मुख्तार के खिलाफ खुलकर मैदान में मुन्ना बजरंगी
माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी ने पूर्वांचल के माफिया लीडर मुख्तार अंसारी से बगावत कर दी है. मुन्ना बजरंगी इस आमचुनाव में सीधे मैदान में तो नहीं उतर रहा है लेकिन वह गाजीपुर लोकसभा सीट से अफजाल अंसारी को हराने के लिए सक्रिय हो गया है. अफजार मुख्तार अंसारी का भाई है और वर्तमान समय में गाजीपुर लोकसभा सीट से सांसद. समझा जाता है कि भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकाण्ड के बाद दोनों अपराधियों में तनातनी बढ़ गयी और अब दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ हैं. मुन्ना बजरंगी कहता है कि मुख्तार ने सिर्फ उसका इस्तेमाल किया.
29 नवंबर 2005 को भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में सीधे तौर पर मुख्तार अंसारी ने मुन्ना बजरंगी का इस्तेमाल किया था. मुन्ना बजरंगी ने अपने दूसरे साथियों के साथ मिलकर दिनदहाड़े कृष्णानंद राय की हत्या कर दी थी. उसके बाद से मुन्ना बजरंगी फरार है. मुन्ना बजरंगी के फरार होने के बाद उसके साथियों में से कई की रहस्यमय तरीकों से मौत भी हो चुकी है. इधर मुख्तार ने सत्ता प्रतिष्ठान के साथ अपनी सांठ-गांठ लगातार बना रखी है जिसके फलस्वरूप उसे हमेशा सत्ता का संरक्षण मिला रहा. अब जबकि प्रदेश में मायावती शासन में है तो एक बार फिर वह मुलायम सिंह यादव का साथ छोड़कर मायावती के साथ जा मिला है और बनारस लोकसभा सीट से मैदान में है.
यह राजनीतिक का ही खेल है कि एक दूसरे के जानी दुश्मन मुख्तार और ब्रिजेश एक पार्टी बसपा से टिकट पाने की कोशिश कर रहे थे. मुख्तार सफल रहा जबकि ब्रिजेश सिंह को मायावती ने टिकट देने से मना कर दिया. मुख्तार के प्रतिद्धंदी और पूर्वांचल का दूसरा सबसे ताकवर माफिया डान ब्रिजेश सिंह बनारस के ठीक बगल में चंदौली सीट से टिकट पाने की कोशिश कर रहा था. चंदौली ब्रिजेश सिंह का गृहजनपद है. मायावती के मना कर देने के बाद फिलहाल उसके मैदान में उतरने की संभावना भी खत्म हो गयी है. पूर्वांचल की राजनीति के जानकार बताते हैं कि कृष्णानंद राय की हत्या के बाद इस इलाके में हिन्दू माफिया कमजोर हुए हैं. ऐसा कहा जाता है कि कृष्णानंद राय की राजनीति को ब्रिजेश सिंह मदद करता था इसीलिए मुख्तार अंसारी उसे हर हाल में रास्ते से हटाना चाहता था. उसने कृष्णानंद राय की हत्या करवाकर अपना वह मुकाम हासिल कर लिया. अब पूर्वांचल में वह अकेला सबसे ताकतवर माफिया लीडर है.
जाहिर सी बात है ऐसे में ब्रिजेश सिंह का खुद मैदान में उतरने का मन बनाना कोई अतिरेक नहीं है. प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी और ब्रिजेश सिंह दोनो ही राजनीतिक संरक्षण और ताकत पाने की कोशिश कर रहे हैं. मुख्तार से अलग होने के बाद मुन्ना बजरंगी खुद तो चुनाव मैदान में नहीं आना चाहता क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि वह देश के बाहर और फिलहाल वह भारत आकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता. लेकिन गाजीपुर सीट से वह किसी एक उम्मीदवार को अपना सहयोग दे सकता है जो कि अफजाल को कड़ी टक्कर दे सके. मुन्ना बजरंगी से जुड़े नजदीकी सूत्र बताते हैं कि मुन्ना बजरंगी और मुख्तार दोस्त कभी नहीं रहे. यह बात जरूर है कि मुख्तार के कुछ अहसानों के बदले में उसने मुख्तार के कुछ कामों को अंजाम दिया. मुन्ना बजरंगी अपने 'लड़के' गुड्डु यादव की हत्या से बौखलाया हुआ था औऱ वह कृष्णानंद राय से बदला लेना चाहता था. ऐसे में मुख्तार ने उसका बखूबी इस्तेमाल किया.
