत नहीं किया वे तो गंभीर व्यक्ति है। भारतीय जनता पार्टी के कुछ एक नेताओं को अपने आप में गलत फहमी हो गयी है कि वे ही सबसे ईमानदार नेता हैं। अटल जी के समय तक ऐसी बात नहीं थी आज भाजपा का दिन प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है। जो जमीन से जुड़े कार्यकर्ता अथवा नेता हैं उन्हे दरकिनार कर दिया जा रहा है जनता के सामने केवल हवाई नेता ही रहते हैं। भाजपा के इन नेताओं को इन जमीनी नेताओं की जरूरत तब पड़ती है जब इन्हे लगता है कि उनकी नाव डूबने वाली है। फिर दरकिनार किए इन नेताओं के सहारे ये अपनी डूबती नैया को पार लगाने का प्रयास करते हैं फिर पार हो जाने के बाद ये लोग फिर इन्हे राजीनीति के बियावान में भटकने को छोड़ देते हैं। इन्हे जब स्वयं पर ही भरोसा नही ंतो ये दूसरे पर कैसे भरोसा कर सकते
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Praveen on 27 July, 2008 23:41;14
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वेरिफिकेशन की बात कहा से आती है, क्या यही पत्रकारिता है, की ख़ुद पे से ही विश्वाश उठ गया है. जनता उनके बातो को मानेगी की नही, अगर ऐसा है तो शर्म की बात है, अपने पे इतना कम भरोशा करने वाले पत्रकार अपने आप को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कैसे कह सकते है. किस बात पर वो टीवी कैमरे के सामने बैठ के नेताओं को गाली देते है. दूसरी बात ये कि इससे पहले के स्टिंग आपरेशन कि सारी सी डी प्रसारण से पहले क्या न्यायधीशो को दी जाती थी या जब पैसा ले के प्रश्न पूछने वाला मामला था तो उसके प्रसारण से पहले क्या लोकसभा अध्यछ को सी डी दी गयी थी.
रही बात आरोप लगाने वालो कि तो मुझे नही लगता कि वो इतने मूर्ख होंगे कि सनसनी फैलाने के लिए ये आरोप लगायेंगे, जब कि सबको पता है कि अगर यह बात ग़लत होगी तो उसके नतीजे बहुत दूर तक जायेंगे ( वो संसद है
कोई चंडूखाना नही, और वैसे भी वहा उनके मित्र नही बैठे है, जो उनको सस्ते में छोड़ देंगे).
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धुरंधर on 28 July, 2008 11:00;42
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भाजपा को अग्रेंजी की ही नहीं, अंग्रेजियत की भी बीमारी है। है। आडवाणी के सर्वेसर्वा बनने के बाद इसने पार्टी को अमरबेल की तरह लपेट लिया है। राजनाथ के अध्यक्ष बनने के बाद लगा था कि हिंदीभाषी क्षेत्र की भाजपा में हिंदी का भाव बढेंगा लेकिन वह खुद अपने अस्तित्व को लेकर ही परेशान हैं कि पता नहीं कितने दिन अध्यक्ष रह पाएंगे। ऐसी खबर जनसत्ता में हो सकती हैं। जनसत्ता और उसके पत्रकार विवेक बधाई। बात रही राजदीप सरदेसाई की तो वह खुद को खुदा समझते हैं। उन्होंने सबसे पहले एक अखबार की सम्मिट में गुजराज के मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। उसके एवज में उनको राष्ट्रीय सम्मान मिल गया। हो सकता है कि कुछ समय बाद संसद में नजर आएं। दरअसल वह पत्रकार नहीं लेनेदेन के सौदागर हैं जहां मिला वहीं लेट गए।
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suresh chiplunkar on 28 July, 2008 11:45;10
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धुरंधर से सहमत… अगले साल के "पद्म" पुरस्कारों में राजदीप सरदेसाई का नाम होगा, साथ में एक राज्यसभा सीट भी… जय हो पत्रकारिता की, जय हो भाजपा को गरियाने वालों की, जय हो कांग्रेसियों को दूध से धुला बताने वालों की…
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prakash chandalia on 28 July, 2008 14:05;41
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kuch to majburiyan rahi hogi...insaan yun hi bewafaa nahi hota. Rajdeep behtar bata sakte hain, majburiyan kya rahi hongi...
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