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दिवेर का अंधेरा ढल चुका है

image दिवेर गांव के उपसरपंच चंदूभाई (दाहिने)

आईये वड़ोदरा के दलित बहुल गांव दिवेर चलते हैं. गुलामी और सवर्ण तानाशाही के अंधेरे से निकलकर यहां के दलितों ने अपने दम अपने भाग्य का सूरज चमकाया है. एक लंबी लड़ाई का ही नतीजा है कि पंचायत में कभी सिर झुकाकर चुपचाप खड़े रहने वाले वे बंधुआ लोग आज खुद कुर्सी पर बैठकर लोगों की समस्याएं सुलझाते हैं।

वड़ोदरा जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है सीनोर तालुका का गांव-दिवेर। लम्बे समय तक पटेल सवर्णों के वर्चस्व के अधीन रहने वाले इस गांव में पाटनवाड़िया के अलावा वसावा आदिवासी, हरिजन, बुनकर, वाल्मिकी और वाघरे समुदायों के करीब 450 दलित परिवार भी रहते हैं। दिवेर के दलित भी लम्बे समय तक इसी तरह की विसंगति से ग्रसित रहे हैं। दिवेर में पटेल और दलितों की जनसंख्या का अनुपात लगभग बराबर होने के बावजूद लम्बे समय तक यहां पटेल जाति के लोगों का ही सिक्का चल रहा था। लेकिन गांव के दलितों की एकजुटता, उनके साहस और प्रतिबद्धता के चलते आज सिक्का उलट चुका है और अब किसी तरह का रुआब दलितों पर झाड़ने से पटेल समुदाय के लोग यहां कई बार सोचते हैं। अपने पिता को खेत पर खाना देकर साईकिल पर लौट रहे एक नवयुवक को गांव के कुछ दबंगों ने रोककर कहा कि साईकिल इतनी चलाकर क्यों जा रहा है? इस बात को लेकर लड़के की जमकर पिटाई भी कर दी गई। दिवेर की दलित बस्ती में रहने वाले रमेष को पटेल जाति के सवर्णों का कोपभाजन सिर्फ इसलिए बनना पड़ा क्योंकि दलित होने के बावजूद उसने सामंतवादी मानसिकता से जकड़े हुए रईसों के सामने साईकिल चलाकर और वो भी तेज( जाने की हिमाकत की थी। सजा के तौर पर लड़के को बेरहमी से पीटा गया।

लम्बे समय से गांव के सवर्णों के अत्याचारों की पीड़ा को सहता आ रहा दिवेर गांव का दलित समुदाय इस पिटाई की टीस को अब बर्दाश्त करने के मूड में नहीं था। दलित नवयुवकों का खून इस पर खौल उठा और अब तक बंटकर रहने वाले ये लोग इस बात को लेकर आक्रोषित होने लगे। दलित युवाओं ने पटेल जाति के उन दबंगों को सबक सिखाने के लिए मारपीट करने का मन बन लिया था। लेकिन बस्ती के बड़े बुजुर्गों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। अगले दिन जुलाई 2004 में 55 वर्षीय वयोवृद्ध ईश्वर भाई की अगुवाई में कुलदेवी के थान पर बने चबूतरे पर सब इकट्ठे हुए और इस अत्याचार के खिलाफ कैसे लड़ा जाए, इस बात को लेकर विचार किया जाने लगा। अंत में सबने मिलकर सहमति ज़ाहिर करते हुए सवर्णों के खेतों में काम नहीं करने का मन बना लिया। खेत में काम करने जाते वक्त खाने के बर्तन घर से ही लेकर जाना, मंदिरों में प्रवेश की मनाही और शादी ब्याह में खाने के लिए बर्तन घर से ले जाने की बाध्यता दिवेर के दलित समुदाय के लिए पीढ़ियों से बनी हुई थी। किसी दलित परिवार के अमूमन सभी सदस्यों को सुबह की पहली किरण पटेलों के घर में ही देखने को मिलती थी। शाम होने तक पुरुषों को जहां खेतों में बैलों की तरह जोत दिया जाता था तो महिलाओं को घर पर रहकर झाड़ू-बर्तन जैसे काम करने पड़ते थे। यही नहीं दलितों के बच्चों को भी पशुओं को चराने के लिए भेज दिया जाता था। जबकि इस हांड़-तोड़ मेहनत के बदले उन्हें 25 से 30 रुपये ही मजदूरी के तौर पर दिये जाते थे।

