यमुना को खा गया दिल्ली मेट्रो
सारी जल बिरादरी खेलगांव के विरोध में लगी रही इसी बीच दिल्ली मेट्रो खेलगांव के बगल में यमुना का पूरा किनारा खा पचा गया और किसी को भनक तक नहीं लगी.
रोज आते-जाते हजारों लाखों लोग यमुना की यह हत्या देख रहे हैं लेकिन शायद ही किसी ने इस बारे में कही दो शब्द कहा हो. वैसे भी दिल्ली में मेट्रो के खिलाफ कुछ बोलने का मतलब है पवित्र गाय पर अंगुली उठाना. दिल्ली के जन परिवहन में मेट्रो का नगीना जोड़नेवाले ई श्रीधरन महत्वाकांक्षी इंसान हैं. यह उनकी महत्वाकांक्षी मनोवृत्ति का ही परिणाम है कि शास्त्री पार्क ट्रेन डिपो से एक मजार और आश्रम का "अतिक्रमण" हटाने के लिए वे एमसीडी, दिल्ली पुलिस और डीडीए के खिलाफ कोर्ट चले गये और कोर्ट के आधार पर "अतिक्रमण" साफ करवा दिया. इसी रौबदाब का नतीजा है कि उन्होंने वह निर्णय करवा लिया जो दिल्ली और यमुना दोनों के भविष्य पर कालिख पोत देता है. वे ठीक यमुना के गर्भ में घुसकर यमुना डिपो बना रहे हैं. यह डिपो दिल्ली मेट्रों के दूसरे चरण का हिस्सा है जहां आवास, ट्रेनों की धुलाई और मरम्मत आदि का काम किया जाएगा. इस काम के लिए घोषित तौर पर मेट्रो ने डीडीए से 45 हेक्टेयर (111 एकड़) जमीन ली है लेकिन हकीकत में फैलाव इससे बहुत ज्यादा है.
जैसा कि किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने से पहले होता है यहां भी ट्रेन डिपो बनाने से पहले औपचारिक रूप से मेसर्स राईट्स लिमिटेड द्वारा एक सर्वे किया गया. राईस्ट ने अपने सर्वे में कहा है कि "गाड़ियों की साफ-सफाई, मरम्मत, कार्यशाला, आवास और कार्यालय आदि बनाने से पानी और ध्वनि प्रदूषण की समस्या पैदा होगी. अगर यहां यमुना डिपो बनता है तो इस जगह की तीन मीटर भराई करनी होगी क्योंकि यह जगह आस-पास के इलाकों से इतनी ही नीचे है. इससे पानी के बहाव और सर्फेज ड्रेनेज की समस्या पैदा हो सकती है." राईट्स का साफ संकेत है कि अगर यहां डिपो बनाया जाता है तो दिल्ली शहर में यमुना के आस-पास के इलाकों को बाढ़ के समय में डूब से बचाया नहीं जा सकता. नदी के प्रदूषण का खतरा तो चरम पर है ही. लेकिन जो लोग सरकारी कामकाज के तरीकों को जानते हैं वे जानते हैं कि इस तरह के अध्ययन सजावटी होते हैं और सिर्फ यह कहने में उनके संदर्भों का प्रयोग किया जाता है कि उन्होंने सारे निर्माण से पहले सारे जरूरी अध्ययन करवा लिये हैं.
इन सब सलाहों के बाद भी दिल्ली मेट्रो के यमुना डिपो का काम तय समयसीमा के अनुसार चल रहा है तो इतना साफ है कि राईट्स की इन आशंकाओं का कोई ध्यान नहीं रखा गया. काम शुरू हुआ. आजकल दिनरात काम चल रहा है और अब तक यहां खेती करनेवाले या नर्सरी बनानेवाले 50 से अधिक परिवारों को यहां से हटा दिया गया है. काम खत्म होते ही जब यह जगह एक मंहगा सौदा हो जाएगी तो बचे-खुचे नर्सरीवाले भी भगा दिये जाएंगे. अभी जो लोग पेड़-पौधे लगाकर और फल सब्जियां उगाकर यमुना के इस पेटे की रक्षा करते रहे उनकी जगह पार्शनाथ बिल्डर और दिल्ली मेट्रो के बहुउद्देश्यीय भवन और माल नजर आयेंगे जैसा कि शास्त्री पार्क डिपो में हुआ है. सारा खेल भी इसी रियल एस्टेट पर कब्जे का है जिसमें ताजा खिलाड़ी बना है दिल्ली मेट्रो.