मुख्तार को सत्ता का संरक्षण
1989 में मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में मुख्तार को सत्ता का संरक्षण मिला। टालने के लिए उसके खिलाफ सारे मामलों में सी0बी0सी0आई0डी0 की जांच लगवा दी गई। लेकिन कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनते ही मुख्तार के सामने मुश्किले खड़ी हो गयीं। उसके खिलाफ `टाडा´ लगा। दूसरी बार, बसपा और भाजपा की पहली साझा सरकार में मायावती ने मुख्तार को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी। इससे मुख्तार का राजनैतिक कद ऊंचा हो गया। धीरे-धीरे मुख्तार का कद इतना ऊंचा हो गया कि वह माफिया से पूर्वांचल के मुसलमानों का रहनुमा हो गया और मऊ से निर्दल विधायक भी चुना गया।
तीसरी बार मुलायम सिंह की पिछली सरकार में मुख्तार के सितारे बुलंदियों पर थै। इस दौर में मुख्तार के मुहम्मदाबाद के आवास जिसे `फाटक´ कहते हैं में प्रदेश ही नहीं बल्कि बाहर के अपराधियों को भी संरक्षण मिलने लगा। इसी दौर में डी0एस0पी0 शैलेन्द्र सिंह ने एल0एम0जी0 पकड़ी जो मुख्तार के पास भेजी जा रही थी। लेकिन मुख्तार का कुछ नहीं बिगड़ा, शैलेन्द्र सिंह को ही इस्तीफा देना पड़ा। इसी दौर में मऊ दंगे में सत्ता के संरक्षण में मुख्तार का दंगाई चेहरा भी देखने को मिला। इस दौर में अकेले गाजीपुर में दो दर्जन से ज्यादा मुख्तार विरोधियों की हत्या हुई।
सरकार चाहे जिसकी हो मुख्तार को संरक्षण मिला है। अब एक बार फिर मायावती ने मुख्तार को संरक्षण दे दिया है। मायावती ने अफजाल अंसारी को गाजीपुर का और मुख्तार को बनारस का टिकट थमा दिया है। अफजाल अंसारी और सपा विधायक सिबगतुल्लाह अंसारी वाई श्रेणी की सुरक्षा में घूम रहे हैं। सत्ता का संरक्षण मिलते ही मुख्तार हनक के घोड़े पर सवार है। 22 फरवरी को करण्डा में सपा समर्थक ठेकेदार की हत्या के पीछे मुख्तार का हाथ माना जा रहा है। माया की सरपरस्ती में मुख्तार की हनक वैसे ही है जैसे मुलायम के दौर में थी। अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए मुख्तार ने मऊ, गाजीपुर और बनारस में 20 घंटे बिजली आपूर्ति का आदेश जारी करवा दिया है। मुख्तार के बढ़ते दबदबे में कम से कम पर बात तो साफ हो गई है कि अपराधियों को सुधारने के लिए उन्हें बसपा ने मौका दिया जा रहा है कोरी बकवास है।
मुन्ना बनाम मुख्तार
मुन्ना बजरंगी और मुख्तार अंसारी के रिश्तों में आई खटास की वजहें साफ हैं। सूत्र बताते हैं कि कृष्णानंद राय की हत्या के बाद से फरारी का जीवन काट रहा मुन्ना बजरंगी भी अब राजनैतिक संरक्षण चाहता है। लेकिन उसके इस काम में मुख्तार ने कभी कोई मदद नहीं की। माया हो या मुलायम मुख्तार ने हमेशा इनसे अपने परिवार के संरक्षण की ही बात की। पिछले विधानसभा चुनाव में भी मुख्तार की बसपा से बात हुई थी। मुख्तार ने बसपा से अपने साथ भाई सिबगतुल्लाह, अताउर्रहमान, अपनी पत्नी आफसा बेगम और बहनोई को टिकट की मांग की थी। लेकिन बसपा ने मनाकर दिया तो मुख्तार निर्दल और सिबगतुल्लाह सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा।
मुख्तार और मुन्ना बजरंगी के रिश्तों में आई खटास की दूसरी वजह मुन्ना से जुड़े लड़कों की हत्याएं हैं। कृष्णानंद राय की हत्या के बाद मुन्ना के शूटरों की हत्याएं होती रही लेकिन मुख्तार का दबदबा बढ़ता गया। कुछ घटनाएं ऐसी भी हुई जिसमें शक की सुई मुख्तार अंसारी की ओर ही घूमी। फिरदौस की बम्बई में हत्या ऐसा ही मामला था। सूत्र बताते हैं कि के0एन0 राय की हत्या के बाद मुख्तार पर इस बात का दबाव था कि वह मुन्ना बजरंगी को गिरफ्तार करवाए या मुन्ना की जानकारी एस0टी0एफ0 को दे। लेकिन मुन्ना की जानकारी न होने पर मुख्तार ने फिरदौस को ही एस0टी0एफ0 के हाथ मुठभेड़ में मरवा दिया। बताते हैं कि फिरदौस मुन्ना से मुख्तार की शिकायत करने गया था।
मुख्तार के अहसानों से मुक्त हो मुन्ना अब खुद अपने किसी विश्वस्त को राजनीति में उतार कर उसके सहारे सत्ता का संरक्षण चाहता है। इसके लिए मुन्ना बजरंगी ने प्रयास भी शुरू कर दिये हैं।
(rupeshpandey1973@gmail.com)
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