दिवेर के ग्रामीणों ने बताया कि कम मजदूरी के चलते बमुश्किल खाने भर का ही जुगाड़ हो पाता था। दिवेर की ही अंबूभाई बताते हैं कि `पटेलों के डर से कोई उनके सामने मजदूरी के लिए मजदूरी के लिए मुंह खोलने की हिम्मत भी नहीं कर पाता था।´ऐसे में कभी-कभार शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर पटेलों से कर्ज लेना पड़ता था। यहां कई दलित परिवार ऐसे भी हुआ करते थे जिनमें कर्ज की यह बिष-बेल पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही थी और इसी की एवज में उन्हें मजबूरन सवर्णों के खेतों में बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती थी। एक बार सवेरे घर से निकल जाने के बाद वापस आने का कोई समय तय नहीं रहता था। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि `बहुत से त्यौहार भी हमने खेतों में ही बिताए हैं।´कुछ ग्रामीणों ने बताया कि कोई यदि होमगार्ड की नौकरी करता है तो उसकी हिम्मत नहीं थी कि वह इन दबंगों के सामने से वर्दी पहन कर निकल जाए। गांव में एक `मिल्क प्रोड्यूस कमेटी´ भी है, जिसमें 80 प्रतिषत दूध दलितों के यहां से ही जाता था, लेकिन कमेटी में दलितों की भागीदारी कभी नहीं रही और अगड़ों का ही कब्जा बना हुआ था। गांव में किसी तरह की सभा बुलाना भी दलितों के लिए प्रतिबंधित हुआ करता था। ऐसे में वे आपस में समस्या को लेकर चर्चा भी नहीं कर पाते थे। यदि कोई मेहमान दिन के समय आ जाता तो भी दलित मजदूरों को घर पर आने की इजाजत नहीं होती थी और आगंतुक को शाम तक उनका इंतजार करना पड़ता था। दलित बस्ती के ही एक 62 वर्षीय बुजुर्ग ने बताया कि `हम लोगों को तो उनके बच्चों को भी मोटा भाई (बड़ा भाई) कह कर बुलाना पड़ता था, जबकि वही बच्चे हम जैसे बड़े-बूढ़ों को भी नाम लेकर बुलाया करते थे।´vishesh01.jpg

संसाधनों के अभाव में गुजर-बसर करने वाले दिवेर के दलितों के लिए विरोध की डगर पर चलने का फैसला आसान नहीं था। सामाजिक कार्यकर्ता रमेश बताते हैं कि सीनोर तालुका में 41 गांव हैं और सवर्णों का दलितों के प्रति अत्याचार सबसे अधिक दिवेर में ही था। खेती-बाड़ी अधिक न होना दलितों के लिए एक अभिषाप बन गया था और मजबूरन पेट पालने के लिए उन्हें गांव रईसों के यहां दिन भर खटना पड़ता था। भरत भाई की मानें तो दिन भर काम के बदले ऊंट के मुंह में जीरे समान मजदूरी मिलती थी। आगे भरत बताते हैं कि `लम्बे समय तक यहां के दलितों के पिछड़े होने का कारण एकजुटता का अभाव था। दूसरी ओर पटेल हमेशा मिलकर निर्णय लिया करते थे। वे कहते हैं कि हम मार खाते-खाते थक गए थे।´ बकौल रमेश 95 प्रतिशत जमींदारी यहां सवर्णों के पास ही है। दादागीरी का आलम यह था कि सार्वजनिक परती भूमि में से भी दलितों को पशुओं के लिए चारा लेने की छूट नहीं थी। इस तरह से अपने खाने के अलावा पषुओं के चारे के लिए भी दिवेर का दलित समुदाय सवर्णों की दया पर निर्भर बना हुआ था। हड़ताल के शुरूआती दिनों में इन्द्रदेव ने भी इन लोगों की परीक्षा लेनी चाही और लगातार बरसात होने के कारण इन मजदूरों को करीब एक महीने तक काम नहीं मिला। ऐसे में आसपास के गांवों से 125 मन अनाज इकट्ठा किया गया और इस बात के निर्देष दलित बस्ती में जारी कर दिये गए कि यदि किसी के पास खाने को नहीं हो तो वह इस भंडार से ले जा सकता है। बरसात बंद हो जाने पर लोग काम पर जाने लगे तो खाने की समस्या खत्म हो गई। बाहर जाकर काम करने से 50 रुपये मजदूरी के तौर पर हर व्यक्ति को मिलने लगी थी, पहले की अपेक्षा यह रकम दोगुने के बराबर थी।

