माओवादियों का दावा: कब्जे में हैं कई पुलिसवाले
झारखण्ड में सब-इंस्पेक्टर फ्रांसिस की गला रेतकर निर्मम हत्या करने के बाद माओवादियों ने दावा किया है कि अभी उनके कब्जे में और कई पुलिसवाले हैं जो कि माओवादियों की "जेलों" में बस्तर में बंद हैं.
माओवादियों के हवाले से एक अंग्रेजी अखबार द एशियन एज ने दावा किया है कि बस्तर में माओवादियों द्वारा बनायी गयी सचल जेलों में पुलिस और खुफिया विभाग के कई अधिकारियों को उन्होंने कैद कर रखा है और उन पर मुकदमे की कार्रवाई चलायी जा रही है. इन पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारियों के बारे में फैसला क्रांतिकारी जनवादी कमेटी करेगी. लालगढ़ में किसी अज्ञात स्थान से टेलीफोन पर बात करते हुए सीपीआई (एम) के पोलित ब्यूरो के मेम्बर कोटेश्वर राव ने अखबार के जरिये यह दावा किया है.
कोटेश्वर राव के हवाले से अखबार लिखता है इन पुलिसवालों और खुफिया विभाग के अधिकारियों पर अभी सुनवाई चल रही है. कोटेश्वर राव कहते हैं कि 26 सितंबर को मिदनापुर में माओवादियों ने दो पुलिस कांस्टेबल को गिरफ्तार कर लिया था जिन्हें बाद में माओवादियों की रिहाई के बदले छोड़ा गया था.
छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने अपनी पकड़ काफी मजबूत कर ली है और इस बात की खबरें आती रही हैं कि बस्तर, अबूझमाड़ और दण्डकारण्य के इलाकों में अपनी समानांतर सरकारें चला रहे हैं. कोटेश्वर राव के हवाले से अखबार कहता है कि झारखण्ड में अभी नक्सलियों ने वैसा स्ट्रांगहोल्ड नहीं बनाया है जैसा कि छत्तीसगढ़ में. इसलिए अस्थाई जेलों का निर्माण भी छत्तीसगढ़ में किया गया है. इन जेलों को गांव के उन घरों में बनाया जाता है जो कि किसी न किसी कारण से खाली छोड़ दिये गये हैं. माओवादी ऐसी जेलों के आस पास कड़ी चौकसी रखते हैं और समय समय पर इसे बदलते रहते हैं.
कोटेश्वर राव ने हालांकि अभी फ्रांसिस की हत्या की जिम्मेदारी लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि अभी राज्य के माओवादियों की ओर से उन्हें रिपोर्ट नहीं आयी है लेकिन कोटेश्वर राव ने यह जरूर कहा कि पिछले कुछ सालों में माओवादियों ने पचास से अधिक पुलिसवालों की हत्या की है.
नक्सलियों और माओवादियों से निर्णायक लड़ाई के लिए सरकार व्यापक स्तर पर तैयारी कर रही है. उधर बुधवार को मुंबई में केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने कहा कि अगर नक्सली बातचीत की टेबल पर आना चाहते हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे लेकिन उन्हें हथियार छोड़ना होगा. चिदम्बरम ने कहा कि दुनिया में कोई भी लोकतांत्रिक देश जो कि एक संविधान में आस्था रखता तो शसस्त्र संघर्ष को जायज नहीं ठहरा सकता. उन्होंने कहा कि नक्सली हमारे अपने लोग हैं और उनके खिलाफ युद्ध जैसी बातें हम नहीं कर सकते, यह तो नक्सली और माओवादी हैं जो युद्ध की बात करते हैं. चिदंबरम ने इस बात से इंकार किया है कि नक्सलियों को चीन से किसी प्रकार की कोई आर्थिक मदद मिल रही है.



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