बेतहाशा अवैध कब्जों के बाद भी दिल्ली में कुल 22 किलोमीटर की यमुना अपने किनारों पर 10 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन खाली छोड़ती है. यह खाली छोड़ी गयी जमीन हमारे बाजारू नजरिये से भले ही खाली दिखाई दे लेकिन असल में उसका खाली होना ही शहर को सांस लेने का मौका देती है. पर्यावरणविद कहते हैं कि कोई भी नदी किसी भी शहर के लिए प्राणवायु का भी काम करती है. अगर नदी को हड़प गये तो यह प्राणवायु बहनी बंद हो जाती है. लेकिन इस मामले में नियमित योगाभ्यासी श्रीधरन दूसरे तर्कों के सहारे बात करते हैं. उन्हें अपने लिए किये गये प्राणायाम का महत्व भले ही समझ में आता हो लेकिन शहर का प्राणायाम नदी के भरोसे होता है यह बात समझ में नहीं आती. वे कहते हैं "यमुना के बारे में मैंने चार सूत्री फार्मूला सुझा दिया है." यह चार सूत्री फार्मूला क्या है?श्रीधरन नियमित योगाभ्यासी हैं. लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें अपने लिए किये गये प्राणायाम का महत्व तो समझ में आता है लेकिन शहर का प्राणायाम नदी के भरोसे होता है यह बात उनकी समझ में नहीं आती.
श्रीधरन मानते हैं कि नदी को बहने के लिए उतनी ही जगह मिलनी चाहिए जितने में उसका पानी आर से पार हो जाए. उनकी मानें तो यमुना से बड़ी गलती हुई जो उसने अपना पाट बनाते समय श्रीधरन से सलाह-मशविरा नहीं किया. इसलिए श्रीधरन की सलाह है कि सबसे पहले तो यमुना का पाट संकरा किया जाए. इसे और थोड़ा स्पष्ट करें तो इसे नाले की शक्ल दे दी जाए और दोनों ओर से कंक्रीट की दीवार खड़ी हो जाए. अब वे असली बात कहते हैं कि "नदी के पाट को संकरा करने से जो जमीन मिलेगी उस पर रियलएस्टेट का विकास किया जाए. इससे पैसा मिलेगा और जो पैसा मिले उससे यमुना के विकास के लिए एक प्राधिकरण बना दिया जाए जो यमुना के विकास काम करेगा." साफ है श्रीधरन को यह कतई मंजूर नहीं है कि कोई नदी अपने से कैसे बह सकती है. इसलिए वे इसे कुछ वैसा ही बनाना चाहते हैं जैसा लंदन की थेम्स नदी है. लेकिन यमुना को थेम्स का सपना दिखानेवाले श्रीधरन का असली खेल यमुना की जमीन पर कब्जा करना है. यमुना पर काम करनेवाले मनोज मिश्र कहते हैं "यमुना को थेम्स नदी की तर्ज पर विकसित करने की बात ही बेईमानी है. यूरोप में नदियों और बारिश का पैटर्न अलग है. वहां हर हफ्ते बारिश होती है. यूरोप के लोग मानसून जैसी बातें नहीं जानते. हम यूरोप नहीं हैं. हमारी नदियों के बहने का पैटर्न अलग है. हमारी नदियों को बहते रहने के लिए पाट चाहिए."
इसे और आसान तरीके से समझना हो तो कह सकते हैं कि नदियों के पाट का जितना विस्तार होता है भूजल संभरण की संभावना उतनी बढ़ जाती है. हो सकता है श्रीधरन की नजर में पानी से ज्यादा जरूरी रियल एस्टेट हो लेकिन जिस दिल्ली में तमाम संकटों के बाद भी भूजल के भरोसे आधी दिल्ली रहती हो वहां नदी के पाट को बेकार की जमीन नहीं कहा जा सकता. बाढ़ और बारिश के दिनों में यही पाट अधिक पानी को अपने पेटे में संभालता है. जहां दिल्ली मेट्रो अपना यमुना डिपो बना रहा है वहां बेडराक सबसे नीचे है. यानी इस इलाके में भूजल संभरण की संभावना सबसे अधिक है. लेकिन अब भूजल संभरण की यह संभावना खत्म हो गयी है क्योंकि उस जगह पर मेट्रो की पटरियां, स्टेशन और कार्यशाला आकार ले रहे हैं.
(अगली कड़ीः मेट्रो के बहाने रियल एस्टेट का धंधा)
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
अन्धाधुन्ध विकास हमें कहाँ ले जाएगा?.....
इन अपराध तत्वों के साथ साथ हम भी अगली पीढ़ी के दोषी है... यमुना मरेगी दिल्ली भी नष्ट होगी...सब हमारी ऑंखों के सामने...हमारी ही पीढ़ी के हाथों।
Post your comment