पटेल जाति के श्रमिकों के अलावा धीरे-धीरे अन्य वर्गों के मजदूर भी दलितों के साथ आने लगे। जमींदारों के खेतों में काम न करने की हड़ताल से गांव के दलितों के लिए समस्या बढ़ने लगी थी। रोज कमाकर खाने वाले दलितों के लिए अब भोजन की समस्या भी आकर खड़ी हो गई। गांव में काम नहीं रहा तो दलित मजदूरों ने अन्य स्थानों पर काम की तलाश में जाना शुरू कर दिया। दिवेर में एक तरह से मजदूरों का अकाल सा हो गया। ऐसे में दिवेर के सवर्णों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आसपास के गांवों में इस बात का विरोध जताने पहुंच गए कि दिवेर के मजदूरों को यहां काम क्यों दिया जा रहा है? हड़ताल के एक साल बाद अप्रैल 2005 में झगड़ा भी हुआ, लेकिन आसपास के गांवों - सुरासामल, मीढोल, मांडवा और बाविड़या में रहने वाले पाटनवािड़या समुदाय के लोगों ने श्रमिकों को आश्वासन दिया कि तुम्हें यहां काम मिलता रहेगा, इससे उन लोगों की हिम्मत बढ़ गई। मारपीट की शिकायत लेबर कमिश्नर के पास की गई। लेकिन उल्टे रमेश नाम के एक सामाजिक कार्यकर्ता को 15 दिन के लिए जेल में डाल दिया था। गांव वाले बताते हैं कि रमेश तो मारपीट के समय घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं था। ऐसे में परिस्थितियों को समझा जा सकता है। इन सबके बीच पीढ़ियों से बंधुआ मजदूरी के जाल में जकड़े हुए मजदूरों को एक नई राहत मिलनी शुरु हो गई थी। हालांकि की अगड़ों की जमात का एक बड़ा हिस्सा अभी भी दलितों को अपने चंगुल से आजाद करने के लिए तैयार नहीं था और उनके बाप-दादा के जमाने से चले आ रहे कर्ज का हवाला देते हुए अपने खेतों में उनसे कराने के लिए निरंतर दबाव डाला जाता रहा। लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद दलितों के ऊपर दषकों से चला आ रहा कर्ज का बोझ खत्म हो गया।

कुछ समय पहले तक दिवेर गांव की पंचायत में दलितों के लिए कोई स्थान नहीं था। पेंशन, छात्रवृत्ति, राशनकार्ड जैसी चीजों के लिए भी पंचायत से स्वीकृति इन लोगों को नहीं मिल पाती थी। यही नहीं गांव के कई लोगों ने बताया कि जब वे पुलिस के पास अत्याचार की शिकायत लेकर जाते थे तो पहले आरोपित दबंगों से फोन करके पूछा लिया जाता था। चंदूभाई कहते हैं कि `कुछ समय पहले तक पंचायत में बोलने के लिए एड़ी चोटी की हिम्मत को जुटाकर एक कर देना पड़ता था और एक कोने में हम चुपचाप हाथ बांधकर खड़े रहते थे।´चंदूभाई उर्फ लउगनभाई दिवेर में हुए परिवर्तन के प्रतीक कहे जा सकते हैं, क्योंकि कभी पंचायत सभा में सिर झुकाकर खड़े रहते थे, लेकिन आज वे गांव के उपसरपंच हैं और सिर झुकाकर नहीं बल्कि उत्साहपूर्वक सिर उठाकर बात करते हैं। गांव की सरपंच भी एक महिला हैं। पटेल जाति के लोग जो हमेषा से सरपंच की कुर्सी पर काबिज थे, उन्होंने 2007 पंचायत चुनाव में अपनी उम्मीदवारी दलितों की एकजुटता के चलते हार जाने के डर से पहले ही छोड़ दी थी।

गांव वालों ने यह भी बताया कि हमारे भीतर नैतिक हिम्मत तो थी, लेकिन रास्ता दिखाने वाला कोई भी नहीं था। ऐसे में अहमदाबाद की नवसर्जन नामक संस्था आगे आई और इन लोगों के कार्य को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया। इस बीच पटेलों के प्रभाववश कलैक्टर ने भी गांव में आकर समझौता कराने की कोशिश की। लेकिन गांव के दलितों साफ इंकार कर दिया और कहा कि जब हमारी कर्ज माफी, सरकारी जमीन के उपयोग, अत्याचार से सुरक्षा, दूध की डेयरी में भागीदारी, ग्राम पंचायत में समानता और उचित मजदूरी समेत 12 सूत्रीय मांगें नहीं मानी जाएंगी तब तक हड़ताल चलती रहेगी। हालांकि औपचारिक तौर पर शायद ही कभी कोई बात इन लोगों की मानी गई हो, लेकिन अपनी एकजुटता एवं प्रतिबद्धता से दिवेर के दलित समुदाय ने आज अपनी पहचान खुद कायम कर ली है और गांव के सवर्णों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया है। उपसरपंच चंदूभाई बताते हैं कि हमने विभिन्न सरकारी योजनाओं की पहचान करके उससे प्राप्त राशि को गांव के विकास में लगाया है। पुलिया, खड़ंजे, गटर लाईन जैसे कार्य किए गए हैं। इसके साथ साथ साथ विभिन्न आवासीय योजनाओं के तहत घर बनाकर भी कुछ लोगों को दिये गए हैं।

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tulsisinghbisht@gmail.com on 10 September, 2008 14:36;56
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सवर्ण और दलितों की आपसी मन मुटाव लम्बे समय से गांवों में चला आ रहा है और इस पर काफी प्रतिक्रिया भी हुई है लेकिन शहरों में इस तरह की कोई बात सामने नहीं आती। लेख अच्छा है जैसे दलितों ने एकजुटता दिखाई है ऐसी ही आज भारत देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एकजुटता देखने की जरूरत है ताकि और भी समस्याओं को दूर किया जा सके। लेख के लिए मिश्रा जी को साधुवाद धन्यवाद।
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Anunad on 10 September, 2008 15:48;27
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सचमुच यह एकजुटता देश के सभी गावों के निर्बल लोगों के लिये अनुकरणीय है। दूसरी तरफ़ यह शर्मनाक शोषण कहीं भी न चले, इसके प्रति भी समाज के सभी वर्ग जागरूक हों।

अच्छा लेख! साधुवाद!!
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Parmar kantilal Ukabhai on 10 September, 2008 16:24;53
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Dear,
Umashankar Misra,
I Read your Diver Story ( Vadodara ). Good story.Go Ahed, we with You.
Thank you.

Kantilal U. Parmar,
Gujarat.
Mob.9727745386
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daya nidhan on 10 September, 2008 22:48;20
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aap logo ek party banani chahiye hum sab sath hai .mishra ji se hume bahut umeed hai mai to baitul se ticket chahta ho.aap aadesh ker de hava badal denge
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Brijesh on 11 September, 2008 16:27;22
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Acha lekh hai are Daya Bhai kya partyiyan kam hai ki aap bhi banana chahte hain satta mein pahunchate hi dalito ko bool jayenege aur maje lenge agar karna hi hai to samaj sewa kariye woh bhi niswarth.
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image उमाशंकर मिश्र विकास को अपनी कलम से आंकते युवा पत्रकार उमाशंकर मिश्र ग्रामीण भारत और परंपरागत उद्योग को समझना चाहते हैं और रिपोर्ट करना चाहते हैं. एक मासिक पत्रिका सोपान स्टेप में कार्यरत है.
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